पूर्वांचल – SanjayRajput.com https://sanjayrajput.com सच की ताकत Thu, 05 Jun 2025 06:16:35 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.4 https://sanjayrajput.com/wp-content/uploads/2024/07/cropped-91-98392-81815-20231027_230113.jpg पूर्वांचल – SanjayRajput.com https://sanjayrajput.com 32 32 235187837 Yogi Adityanath History in Hindi: गैंगस्टर्स के गढ़ गोरखपुर में कैसे उभरे योगी आदित्यनाथ? https://sanjayrajput.com/2025/05/yogi-adityanath-history-in-hindi.html https://sanjayrajput.com/2025/05/yogi-adityanath-history-in-hindi.html#respond Fri, 23 May 2025 05:57:16 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=1139 Read more

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हाता और शक्ति सदन की लड़ाई में कैसे हुई योगी आदित्यनाथ की एंट्री?

Yogi Adityanath History in Hindi: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ऐसा नाम है जिसने न केवल अपनी छवि बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीतिक दिशा को भी बदला है—योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath)। उनकी कहानी केवल एक राजनेता की नहीं, बल्कि एक ऐसे क्षेत्र की भी है जो कभी गैंगस्टर्स और अपराधियों के गढ़ के रूप में जाना जाता था। इस लेख में हम देखेंगे कि कैसे गोरखपुर के उस माहौल से निकलकर योगी आदित्यनाथ ने खुद को स्थापित किया और राजनीति की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई।

योगी आदित्यनाथ: असली नाम और शुरुआत

योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) का असली नाम है अजय सिंह बिष्ट, जो उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में जन्मे थे। उन्होंने धार्मिक शिक्षा ग्रहण की और महंत अवैद्यनाथ के सान्निध्य में रहकर गोरखपुर के प्रसिद्ध गोरखनाथ मंदिर से जुड़ गए। महंत अवैद्यनाथ के मार्गदर्शन में योगी ने न केवल धार्मिक गतिविधियों में बल्कि सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभाई।

गोरखपुर, जो कभी अपराधियों और गैंगस्टरों का गढ़ था, वहां योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने धार्मिक और सामाजिक सुधारों के साथ-साथ राजनीतिक सक्रियता भी दिखाई। उनके नेतृत्व में यह क्षेत्र धीरे-धीरे बदलने लगा।

गोरखपुर की राजनीतिक पृष्ठभूमि और अपराध की समस्या

गोरखपुर (Gorakhpur) का राजनीतिक इतिहास काफी जटिल रहा है। 1990 के दशक में यहां के हालात ऐसे थे कि अपराध और हिंसा आम बात थी। राजनीतिक दलों के बीच सत्ता संघर्ष और आपसी लड़ाइयों ने इस क्षेत्र को अस्थिर कर दिया था।

इस दौरान राम जन्मभूमि आंदोलन ने पूरे उत्तर भारत में राजनीतिक माहौल को गहरा प्रभावित किया। राम जन्मभूमि के मुद्दे ने हिंदू राष्ट्रवाद को बल दिया और उसी समय महंत अवैद्यनाथ जैसे धार्मिक नेताओं की भूमिका भी बढ़ी।

योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने इस संदर्भ में खुद को एक मजबूत हिंदू राष्ट्रवादी नेता के रूप में स्थापित किया। उन्होंने न केवल धार्मिक जनसमूह को संगठित किया, बल्कि राजनीतिक मोर्चे पर भी अपनी पकड़ मजबूत की।

महंत अवैद्यनाथ और योगी आदित्यनाथ का संबंध

महंत अवैद्यनाथ, गोरखनाथ मंदिर के पूर्व महंत और एक प्रभावशाली धार्मिक नेता थे, जिन्होंने योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के राजनीतिक करियर की नींव रखी। अवैद्यनाथ ने योगी को अपना उत्तराधिकारी बनाया और उन्हें गोरखपुर से विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया।

महंत अवैद्यनाथ स्वयं भी राजनीति में सक्रिय रहे और उनके प्रभाव ने योगी के राजनीतिक सफर को गति दी। योगी ने महंत जी के नक्शेकदम पर चलते हुए गोरखपुर (Gorakhpur) की राजनीति को नई दिशा दी।

उत्तर प्रदेश की राजनीतिक राजनीति: 1990 का दशक

1990 के दशक में उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई अहम घटनाएं हुईं, जिनका योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के उभार पर गहरा प्रभाव पड़ा। उस समय के राष्ट्रपति शासन, मंडल आयोग की सिफारिशें, और तत्कालीन प्रधानमंत्रियों जैसे अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, राजीव गांधी के दौर ने प्रदेश की राजनीति को जटिल बना दिया।

राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) की हत्या के बाद राजनीतिक स्थिरता में कमी आई, जिससे उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की राजनीति और भी अस्थिर हो गई। इसी बीच योगी आदित्यनाथ ने धार्मिक और सामाजिक आधार पर अपना जनाधार मजबूत किया।

राम जन्मभूमि आंदोलन और योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक उदय

राम जन्मभूमि आंदोलन ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। इस आंदोलन ने धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक ताकत में बदल दिया। योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और इसे अपनी राजनीतिक पहचान का आधार बनाया।

उन्होंने राम मंदिर के मुद्दे को राजनीतिक मंच पर उठाया और हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा को मजबूती से अपनाया। इस कारण वे उत्तर प्रदेश में बीजेपी के मजबूत चेहरों में से एक बने।

गोरखपुर से मुख्यमंत्री तक: योगी आदित्यनाथ का सफर

गोरखपुर से सांसद बनने के बाद योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने लगातार अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की। उनके नेतृत्व में गोरखपुर का विकास हुआ, साथ ही सामाजिक सुधारों पर भी जोर दिया गया। वे लगातार 5 बार गोरखपुर सीट से सांसद चुने गए।

2017 में, योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश में कानून-व्यवस्था, विकास और धार्मिकता के मुद्दे प्रमुख रहे।

कानून-व्यवस्था में सुधार

उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति सुधारने के लिए योगी सरकार ने कई कदम उठाए। गैंगस्टर और अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई, जिससे प्रदेश में अपराध दर में कमी आई।

धार्मिक और सामाजिक सुधार

धार्मिक स्थलों के विकास और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ योगी ने सामाजिक सुधारों पर भी ध्यान दिया। उन्होंने सामाजिक समरसता और विकास के लिए कई योजनाएं शुरू कीं।

राजनीतिक क़िस्से: गलतफहमियां और सुधार

राजनीतिक इतिहास में अक्सर गलतफहमियां और भ्रांतियां होती हैं। ऐसे मामलों में सत्य की खोज और सुधार आवश्यक होता है। यह दिखाता है कि राजनीति में तथ्यों की जांच और सही जानकारी का महत्व कितना बड़ा है। योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के राजनीतिक सफर में भी कई बार गलतफहमियां और आलोचनाएं आईं, लेकिन उन्होंने अपने कार्यों से अपनी छवि मजबूत की।

निष्कर्ष: योगी आदित्यनाथ और गोरखपुर की नई पहचान

गोरखपुर, जो कभी अपराध और अस्थिरता का केंद्र था, आज योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के नेतृत्व में एक नए युग में प्रवेश कर चुका है। उनकी धार्मिक जड़ों और राजनीतिक कुशलता ने इस क्षेत्र को न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी बदल दिया है।

