अकबर की असली कहानी – SanjayRajput.com https://sanjayrajput.com सच की ताकत Sun, 19 Jan 2025 01:47:30 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.4 https://sanjayrajput.com/wp-content/uploads/2024/07/cropped-91-98392-81815-20231027_230113.jpg अकबर की असली कहानी – SanjayRajput.com https://sanjayrajput.com 32 32 235187837 दिवेर का महायुद्ध: हल्दीघाटी के बाद जहां महाराणा प्रताप ने मुगलों को चटाई थी धूल https://sanjayrajput.com/2024/01/battle-of-dewair-1582.html https://sanjayrajput.com/2024/01/battle-of-dewair-1582.html#comments Mon, 29 Jan 2024 02:44:00 +0000 https://sanjayrajput.com/2024/01/29/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7-%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%98/ Read more

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मुगल बादशाह अकबर (Mughal Emperor Akbar) का सबसे खतरनाक सेना नायक हुआ करता था बहलोल खां। उसकी हाइट लगभग 7 फुट 8 इंच थी। कहा जाता है कि घोड़ा भी उसके सामने छोटा लगता था और वह अपने नाश्ते में एक बड़े बकरे के मांस जितना नाश्ता खा जाता था। बहुत चौड़ा और ताकतवर था बहलोल खां। कहा जाता है कि उसका हाथी जैसा बदन था और ताक़त का जोर इतना कि नसें फटने को होती थीं। 
अपने पूरे जीवन में एक भी लड़ाई कभी हारा नहीं था ये बहलोल खां। बादशाह अकबर (Mughal Emperor Akbar) को बहलोल खां पर बहुत नाज था। युद्ध में लूटी हुई औरतों में से बहुत सी बहलोल खां को सौंप दी जाती थी। शरीर से काफी भारी भरकम बहलोल खान की दानवता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह 1 दिन के बच्चे को भी क्रूरता से मार देता था।
महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) मेवाड़ (Mewad) के सिसोदिया वंश के राजकुमार थे। वे आजीवन मेवाड़ की सुरक्षा के लिए लड़ते रहे। वे मेवाड़ की सुरक्षा स्वतंत्रता और आजादी के लिए लड़ते रहे। वह अपने ही धुन के रखवाले थे । महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) ऊंची कद काठी और भारी-भरकम हथियारों से हमेशा लैस रहते थे। महाराणा प्रताप ने मेवाड़ को अकबर से आजाद कराने के लिए शपथ भी खाई थी कि वे जब तक मेवाड़ को मुगलों से आजाद नहीं करवा लेते तब तक वे ना राजशाही बिस्तर पर सोएंगे, ना ही राजसी भोजन करेंगे और राजशाही सुखों का त्याग करेंगे और उन्होंने ऐसा ही किया भी।
मुगलों से लड़ते हुए महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) को काफी दुखों का सामना करना पड़ा था। घास की रोटी भी खानी पड़ी थी लेकिन फिर भी उन्होंने कभी मुगलों के अधीन होना स्वीकार नहीं किया था।
दिवेर का महायुद्ध (Battle of Dewair 1582)
इतिहास में दर्ज है कि 1576 में हुए हल्दीघाटी युद्ध (Battle of Haldighati) के बाद भी अकबर ने महाराणा को पकड़ने या मारने के लिए 1577 से 1582 के बीच करीब एक लाख सैन्य बल भेजे। अंगेजी इतिहासकारों ने लिखा है कि हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको उन्होंने ‘बैटल ऑफ दिवेर’ (Battle of Dewair) कहा है, मुगल बादशाह के लिए एक करारी हार सिद्ध हुआ था।  
कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में जहां हल्दीघाटी को ‘थर्मोपल्ली ऑफ मेवाड़’ की संज्ञा दी, वहीं दिवेर के युद्ध (Battle of Dewair) को ‘मेवाड़ का मैराथन’ बताया है (मैराथन का युद्ध 490 ई.पू. मैराथन नामक स्थान पर यूनान केमिल्टियाड्स एवं फारस के डेरियस के मध्य हुआ, जिसमें यूनान की विजय हुई थी, इस युद्ध में यूनान ने अद्वितीय वीरता दिखाई थी)। 
कर्नल टॉड ने महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, युद्ध कुशलता को स्पार्टा के योद्धाओं सा वीर बताते हुए लिखा है कि वे युद्धभूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से भी नहीं डरते थे। 
दिवेर युद्ध (Battle of Dewair) की योजना महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) ने अरावली स्थित मनकियावस के जंगलों में बनाई थी। भामाशाह द्वारा मिली राशि से उन्होंने एक बड़ी फौज तैयार कर ली थी। बीहड़ जंगल, भटकावभरे पहाड़ी रास्ते, भीलों, राजपूत, स्थानीय निवासियों की गुरिल्ला सैनिक टुकड़ियों के लगातार हमले और रसद, हथियार की लूट से मुगल सेना की हालत खराब कर रखी थी।
हल्दीघाटी (Battle of Haldighati) के बाद अक्टूबर 1582 में दिवेर का युद्ध (Battle of Dewair) हुआ। इस युद्ध में मुगल सेना की अगुवाई करने वाला अकबर (Akbar) का चाचा सुल्तान खां था। विजयादशमी का दिन था और महाराणा ने अपनी नई संगठित सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया। एक टुकड़ी की कमान स्वयं महाराणा (Maharana Pratap) के हाथ में थी, तो दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे।  
 
महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) की सेना ने महाराज कुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर के शाही थाने पर हमला किया। यह युद्ध इतना भीषण था कि प्रताप के पुत्र अमर सिंह ने मुगल सेनापति पर भाले का ऐसा वार किया कि भाला उसके शरीर और घोड़े को चीरता हुआ जमीन में जा धंसा और सेनापति मूर्ति की तरह एक जगह गड़ गया।
अकबर महाराणा प्रताप से बहुत डरता था इसलिए वो खुद दिवेर युद्ध (Battle of Dewair) से दूर रहा। अकबर ने नरपिशाच बहलोल खां को भिड़ा दिया हिन्दू वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप से। लड़ाई पूरे जोर पर थी और मुगलई गंद खा-खा के ताक़त का पहाड़ बने बहलोल खां का सामना हो गया वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप से।
अफीम के ख़ुमार में डूबी हुई सुर्ख नशेड़ी आँखों से भगवा अग्नि की लपट सी प्रदीप्त रण के मद में डूबी आँखें टकराईं और शुरू हुई जबरदस्त भिडंत। कुछ देर तक तो महाराणा प्रताप यूँ ही मज़ाक सा खेलते रहे मुगलिया बिलाव के साथ और फिर गुस्से में आकर अपनी तलवार के एक ही वार से घोड़े सहित हाथी सरीखे उस नरपिशाच का पूरा धड़ बिलकुल सीधी लकीर में चीर दिया। ऐसा फाड़ा कि बहलोल खां का आधा शरीर इस तरफ और आधा उस तरफ गिरा।
स्थानीय इतिहासकार बताते हैं कि दिवेर के इस युद्ध (Battle of Dewair 1582) के बाद यह कहावत बनी कि “मेवाड़ के योद्धा सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया करते हैं”।  
दिवेर के युद्ध (Battle of Dewair) में अपने सिपाहसालारों की यह गत देखकर मुगल सेना में बुरी तरह भगदड़ मची और राजपूत सेना ने अजमेर तक मुगलों को खदेड़ा। भीषण युद्ध के बाद बचे-खुचे 36000 मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। 
दिवेर के युद्ध (Battle of Dewair) ने मुगलों के मनोबल को बुरी तरह तोड़ दिया। दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुंदा, कुम्भलगढ़, बस्सी, चावंड, जावर, मदारिया, मोही, माण्डलगढ़ जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों पर कब्ज़ा कर लिया।   
 
स्थानीय इतिहासकार बताते हैं कि इसके बाद भी महाराणा (Maharana Pratap) और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ को छोड़ के मेवाड़ के अधिकतर ठिकाने/ दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए। यहां तक कि मेवाड़ से गुजरने वाले मुगल काफिलों को महाराणा को रकम देनी पड़ती थी।
ऐसे-ऐसे युद्ध-रत्न उगले हैं सदियों से भगवा चुनरी ओढ़े रण में तांडव रचने वाली हमारी मां भारती ने।
महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) के पास कभी कोई बड़ा साम्राज्य नहीं था, उनके पास कभी सोने का सिंहासन नहीं था, उनके पास सोने के लिए सोने की खाट या भोजन करने के लिए सोने के बर्तन नहीं थे, उन्होंने कभी भी एक शाही राजा की तरह अपना जीवन नहीं जिया, जैसा कि अकबर (Mughal Emperor Akbar) और उनकी संप्रभुता के तहत अधिकांश शासकों के पास था।
महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) ने कभी गुलामी नहीं स्वीकार की और इसलिए उनका नाम भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। वह दुनिया भर में एक प्रेरणा बन गए। अमेरिकी सेना से वियतनाम की जीत एक ऐसा महान उदाहरण है जिसमें वियतनाम के लोगों ने हल्दीघाटी युद्ध (Battle of Haldighati) के बाद महाराणा (Maharana Pratap) और उनके जीवन भर के संघर्ष की प्रशंसा की जिसके कारण वे लंबे समय तक शक्तिशाली अमेरिकी सेना से लड़ने में सक्षम हुए और अंततः उनकी जीत हुई, बिल्कुल महाराणा प्रताप की गुरिल्ला जैसी समान युद्ध रणनीति के साथ।
जय महाराणा प्रताप!!
जय राजपूताना!!
*नोट :- यह लेख विभिन्न इतिहासकारों के लेखों पर आधारित है