योगी का सफर यह दिखाता है कि कैसे एक क्षेत्र की जटिल राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं को समझकर, सही नेतृत्व और दृढ़ इच्छाशक्ति से बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है। उनकी कहानी न केवल गोरखपुर के लिए प्रेरणा है, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश और भारत के लिए भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अध्याय है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) की भूमिका आज भी चर्चा का विषय बनी हुई है, और उनकी कहानी राजनीतिक क़िस्सों में एक प्रेरणादायक मिसाल के रूप में याद रखी जाएगी।

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10 दिन में 2 क्षत्रियों की हत्या पर नेता और मीडिया मौन क्यों हैं? https://sanjayrajput.com/2024/11/why-are-leaders-and-media-silent-on-the-murder-of-2-kshatriya-youth-in-10-days.html https://sanjayrajput.com/2024/11/why-are-leaders-and-media-silent-on-the-murder-of-2-kshatriya-youth-in-10-days.html#respond Wed, 20 Nov 2024 06:14:22 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=851 Read more

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देवरिया के एकौना थाना क्षेत्र के हौली बलिया गांव निवासी, गोरखपुर के दिग्विजय नाथ पीजी कॉलेज में बीकॉम (2nd Year) का छात्र विशाल सिंह श्रीनेत (उम्र 22 वर्ष). सभी का सम्मान करने वाला, संस्कारी, हंसमुख, मिलनसार, सामाजिक और आकर्षक व्यक्तित्व, हमेशा दूसरों के दुख सुख में खड़ा रहने वाला युवक, जिसकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं, विगत 16 नवंबर की रात लगभग 9 बजे घर से कुछ ही दूरी पर धोखे से उसकी निर्मम हत्या कर दी गई। 

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हत्या करने वालों ने पहले विशाल के सीने, जांघ और शरीर के अन्य हिस्सों पर धारदार चाकू से लगातार वार किए फिर उसे सड़क पर लेटाकर गाड़ी से कुचलकर बेरहमी से मार डाला।

विशाल के पिता विनीत सिंह के अनुसार इस घटना से कुछ देर पहले विशाल की मां ने जब बेटे को फोन किया तो उसने बताया कि वह किसी राहुल अली नाम के व्यक्ति के साथ है और थोड़ी देर में घर वापस आ जाएगा।

कुछ देर बाद जब फिर घरवालों ने विशाल को फोन किया तो फोन किसी राहगीर ने उठाया और घरवालों को उसके सड़क पर खून से लथपथ पड़े होने की बात बताई। बदहवास घरवाले घटनास्थल पर पहुंचे और आनन फानन विशाल को लेकर गोरखपुर मेडिकल कॉलेज ले गए जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

विशाल के पिता रोते हुए बताते हैं कि विशाल की मौत परिजनों के घटनास्थल पर पहुंचने से पहले ही हो चुकी थी लेकिन अपनी तसल्ली के लिए उसे अस्पताल लेकर गए थे।

स्थानीय लोगों के अनुसार पहले विशाल को चाकुओं से बुरी तरह मारा गया था फिर हत्या को एक्सीडेंट साबित करने की कोशिश की गई थी। एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि सड़क पर जहां विशाल को मारकर लिटाया गया था वहां बहुत ज्यादा खून बहा हुआ दिखाई दे रहा था।

यहां बता दें कि विशाल अपने माता पिता का एकलौता पुत्र था और उसकी हत्या से घर का चिराग हमेशा के लिए बुझ गया।

मृतक विशाल के पिता विनीत सिंह भाजपा के पुराने कार्यकर्ता हैं और अपने एकलौते बेटे की बेरहमी से हत्या होने के बाद भी हत्या के तीसरे दिन 18 नवंबर तक उन्हें भाजपा सरकार और पुलिस प्रशासन पर पूरा भरोसा था कि उनके बेटे को मारने वालों को योगी सरकार में बक्शा नहीं जाएगा। बातचीत से वे पुलिस प्रशासन के प्रति पूरी तरह आश्वस्त दिखाई देते थे। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि उनकी अपनी भाजपा सरकार में उन्हें न्याय जरूर मिलेगा।

बता दें कि विशाल सिंह एक छात्र नेता भी था और सामाजिक कार्यों और विषयों पर पूरी तरह मुखर था। वह करणी सेना भारत से भी जुड़ा हुआ था।

पिछले दिनों देवरिया जिले के समोगर निवासी नेहाल सिंह की 7 नवंबर छठ त्यौहार के दिन करीब 11.30 बजे सुरौली थाना क्षेत्र में गोली मारकर हत्या कर दी गई। एक छात्र नेता और मुखर युवा होने के नाते विशाल ने नेहाल सिंह की हत्या करने वाले अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए हर तरह से आवाज बुलंद की।

नेहाल सिंह के परिजनों की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हुए विशाल सिंह ने स्थानीय विधायक शलभ मणि त्रिपाठी के खिलाफ भी सोशल मीडिया पर मोर्चा खोल दिया था।

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18 नवंबर को राष्ट्रवादी क्षत्रिय संघ भारत तथा अन्य क्षत्रिय संगठनों के अलावा करणी सेना भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष वीरू सिंह विशाल सिंह के गांव हौली बलिया आए और पुलिस प्रशासन से विशाल के हत्यारों का जल्द से जल्द एनकाउंटर किए जाने की मांग भी की।

दिनांक 19 नवंबर की सुबह खबर आती है कि पुलिस मुठभेड़ में विशाल सिंह हत्याकांड का एक आरोपी रजा खान पुत्र इदरीश जो गोरखपुर के घोसीपुरवा मोहल्ले का रहने वाला था उसे पुलिस ने पैर में गोली मारकर पकड़ लिया है और उसके पास से हत्या में प्रयुक्त चाकू भी बरामद किया गया है। पुलिस के अनुसार रजा खान ने पुरानी रंजिश में विशाल की हत्या करने की बात स्वीकार की है।

सबसे हैरानी की बात कि एक ही जिले में 10 दिनों के अंदर दो-दो युवाओं की निर्मम हत्या हो जाती है। दोनों अपने मां बाप के एकलौते पुत्र थे, घर का चिराग बुझा दिया गया और कोई जन प्रतिनिधि सांसद, विधायक, मंत्री परिजनों से मिलने नहीं पहुंचा।

देवरिया सदर से भाजपा सांसद शलभ मणि त्रिपाठी जिन्होंने कुछ दिनों पूर्व जिले में एक ब्राह्मण की हत्या होने पर एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था और बयान दिया था कि दोषियों पर ऐसी कार्रवाई होगी जो नजीर बनेगी। उस समय विधायक जी ने अपने सजातीय की हत्या पर खुलकर आरोपियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। साथ ही पीड़ित परिवार को आर्थिक मदद भी दिलाई गई थी। सीएम योगी आदित्यनाथ भी जीवित बचे घायल लड़के से मिलने गोरखपुर मेडिकल कॉलेज पहुंचे थे।

लेकिन इस बार नेहाल सिंह की हत्या पर न तो विधायक जी नेहाल सिंह के परिवार से मिलने ही पहुंचे, न ही उन्हें ढाढस बंधाया। हां, जातिवादी होने का आरोप लगने पर उन्होंने औपचारिकता निभाते हुए डीजीपी को नेहाल सिंह हत्याकांड में कार्रवाई हेतु एक पत्र जरूर लिखा था।

नेहाल सिंह की हत्या को 15 दिन होने को हैं लेकिन आज तक कोई भी जन प्रतिनिधि नेहाल सिंह के परिवार से मिलने नहीं पहुंचा और न तो परिवार द्वारा नामजद तीनों हत्यारोपियों आशीष पांडे, अनुराग गुप्ता एवं दीपक मिश्रा को पुलिस पकड़ने में ही कामयाब हो पाई है।

यही स्थिति विशाल सिंह की हत्या के बाद भी देखने को मिल रही है। अभी तक कोई भी जन प्रतिनिधि, सांसद, विधायक, मंत्री आदि विशाल सिंह के परिजनों से मिलने नहीं पहुंचा। जबकि मृतक के पिता भाजपा से जुड़े हैं और पुराने पदाधिकारी भी हैं।

पिछले दिनों यूपी पुलिस द्वारा जब एक कुख्यात अपराधी का एनकाउंटर किया गया तो उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तत्काल उसके घर पहुंचे और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उन्होंने एक अपराधी के एनकाउंटर को भी फेक और हर तरह से गलत बताया। ऐसा इसलिए क्योंकि वो भले ही अपराधी था लेकिन अखिलेश यादव का सजातीय था।

ज्ञात हो कि विशाल सिंह का गांव बांसगांव संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जहां के भाजपा सांसद केंद्रीय मंत्री कमलेश पासवान हैं। उन्हें भी आज तक विशाल के परिजनों से मिलने की फुरसत नहीं मिल पाई।

यदि किसी दलित पिछड़े या मुस्लिम की हत्या होती है तो मीडिया से लेकर नेताओं तक में उबाल आ जाता है। लेकिन दो दो क्षत्रिय युवाओं की हत्या पर सब खामोश हैं?

विपक्षी आरोप लगाते हैं कि सूबे की योगी सरकार ठाकुरवादी सरकार है, हर तरफ ठाकुरवाद हो रहा है। क्या यही ठाकुरवाद है?

विशाल सिंह एक ऐसा युवा था जो सभी जाति वर्ग के लोगों के सुख दुख में हमेशा खड़ा रहता था। लेकिन अफसोस की उसकी हत्या पर सब खामोश हैं, कोई उसके लिए न्याय की मांग नहीं कर रहा, कोई उसके परिजनों के आंसू पोछने नहीं जा रहा।

विशाल सिंह की निर्मम और बर्बरतापूर्ण हत्या से कोई आक्रोशित क्यों नहीं है? क्या कुसूर था उस युवा का? क्या उसका क्षत्रिय होना ही उसका सबसे बड़ा गुनाह था?

लाशों पर भी अपनी राजनीति की रोटी सेंकने वाले नेता एक 22 साल के युवा की मौत पर मौन क्यों हैं?

इससे साबित होता है कि मरने वाले की जाति देखकर नेता लोग संवेदना व्यक्त करते हैं।

पूर्वांचल में 10 दिनों के अंदर हुई इन दो युवाओं की हत्याओं ने सभी अवसरवादी नेताओं की असलियत सामने लाकर रख दी है। 

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बलिया में पुलिस वाले कर रहे थे वसूली, एडीजी की छापेमारी में खुली पोल https://sanjayrajput.com/2024/07/adg-raid-in-narahi-ballia.html https://sanjayrajput.com/2024/07/adg-raid-in-narahi-ballia.html#respond Thu, 25 Jul 2024 18:22:28 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=577 Read more

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मुख्यमंत्री के निर्देश पर एडीजी जोन ने की बड़ी कार्यवाही, बिहार से आने वाली गाड़ियों से 500 रूपये की होती थी वसूली

यूपी सरकार ने बलिया के एसपी और एएसपी दोनों को हटा दिया है। साथ ही सीओ, एसएचओ और चौकी इंचार्ज के खिलाफ विजिलेंस जांच शुरू की गई ही जो इनकी संपत्ति की भी जांच करेगी। ये कार्यवाही बलिया के नरही थाना क्षेत्र के भरौली बक्सर बार्डर पर एडीजी वाराणसी जोन की गुप्त जांच के बाद की गई है।

बलिया में रात भर ऑपरेशन में ADG और DIG ने अपनी ही पुलिस के कई जवानों से पूछताछ कर उन्हें गिरफ्तार किया, जिसके बाद से इंस्पेक्टर पन्नेलाल अपनी ही कोतवाली से कूदकर फरार हो गया है।

बलिया के नरही थाना क्षेत्र के भरौली बक्सर बार्डर पर एडीजी वाराणसी जोन कि गुप्त कार्यवाही मे खुली भ्रष्टाचार की पोल।

सुबह सवेरे एडीजी कि कार्यवाही मे मौके से 16 प्राइवेट दलाल और दो थाने के सिपाहियों की हुई गिरफ्तारी।

मौके से तीन सिपाही भागने मे रहे कामयाब। जबकि एडीजी जोन की कार्यवाही मे मौके से वसूली रजिस्टर और भारी मात्रा मे मोबाईल फोन हुए बरामद।

नरही थाने के बैरको से मिले 37500 रुपए नगद। जबकि एसओ के आवास को किया गया सीज।

मुख्यमंत्री के निर्देश पर एडीजी जोन ने की बड़ी कार्यवाही, बिहार से आने वाली गाड़ियों से 500 रूपये कि होती थी वसूली।

एडीजी जोन की इस छापेमारी मे हुई बड़ी कार्यवाही। नरही एसओ हुए सस्पेंड 9 सिपाहियों के विरुद्ध मुकदमा हुआ दर्ज़, वही कोरन्टाडीह के सभी चौकी इंचार्ज समेत सभी कर्मी हुए सस्पेंड ।

एड़ीजी की इस कार्यवाही से पुलिस महकमे और दलालों मे हड़कंप मच गया है।

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इंटरनेशनल कराटे प्रतियोगिता में चयनित खिलाड़ियों को क्षत्रिय महासभा ने किया सम्मानित https://sanjayrajput.com/2024/07/kshatriya-mahasabha-honoured-to-candidates-selected-in-iskk.html https://sanjayrajput.com/2024/07/kshatriya-mahasabha-honoured-to-candidates-selected-in-iskk.html#respond Thu, 18 Jul 2024 16:19:01 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=495 Read more

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-इंटरनेशनल सोतोकान कराटे डू- क्योंकाई यूपी के महासचिव दीपक शाही अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा खेलकूद प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष गोरखपुर मनोनीत

गोरखपुर। अंतर्राष्ट्रीय कराटे प्रतियोगिता (ISKK) में कराटे ट्रेनिंग सेंटर गोरखपुर के चयनित 12 खिलाड़ियों का गुरुवार को अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा द्वारा स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

गगहा निवासी अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के मंडल सचिव अनिल सिंह के सिद्धार्थ एनक्लेव गोरखपुर स्थित आवास पर आयोजित एक सम्मान समारोह में इंटरनेशनल सोतोकान कराटे डू- क्योंकाई में गोरखपुर के ग्रामसभा गोला बाजार के 6 तथा ग्रामसभा बांसगांव के 6 चयनित खिलाड़ियों को क्षत्रिय महासभा ने सम्मानित किया।

इस अवसर पर एसोसिएशन के महासचिव दीपक शाही ने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय कराटे प्रतियोगिता (ISKK) में चयनित खिलाड़ी कोलकाता के नेताजी इनडोर स्टेडियम कोलकाता में 26, 27 और 28 जुलाई 2024 के बीच होने वाली अंतर्राष्ट्रीय कराटे प्रतियोगिता में हिस्सा लेंगे। जिसमें भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मलेशिया, सऊदी अरबिया तथा ईरान के कराटे खिलाड़ी हिस्सा लेंगे।