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अकबर का ये सच जान दंग रह जायेंगे आप https://sanjayrajput.com/2023/02/%e0%a4%85%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%9a-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%a6%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%af.html https://sanjayrajput.com/2023/02/%e0%a4%85%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%9a-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%a6%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%af.html#respond Mon, 13 Feb 2023 19:10:00 +0000 https://sanjayrajput.com/2023/02/13/%e0%a4%85%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%9a-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%a6%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%b0%e0%a4%b9-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%af/ Read more

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जैसा की हम सभी जानते हैं, मुगल बादशाहों के बारे में हमारे इतिहास में बहुत ही अच्छी-अच्छी बातें लिखी गईं हैं और उनका जमकर महिमामंडन करते हुए उन्हें महान दिखाने की भरपूर कोशिश की गई है। जबकि सच तो ये है की उनकी सारी कमियों और बुराइयों को छिपा दिया गया या बताया ही नहीं गया।
Mughal Story in Hindi 
जैसे मुगलों ने भारत को किस तरह लूटा, मंदिरों को तोड़कर कैसे मस्जिदों का रूप दिया, हिंदुओ पर कितने अत्याचार किए, कैसे लाखों हिंदुओ का कत्ल किया और लाखों हिंदुओं का जबरदस्ती धर्मांतरण करवाकर मुसलमान बना दिया आदि।
शायद हम में से कम ही लोग इस सच को जानते होंगे की शाहजहां ने अपनी ही सगी बेटी जहाँआरा से निकाह कर लिया था। 
Akbar Story in Hindi 
इससे भी बड़ी हैरानी की बात की इतिहास में एक महान मुगल बादशाह बताए गए अकबर की महानता का नमूना देखिए की उसने अपने ही पिता समान संरक्षक बैरम खां को मारकर उसकी बीबी से ही निकाह कर लिया था।
इसके अलावा अकबर की महानता का अगला सबूत देखिए की उसने अपनी ही बेटियों की शादी तक नहीं होने दी थी। 
तो आईए जानते हैं की आखिर वो कौन सी वजह थी जिसके चलते अकबर ने अपनी तीनों बेटियों की शादी तक नहीं होने दी थी और उन्हें जिंदगी भर कुंवारा रखा।

जितने भी मुगल बादशाह हुए हैं उन्होंने अपनी झूठी शान के लिए बहुत लोगों की जिंदगियां बर्बाद की हैं। यहां तक की उन्होंने अपने खून के रिश्तों तक को नहीं बक्शा।
अकबर ने भी अपनी झूठी शान के लिए ही अपनी तीनों बेटियों को जीवन भर कुंवारा रखा। यही नहीं उसने उन्हें पूरी उम्र कैद करके भी रखा था।
क्या आप जानते हैं कि ऐसा करने के पीछे क्या वजह थी? 
वजह यह थी की अकबर अगर अपनी बेटियों की शादी करता तो उसे उनके सामने झुकना पड़ता और अकबर को ये कतई मंजूर नहीं था। इसलिए अकबर ने अपनी झूठी शान के लिए अपनी तीनों बेटियों की शादी तक नहीं होने दी।
इसके अलावा अकबर ने अपनी तीनों बेटियों को एक महल में कैद करके रखा था जहां से वो कहीं भी आ जा ना सकें। और तो और अकबर ने उस महल में तैनात सभी सैनिकों के गुप्तांग भी कटवा दिए थे और किन्नरों को उनके महल की निगरानी में रखा था।
इसके पीछे वजह यह थी की अकबर नहीं चाहता था की उसकी बेटियां किसी भी तरह से किसी पुरूष के सम्पर्क में आएं। 
इस तरह अकबर ने अपनी सनक और झूठी शान के चलते अपनी तीनों बेटियों को जीवन भर कुंवारा रखा।
अकबर के द्वारा बनाई गई इस परंपरा को औरंगजेब, जहांगीर और शाहजहां ने भी कायम रखा और इन मुगल शासकों ने भी अपनी बेटियों की शादी नहीं होने दी।
जैसा की कहा जाता है, जो दिखता है वो होता नहीं और जो होता है वो दिखता नहीं। मुगलों के बारे में भी यही बात सच साबित होती है। इनके बारे में इतिहास में तो सब अच्छा अच्छा ही लिखा हुआ है लेकिन असली सच बहुत ही घिनौना और बदशक्ल है। 
हम सभी जानते हैं की एक गुप्त एजेंडे के तहत इतिहास में घटिया मुगल लुटेरों को महान बताया गया और मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले महाराणा प्रताप जैसे वीर योद्धाओं को हाशिए पर रखा गया। बॉलीवुड की फिल्मों ने भी इसी गुप्त एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम किया है।
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