अंतर्राष्ट्रीय कराटे प्रतियोगिता (ISKK) में जिन 12 कराटे खिलाड़ियों का चयन हुआ है उनमें गोला बाजार के रतन कुमार (18), जितेंद्र कुमार (17), आबिद हुसैन (19), मंगेश कुमार (14), उदित विश्वकर्मा (11), राजकपूर (13) तथा बांसगांव क्षेत्र के शिवांश सिंह (16), आदित्य सिंह (15), आयुष कुमार सिंह (15), विशाल भारती (18), अनमोल राव (17) तथा सतीश मौर्य (18) हैं।

अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के गोरखपुर जिलाध्यक्ष ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय कराटे प्रतियोगिता (ISKK) में चयनित होकर इन खिलाड़ियों ने अपने गांव, जिले और प्रदेश को गौरवान्वित किया है। इन खिलाड़ियों का सम्मान करके क्षत्रिय महासभा स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रही है।

इस अवसर पर क्षत्रिय महासभा के प्रदेश अध्यक्ष खेलकूद प्रकोष्ठ रंजीत शाही ने इंटरनेशनल सोतोकान कराटे डू- क्योंकाई यूपी के महासचिव दीपक शाही को अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा खेलकूद प्रकोष्ठ का जिलाध्यक्ष गोरखपुर मनोनीत भी किया।

इस अवसर पर मुख्य रूप से क्षत्रिय महासभा के प्रदेश अध्यक्ष उग्रसेन सिंह, प्रदेश अध्यक्ष खेलकूद प्रकोष्ठ रंजीत शाही, जिलाध्यक्ष लालू सिंह, मंडल सचिव अनिल सिंह, जिला महामंत्री राजकुमार सिंह, मंडल अध्यक्ष युवा प्रकोष्ठ अनुज सिंह कटका, संगठन मंत्री प्रवीण सिंह सहित संगठन के दर्जनों लोग उपस्थित रहे।

इस कार्यक्रम का वीडियो नीचे देखें-

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Yogi Adityanath Story in Hindi: जानिए यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के जीवन से जुड़ी ये खास बातें https://sanjayrajput.com/2021/06/yogi-adityanath-story-in-hindi.html https://sanjayrajput.com/2021/06/yogi-adityanath-story-in-hindi.html#respond Sat, 05 Jun 2021 09:19:00 +0000 https://sanjayrajput.com/2021/06/05/%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%8f-%e0%a4%af%e0%a5%82%e0%a4%aa%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%8f%e0%a4%ae-%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a6/ Read more

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Yogi Adityanath Story in Hindi: यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ (CM Yogi Adityanath) 5 जून 2025 को 53 साल के हो गए हैं। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के पंचूर गांव में  5 जून 1972 को एक राजपूत परिवार में जन्मे अजय सिंह बिष्ट (Ajay Singh Bisht) गोरखपुर (Gorakhpur) पहुंचकर योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) बन गए। देश के सबसे बड़े सूबे की सत्ता के सिंहासन पर योगी विराजमान हैं। महज 26 साल की उम्र में संसद पहुंचने वाले योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) 45 साल की उम्र में यूपी के सीएम बने। आज उत्तरप्रदेश ही नहीं बल्कि देश की सियासत में उन्हें हिंदुत्व के सबसे बड़े चेहरे के तौर पर जाना जाता है। उनके प्रशंसक उन्हें देश के भावी प्रधानमंत्री के तौर पर भी देखते हैं।

योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के गोरखनाथ (Gorakhnath) मठ के पीठाधीश्वर से देश के सबसे ताकतवर सीएम बनने के सफर की कहानी भी किसी फिल्मी स्टोरी से कम नहीं है। तो आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी ये रोचक कहानी।

योगी आदित्यनाथ का जन्म (Yogi Adityanath Birth) yogi adityanath ka janm kab hua tha

योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) का जन्म उत्तराखंड (Uttrakhand) के एक साधारण राजपूत परिवार में हुआ. इनके पिता का नाम (Yogi Adityanath ke pita ka nam) आनंद सिंह बिष्ट और माता का नाम (Yogi Adityanath ki mata kanam) सावित्री देवी है.

शिक्षा (Yogi Adityanath Education)

(Yogi Adityanath ki padhai)
योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने 1989 में ऋषिकेश के भरत मंदिर इंटर कॉलेज से 12वीं की परीक्षा पास की और 1992 में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय (Hemwati Nandan Bahuguna Garhwal University) से गणित में B.Sc की पढ़ाई पूरी की। इसी कॉलेज से उन्होंने M.Sc भी किया।

कहा जाता है कि योगी आदित्यनाथ को शुरूआत से ही राजनीति में लगाव था। वह अपने कॉलेज के दिनों में छात्र संघ का चुनाव भी लड़े। लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। लेकिन ये कौन जानता था कि एक छोटे से छात्रसंघ का चुनाव हारने वाला युवा नेता, भारत के सबसे बड़े प्रदेश का मुख्यमंत्री बनेगा। छात्र जीवन में ही वो राममंदिर आंदोलन (Ram Mandir Andolan) से जुड़ गए थे।

अजय सिंह बिष्ट से योगी आदित्यनाथ

(Ajay Singh Bisht se Yogi Adityanath)
90 के दशक में राममंदिर आंदोलन (Ram Mandir Andolan) के दौरान ही योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) की मुलाकात गोरखनाथ मंदिर (Gorakhnath Mandir) के महंत अवैद्यनाथ (Mahanth Awaidyanath) से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad) के एक कार्यक्रम में हुई। इसके कुछ दिनों बाद योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) अपने माता-पिता को बिना बताए गोरखपुर (Gorakhpur) जा पहुंचे, जहां संन्यास धारण करने का निश्चय लेते हुए गुरु दीक्षा ले ली। गोरखनाथ मठ के महंत अवैद्यनाथ भी उत्तराखंड के ही रहने वाले थे। महंत अवैद्यनाथ का शिष्य बनने के बाद योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने धर्म से लेकर शास्त्र की शिक्षा ली। योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) की कई परीक्षाएं लेने के बाद महंत अवैद्यनाथ ने उत्तराधिकारी के लिए योगी आदित्यनाथ को चुना और अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। इस तरह वे गोरखनाथ (Gorakhnath) मठ के महंत बनकर अजय सिंह बिष्ट (Ajay Singh Bisht) से योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) बन गए।

राजनैतिक जीवन की शुरुआत

(Political Career of Yogi Adityanath)
गोरखनाथ मंदिर (Gorakhnath Mandir) के महंत की गद्दी का उत्तराधिकारी बनाने के चार साल बाद ही महंत अवैद्यनाथ ने योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी भी बना दिया। गोरखपुर (Gorakhpur) से महंत अवैद्यनाथ चार बार सांसद रहे, उसी सीट से योगी 1998 में 26 वर्ष की उम्र में लोकसभा पहुंचे और फिर लगातार 2017 तक पांच बार सांसद रहे।
सियासत में कदम रखने के बाद योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) की छवि एक कठोर हिंदुत्ववादी नेता के तौर पर उभरी। सांसद रहते हुए गोरखपुर (Gorakhpur) जिले को अपने नियम अनुसार चलाने और त्वरित फैसलों से उन्होंने सबको चकित किया। इसी के चलते योगी (Yogi) के सियासी दुर्ग को न तो मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) का समाजवाद (Samajwad) भेद पाया और न ही मायावती (Mayawati) की सोशल इंजीनियरिंग (Social Engineering) ही यहाँ काम आई। गोरखपुर (Gorakhpur) में हमेशा योगी का हिंदुत्व कार्ड ही हावी रहा। योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने अपने 19 साल के सियासी कैरियर में न केवल गोरखपुर बल्कि पूर्वांचल की कई अन्य सीटों पर भी अपना प्रभाव कायम किया।

हिंदू युवा वाहिनी का गठन (Hindu Yuva Vahini)

योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने अपनी निजी सेना हिंदू युवा वाहिनी (Hindu Yuva Vahini) का निर्माण किया जो धर्म रक्षा, गौ सेवा करने व हिंदू विरोधी गतिविधियों से निपटने के लिए बनाई गई थी। हिंदू युवा वाहिनी ने गोरखपुर में ऐसा माहौल तैयार किया, जिसके चलते आज तक उन्हें कोई चुनौती नहीं दे सका। एक तेजतर्रार राजनीतिज्ञ के रूप में अपनी छवि योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने बना ली थी।

यूपी का सीएम बनने तक का सफर (The Making of UP CM Yogi Adityanath)

योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) की सबसे बड़ी खासियतों में एक है कि वह जनता से सीधा संवाद करने में विश्वास रखते हैं। 2017 में बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिला तो सीएम के लिए कई चेहरे दावेदार थे, लेकिन बाजी योगी के हाथ ही लगी।

कानून व्यवस्था पहली प्राथमिकता, अपराधियों में खौफ

योगी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने फैसलों से अपनी राजनीतिक इच्छा को जाहिर कर दिया। उनकी पहली प्राथमिकता थी यूपी को अपराध मुक्त कर लॉ एंड आर्डर सही करना। इसके लिए उन्होंने कुछ कड़े निर्णय भी लिए, हालांकि प्रदेश में हुए ताबड़तोड़ एनकाउंटरों के कारण विपक्ष ने उन पर उंगलियां भी उठाईं, लेकिन कानून-व्यवस्था पर सख्त योगी पर इसका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा।
सीएम बनते ही योगी ने अपराधियों पर ऐसा शिकंजा कसा कि यूपी के सभी अपराधी और माफिया त्राहि त्राहि करने लगे। हालात ऐसे हो गए कि पिछली सरकारों में राजनीतिक संरक्षण प्राप्त बड़े बड़े माफिया सरगना नेस्तनाबूद हो गए। ऐसा पहली बार हुआ जब माफियाओं और अपराधियों की चल अचल संपत्तियों को तहस नहस करके कानून की हनक का अहसास कराया गया। योगी के सीएम बनने के बाद अपराधियों में इतना खौफ पैदा हो गया था कि वह खुद थाने जाकर सरेंडर कर रहे थे।
राज्य के अपराधी खासतौर से मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद जैसे माफिया जो दूसरे राज्यों से अपना नेटवर्क चला रहे थे, उन्हें प्रदेश में वापस लाया गया और उनके साम्राज्य को मिट्टी में मिला दिया गया।        ।

कोरोना काल में किया उत्कृष्ट प्रदर्शन

2020 के कोरोना संकट काल में सीएम योगी सीधे तौर पर सक्रिय नजर आए, जिससे उनकी लोकप्रियता में और भी इजाफा हुआ। वे ऐसे पहले मुख्यमंत्री बने जिन्होंने कोरोना काल में लगातार अपनी जनता का हर तरह से ख्याल रखा। प्रवासी मजदूरों को दूसरे राज्यों से वापस लाने तथा उनके लिए आजीविका के संसाधन जुटाने में योगी ने जो उत्कृष्ट कार्य किया उसके लिए उनकी तारीफ पूरी दुनिया में हुई।

2021 में आई कोरोना की दूसरी लहर में भी योगी आदित्यनाथ ने जनसंख्या में अन्य राज्यों की तुलना में बहुत बड़े 24 करोड़ आबादी वाले प्रदेश को जिस तरह संभाला है वह काबिले तारीफ है। दूसरी लहर में कोरोना से हुई मौतों के मामले में दिल्ली जैसे कम जनसंख्या वाले राज्यों से तुलना करें तो उत्तरप्रदेश की स्थिति काफी हद तक बेहतर रही।

खुद कोरोना की चपेट में आ जाने के बावजूद रिकवर होते ही लगातार एक दिन में कई कई जिलों का दौरा करके हर जिले में बेड, ऑक्सीजन, दवा, इंजेक्शन आदि की उपलब्धता को सुनिश्चित करने का जो कार्य यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ (Yogi Aditynath) ने किया है वह उत्कृष्ट और सराहनीय है।

विश्व भर में हिन्दुत्व का सबसे बड़ा चेहरा

योगी आदित्यनाथ सिर्फ यूपी में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में हिन्दुत्व का सबसे बड़ा चेहरा बन चुके हैं। साथ ही देश की राजनीति में भी एक प्रमुख चेहरा बन चुके है। ये सच है कि 2017 का यूपी विधान सभा चुनाव बीजेपी ने मोदी के चेहरे पर जीता था, लेकिन आज की तारीख में बीजेपी योगी को अनदेखा करने के बारे में सोच भी नहीं सकती। योगी आदित्यनाथ का कद राजनीति में अब इतना बड़ा हो चुका है की भाजपा उन्हें किनारे लगाने के बारे में सोच भी नहीं सकती वरना देशभर से हिन्दुत्ववादी वोट भाजपा से एक झटके में दूर हो सकता है। नहीं भूलना चाहिए कि आदित्यनाथ भले ही कर्म से योगी हों, लेकिन जन्म से तो वह क्षत्रिय ही हैं और क्षत्रिय झुकने से अधिक टूट जाने में विश्वास करता है।
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पूर्वांचल के माफियाओं और शूटरों का पसंदीदा आशियाना बना नवाबों का शहर लखनऊ https://sanjayrajput.com/2021/02/%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%94%e0%a4%b0.html https://sanjayrajput.com/2021/02/%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%94%e0%a4%b0.html#respond Sun, 28 Feb 2021 03:45:00 +0000 https://sanjayrajput.com/2021/02/28/%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%94%e0%a4%b0/ Read more

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यूपी की राजधानी लखनऊ एक लंबे अरसे से पूर्वांचल के माफियाओं की मनपसन्द शरणस्थली रही है। यही कारण है कि अक्सर यहाँ दिनदहाड़े गैंगवार और ताबड़तोड़ फायरिंग की घटनाएं आम बात हो गयी है। पिछले कुछ साल से पूर्वांचल के सभी जिलों के माफिया के गुर्गों और शूटरों ने भी राजधानी में अपने छुपने और ऐशो-आराम के अड्डे बना लिए हैं। शहर के पॉश इलाकों में साल-दर साल बढ़ रहीं गैंगवॉर और एनकाउंटर की घटनाएं इसका सबसे बड़ा सबूत हैं।

यूपी के अन्य जिलों से जिलाबदर होने या पुलिस की कार्रवाई से बचने के लिए ज्यादातर अपराधी लखनऊ आ जाते हैं और अपनी पहचान छिपाकर आलीशान फ्लैटों में ऐशो-आराम से रहते हैं। किराएदारों का पुलिस सत्यापन न होने से ये अपराधी पुलिस की पकड़ में भी नहीं आते।

मुख्तार अंसारी का शूटर था अजीत सिंह
विभूतिखंड के कठौता चौराहे के पास विगत 6 जनवरी 2021 बुधवार की रात एक गैंगवॉर में मऊ के पूर्व ब्लॉक प्रमुख अजीत सिंह की हत्या कर दी गई थी। पुलिस की शुरुआती छानबीन में पता चला कि मऊ से जिलाबदर होने के बाद अजीत सिंह लखनऊ आकर रह रहा था।

पूर्व आईजी आरके चतुर्वेदी का कहना हैं कि अजीत सिंह कोई माफिया नहीं है, बल्कि मुख्तार अंसारी का महज एक शूटर था। पुलिस के मुताबिक, वह राप्ती अपार्टमेंट में किराए पर रहता था। करीब दो माह पहले वह अलकनंदा का प्लैट छोड़कर यहां रहने आया था। इसके अलावा अन्य कई शूटरों की लोकेशन भी इसी इलाके में मिली है।
पुलिस के लिए मुसीबत बना अपार्टमेंट कल्चर
विगत कुछ वर्षों से राजधानी लखनऊ में अपार्टमेंट कल्चर की बाढ़ सी आ गयी है। चिनहट, गोमतीनगर, गोमतीनगर विस्तार, विभूतिखंड, एल्डको और सुशांत गोल्फ सिटी में बने अपार्टमेंटों में ज्यादातर लोगों ने निवेश के नाम पर फ्लैट लेकर किराए पर दे रखे हैं। ऐसे अपार्टमेंट में किराए पर रहने वाले लोगों का पुलिस सत्यापन तक नहीं होता। ऐसे में संदिग्ध लोग बड़े आराम से इन फ्लैटों में किराए पर रहने लगते हैं।

विगत दिनों विभूतिखंड जैसे पॉश इलाके में पुलिस चौकी से कुछ ही दूरी पर इस तरह की घटना गम्भीर चिंता का विषय है। अब माफियाओं के शूटर लखनऊ में आकर आपराधिक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं और यहीं छुप रहे है तो पुलिस के सूचना तंत्र पर सवाल उठना तो लाजिमी है। ऐसे में बेहतर ट्रेनिंग और सूचना तंत्र को मजबूत करने की जरूरत है – विक्रम सिंह (पूर्व डीजीपी)
राजधानी लखनऊ में है हर माफिया का ठिकाना
राजधानी लखनऊ और पूर्वांचल के माफियाओं का रिश्ता कई दशक पुराना है। पूर्व आईजी आरके चतुर्वेदी बताते हैं कि पूर्वांचल के माफियाओं के लिए लखनऊ हमेशा से एक मुफीद जगह रही है। चाहे हरीशंकर तिवारी हो या वीरेंद्र शाही, पूर्वांचल के माफिया लखनऊ में आकर ऐशो-आराम की जिंदगी गुजारते थे और यहीं रहकर राजनीति में भी घुसे।


गौरतलब है कि माफिया श्रीप्रकाश शुक्ला ने अपनी शुरुआत तो गोरखपुर से की थी लेकिन बाद में उसने लखनऊ को अपना आशियाना बना लिया। उसने लखनऊ में कई आलीशान मकान किराए पर लिए थे और यहीं से अपना गैंग भी ऑपरेट करता था। इतना ही नहीं, माफिया मुख्तार अंसारी, बबलू श्रीवास्तव, बृजेश सिंह, धनंजय सिंह या फिर मुन्ना बजरंगी हों, सभी ने लखनऊ में अपना-अपना कोई न कोई ठिकाना बना रखा है। गोरखपुर के टॉप 10 में शामिल माफिया अजीत शाही ने भी लखनऊ में ही अपना ठिकाना बना रखा है। विनोद उपाध्याय, चंदन सिंह आदि का भी ठिकाना लखनऊ में रहा है।
राजधानी लखनऊ ही क्यों है माफियाओं की पसंदीदा जगह?
पूर्व आईजी आरके चतुर्वेदी कहते हैं कि पश्चिमी यूपी के बदमाशों और माफियाओं को लखनऊ कभी भी रास नहीं आया। पश्चिम के माफिया और उनके गुर्गों ने हमेशा दिल्ली, हरियाणा, नोएडा और गुड़गांव को ही अपनी शरणस्थली के रूप में चुना। इसी तरह यूपी की राजधानी लखनऊ पूर्वांचल के माफियाओं के लिए दिल्ली के बराबर है। छुपने की सुरक्षित जगह से लेकर हाई क्लास सोसायटी तक सब कुछ राजधानी लखनऊ में मिलता है।


लखनऊ में साल दर साल बढ़ रहीं हैं वारदातें
28 जनवरी, 2014: लखनऊ के विशालखंड में किराए पर रहने वाले हिस्ट्रीशीटर झूंसी (प्रयागराज) निवासी आशीष मिश्र और उसके साथी रोहित की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई।
5 मार्च, 2016: मुन्ना बजरंगी के साले पुष्पजीत सिंह को विकासनगर में शूटरों ने ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर छलनी कर दिया। इसमें पुष्पजीत का दोस्त संजय भी मारा गया था।
1 दिसंबर, 2017:  मुन्ना बजरंगी का दाहिना हाथ माने जाने वाले तारिक को गोमतीनगर में ग्वारी पुल पर शूटरों ने गोलियों से भून दिया। चार गोली लगने से मौके पर ही तारिक की मौत हो गई।


4 नवंबर, 2019:  विभूतिखंड में यूपी एसटीएफ ने 50 हजार रुपये के इनामी बदमाश सचिन पांडेय को मुठभेड़ में मार गिराया। सचिन ने एक ग्राम प्रधान और एक पुलिसकर्मी की हत्या की सुपारी ली थी। उसने लखनऊ के गोमतीनगर विस्तार में एक फ्लैट में शरण ले रखी थी।
8 अगस्त, 2020:  बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की हत्या में शामिल माफिया मुख्तार अंसारी और मुन्ना बजरंगी के करीबी शूटर राकेश पांडेय उर्फ हनुमान पांडेय को एसटीएफ ने सरोजनीनगर इलाके में मार गिराया। राकेश ने भी राजधानी लखनऊ में ही अपना ठिकाना बना रखा था।

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वो दौर जब गोरखपुर था ‘अपराधों की राजधानी’ https://sanjayrajput.com/2020/05/once-upon-time-in-gorakhpur.html https://sanjayrajput.com/2020/05/once-upon-time-in-gorakhpur.html#respond Tue, 26 May 2020 12:26:00 +0000 https://sanjayrajput.com/2020/05/26/%e0%a4%b5%e0%a5%8b-%e0%a4%a6%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%96%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a7/ Read more

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योगी आदित्यनाथ का शहर गोरखपुर आज भले ही विकास का रोल मॉडल बनकर सीएम सिटी के रूप में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है मगर 1970 के दशक में जब पूरे देश में जेपी आंदोलन जोरों पर था उन दिनों गोरखपुर सिर्फ जातीय संघर्षों, वर्चस्व की लड़ाई और गैंगवार के लिए ही बदनाम हुआ करता था। 
कई नए माफियाओं के उदय की भूमि होने के चलते गोरखपुर को ‘Crime Capital of North India’ कहा जाने लगा था। यहां की छात्र राजनीति भी दो गुटों में बँटी हुई थी और गोरखपुर यूनिवर्सिटी में ब्राह्मण और क्षत्रिय दो गुट हुआ करते थे। इन दोनों गुटों की आपसी रंजिश और मुठभेड़ से गोरखपुर में रोज अपराध की एक नई कहानी लिखी जाती थी।

उस वक्त जब देश भर के छात्र नेता देश को बदलने के जुनून में सड़कों पर आंदोलन करने में जुटे थे। वहीं गोरखपुर के छात्र नेता देशी तमंचे लहराते हुए अपने वर्चस्व को कायम करने में जुटे हुए थे। उस समय गोरखपुर यूनिवर्सिटी में दो छात्र नेता हुआ करते थे, ठाकुर गुट के रविन्द्र सिंह और ब्राह्मण गुट के हरिशंकर तिवारी। इन दोनों छात्र नेताओं में हमेशा वर्चस्व को लेकर लड़ाई ठनी रहती थी। वो एक ऐसा दौर था जब गोरखपुर यूनिवर्सिटी शिक्षा का केंद्र न होकर ब्राह्मण-ठाकुर जातीय संघर्ष का अखाड़ा बनकर रह गया था।

इन दोनों गुटों में गोरखपुर यूनिवर्सिटी में अपना-अपना वर्चस्व कायम करने हेतु आए दिन असलहे लहराना, मारपीट और बवाल होते रहते थे। इस बीच ठाकुरों के नेता रविन्द्र सिंह को वीरेंद्र प्रताप शाही नाम का एक नया और तेज तर्रार लड़का मिला जो कि उनकी ही जाति से था। 


यह वो दौर था जब जाति को सबसे ज्यादा तवज्जो दी जाती थी। जिले में ब्राह्मण और ठाकुर दोनों गुट अपना-अपना वर्चस्व कायम करने में जुटे रहते थे। और इन दोनों गुटों की आपसी वर्चस्व की लड़ाई ने गोरखपुर का अमन चैन पूरी तरह छीन लिया था। उन दिनों आये दिन गोरखपुर की सड़कों पर मर्डर, फिरौती, रंगबाजी, डकैती का ही तांडव हुआ करता था। 


उन दिनों गोरखपुर के हालात ऐसे हुआ करते थे कि इन दोनों गुटों के लोग दुकान से सामान लेते और दुकानदार द्वारा पैसे मांगने पर गोली मार देते थे। गुंडई का आलम यह था कि यहाँ लोग पेट्रोल भराकर पैसे तक नहीं देते थे और पैसे मांगने पर गोली मार देते थे। ऐसी घटनाएं आम होने लगी थी। फिर इन दोनों गुटों को वर्चस्व के साथ-साथ पैसे की अहमियत भी समझ में आने लगी थी। उसी दौर में रेलवे के स्क्रैप की ठेकेदारी भी मिलने लगी थी और दोनों गुट अब अपने-अपने वर्चस्व का इस्तेमाल करके ठेकेदारी और अन्य कामों में लग गए। 
1980 में हरिशंकर तिवारी ने रेलवे के ठेके में अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी।  हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र शाही दोनों ने अपने-अपने गुट को मजबूत करना शुरू कर दिया था। इन दोनों ने अपने-अपनेे संगठित गैंग भी बना लिए थे। उन्हीं दिनों कई बार ऐसा हुआ जब दोनों माफियाओं के बीच जारी वर्चस्व की जंग में पूरा गोरखपुर शहर थर्रा गया था। 
तब पूर्वांचल में रोज कहीं न कहीं गैंगवार में चली गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई देती रहती थी। आए दिन दोनों गुटों के कुछ लोग मारे जाते थे। साथ ही कई निर्दोष लोग भी मरते थे। इसी दौरान ब्राह्मण-ठाकुर जातीय संघर्ष में लखनऊ और गोरखपुर विवि के छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके युवा विधायक रविंद्र सिंह की भी हत्या हो गई।

बताया जाता हैं कि इस घटना के बाद ठाकुरों के गुट ने वीरेंद्र प्रताप शाही को अपना नेता मान लिया। कुछ ही दिनों में वीरेंद्र शाही की तूती बोलने लगी और उन्हें ‘शेरे-पूर्वांचल’ तक कहा जाने लगा। अब गोरखपुर माफियाराज से पूरी तरह रूबरू हो चुका था और सरकारी सिस्टम यहाँ पूरी तरह फेल हो चुका था। इन दोनों गुटों की गैंगवार के चलते गोरखपुर ही नहीं आसपास के जिलों की कानून-व्यवस्था भी पूरी तरह फेल हो गयी थी।
फिर जब दोनों गुटों ने ठेके आदि से खुद को आर्थिक रूप से सक्षम बना लिया तब पूर्वांचल से निकलकर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इन दोनों गुटों ने अपनी-अपनी एक समानांतर सरकार बना ली। इन लोगों के यहाँ अपनी अपनी बिरादरी के जनता दरबार भी लगने लगे। जमीनी विवाद से लेकर हर तरह के मुद्दे इनके दरबार में आने लगे थे। लोग अपने विवादों के निपटारे के लिए कोर्ट जाने से बेहतर इन माफियाओं के दरबार को समझने लगे थे।


इसी बीच 1985 में गोरखपुर के वीर बहादुर सिंह ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल ली। उनके लिए प्रदेश संभालने से महत्वपूर्ण माफियाओं को संभालना चुनौती थी। हर एक की निगाह वीर बहादुर सिंह पर ही थी। उन्होेंने इसके लिए गैंगेस्टर एक्ट लाया। लेकिन इन लोगों को सामाजिक स्वीकार्यता मिल चुकी थी। राजनीति में भी इनकी बराबर भागीदारी और स्वीकार्यता मिल चुकी थी। जानकार बताते हैं कि इनकी स्वीकार्यता का ही नतीजा है कि पंडित हरिशंकर तिवारी छह बार तो वीरेंद्र प्रताप शाही दो बार विधायक चुने गए। कानून व्यवस्था को दरबारी बनाने के लिए इन पर अंगुलियां उठी तो न जाने कितने इनके दर पर आकर न्याय पाकर दुआ देते हुए लौटे भी। अलग-अलग क्षेत्रों में दबंग छवि वालों को जनता अपना रहनुमा चुनने लगी। पूर्व विधायक अंबिका सिंह, पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी, पूर्व सांसद ओम प्रकाश पासवान, पूर्व सांसद बालेश्वर यादव आदि का उनके क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ने के साथ जनप्रतिनिधि के रूप में लोगों के रहनुमा बन चुके थे।

राजनीति से अपराधियों के गठजोड़ की अपने देश में पुरानी परंपरा है। कहा जाता है किं यदि सौ गुनाह करने के बाद भी कानून की नजरों से बचना हो तो राजनीति का चोला ओढ़ लो। इसी फॉर्मूले को अपनाकर इन दोनों गुटों के माफियाओं ने भी बाद में पैसे के बल पर राजनीति की चादर ओढ़ ली और माफिया से माननीय बन गए। 


फिर 90 के दशक में गोरखपुर के गांव मामखोर के एक शिक्षक का लड़का श्रीप्रकाश शुक्ला सबको पीछे छोड़ते हुए जरायम की दुनिया में तेजी से उभरा। अपनी बहन को छेड़े जाने पर उसने पहली हत्या की और उसके बाद हरिशंकर तिवारी ने उसे बैंकॉक भेजकर उसे पुलिस के हाथों बचाया। अपनी बिरादरी के होने के नाते हरिशंकर तिवारी ने उसे गुनाह की दुनिया में अपने फायदे के लिए एक मोहरे की तरह इस्तेमाल करना शुरू किया। लेकिन महत्वाकांशी श्रीप्रकाश शुक्ला ने गुनाह की दुनिया में तिवारी से बगावत करते हुए AK-47 जैसे असलहों से लैस अपनी अलग गैंग बनाकर पूर्वांचल से बिहार, दिल्ली, ग़ाज़ियाबाद तक अपने खौफ का साम्राज्य फैलाना शुरू कर दिया। अब बिहार के माफिया डॉन और रेलवे के ठेकेदार सूरजभान का भी हाथ श्रीप्रकाश के सिर पर था। 1997 में श्रीप्रकाश शुक्ला ने वीरेंद्र शाही की लखनऊ में गोली मारकर हत्या कर दी। उसका अगला टारगेट माफिया से माननीय बना हरिशंकर तिवारी ही था परन्तु इस बीच उसने सूबे के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को मारने के लिए 6 करोड़ की सुपारी ले ली जिसके बाद यूपी एसटीएफ (STF) ने 1998 में श्रीप्रकाश शुक्ला को लखनऊ में एक एनकाउंटर के दौरान मार गिराया। 

वीरेंद्र शाही की हत्या के बाद छोटे-छोटे गिरोह ने अपनी धमक बनानी शुरू कर दी। कुछ ने जरायम की दुनिया में हनक दिखाने के साथ राजनीति में भी कदम रखा। जो सिलसिला आज भी कायम है। कई आज की तारीख में सत्ता के लाभ वाले पद को भी सुशोभित कर रहे हैं।  
क्योंकि हमारे समाज में गुंडों को पूजने का पुराना रिवाज है इसलिए यहाँ लोग जेल से भी चुनाव लड़कर जीत जाते हैं। जब भी कोई माफिया, बाहुबली पैसों के बल पर जोर-शोर से लाव-लश्कर के साथ चुनाव लड़ता है तो वो बम्पर वोटों से जीत हासिल करता है। वहीं जब कोई साधारण और बेदाग छवि वाला आदमी बिना लाव-लश्कर के चुनाव लड़ता है तो उसकी जमानत तक जब्त हो जा्ती है।


योगी आदित्यनाथ के यूपी का सीएम बनने के बाद पूरे प्रदेश से गुंडाराज खत्म हुआ है और प्रदेश के साथ-साथ गोरखपुर में भी चलने वाले छोटे-बड़े गैंग या तो खत्म हो गए हैं या सभी अपराधी और गुंडे भूमिगत हो गए हैं। पहले जहाँ गोरखपुर में आये दिन सरेआम फिरौती, रंगबाजी और लूटपाट आम बात थी वहीं अब कानून व्यवस्था फिर से कायम हुई है। 

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शहीद की विधवा https://sanjayrajput.com/2018/09/blog-post.html https://sanjayrajput.com/2018/09/blog-post.html#respond Wed, 26 Sep 2018 03:40:00 +0000 https://sanjayrajput.com/2018/09/26/%e0%a4%b6%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%b5%e0%a4%be/ Read more

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यह सच्ची कहानी भारतीय सेना के एक ऐसे वीर सैनिक की कथा है जो 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान दुश्मन से लड़ते हुए लेह-लद्दाख की बर्फीली पहाड़ियों में ही कहीं लापता हो गए थे और आजतक उनका कोई पता नहीं चला ।
श्री सूर्यबली सिंह पुत्र स्व0 श्री साहब सिंह जो कि ऊत्तर प्रदेश राज्य के मऊ जिले के गांव खुंटी मखना पोस्ट बहादुरगंज के निवासी थे, वे अपने पिता की सबसे छोटी संतान थे ।
उनका विवाह 1960 में यूपी के बलिया जिले के ग्राम वीरचंद्रहा की कुंती देवी से हुआ था । शादी के कुछ माह बाद ही सन 1961 में सूर्यबली सिंह फौज में भर्ती होकर ट्रेनिंग के लिए चले गए और फिर कभी वापस नहीं लौटे । उनकी ट्रेनिंग पूरी होते होते ही भारत-चीन के बीच हालात खराब होने लगे थे और अंततः 1962 में भारत-चीन युद्ध छिड़ गया ।  सभी जवानों की छुट्टियां रद्द कर दी गयी और सबको युद्ध के लिए कूच करने का आदेश जारी कर दिया गया…
सूर्यबली सिंह जिनकी शादी को अभी महज कुछ माह ही बीते थे कि उन्हें अपनी नई नवेली दुल्हन को छोड़कर युद्ध के मैदान में कूदना पड़ रहा था…ऐसे में जबकि दोनों पति-पत्नी एक दूसरे से ठीक से परिचित भी नहीं हो पाए थे न ही जी भर के बातचीत ही कर पाए थे । लेकिन कौन जानता था कि वे सदा सदा के लिए एक दूजे से जुदा हो रहे थे । उस नई नवेली दुल्हन को क्या पता था कि उसके हाथों की मेहंदी का रंग उतरने से पहले ही उसका सुहाग युद्ध की बलि बेदी पर शहीद हो जाएगा…
उस समय गांवों में आज इतना खुलापन कहां होता था..पति-पत्नी बडे-बुजुर्गों की नजरें बचाकर बड़ी मुश्किल से ही कभी-कभार मिल पाया करते थे..उस दुल्हन ने तो अभी अपने जीवनसाथी को जी भरके फुरसत से देखा भी नहीं था न ही खुलके कभी बातें ही कर पाई थी…
अभी तो वे अपनी नई जिंदगी के सपने बुनने शुरू ही कि थीं और अपने पति के ट्रेनिंग पर से लौटकर छुट्टी में घर आने की राह देख ही रही थीं तभी उनको भारत-चीन में युद्ध छिड़ जाने की खबर मिली..और पता चला कि उनके पति सूर्यबली सिंह भी युद्ध लड़ने के लिए जा रहे हैं।
यह खबर सुनते ही बेचारी उस दुल्हन की स्थिति ऐसी हो गयी मानो काटो तो खून नहीं…वो घर में बदहवास सी इधर से उधर दौड़ती, लेकिन एक नई दुल्हन को चारदीवारी से बाहर निकलने तक कि इजाजत कहाँ थी उस जमाने में…न ही संपर्क करने का कोई साधन ही मौजूद था आज की तरह।
वो बेचैन थी कि किसी तरह वो अपने पति की एक झलक देख पाती या एक बार बात कर पाती…लेकिन वो अंदर ही अंदर घुटती रह गयी और उधर सूर्यबली सिंह जो कि अभी नए नए रंगरूट थे तो उनको ड्यूटी दी गयी सीमा पर युद्ध लड़ते जवानों को खाद्य-रसद सामग्री मुहैया कराने की ।
फौज के नए जवान सूर्यबली सिंह अपने फर्ज को निभाने के लिए लेह-लद्दाख की बर्फीली पहाड़ियों में सिर पर कफन बांधकर उत्तर गए लेकिन उनकी आंखों में बार-बार अपनी नई-नवेली दुल्हन कुंती का ही चेहरा घूम रहा था।
युद्ध अपने पूरे जोरों पर था….भारतीय सेना ने दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे…चीनी सेना बदहवास और बौखलाई हुई थी….और सूर्यबली सिंह की दुल्हन भी चारदीवारी के अंदर बदहवास और डरी-सहमी बैठी रहती थी…एक अनजाना सा डर उसे हर पल सताता रहता था…वो अपने पति की कुशलता जानने के लिए उतावली थी लेकिन कुछ भी पता चल पाना कठिन था । उस जमाने में एक रेडियो ही था जिससे  थोड़ा बहुत समाचार  मिल पाता था…
सिपाही सूर्यबली सिंह का काफिला लद्दाख की बर्फीली पहाड़ियों के बीच से होता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था..रास्ता बहुत ही कठिन और खतरनाक था और बर्फ के नीचे दलदल का भी खतरा था जिसपर पैर पड़ते ही न जाने कितनी गहराई में समा जाने का डर था…
काफिला आगे बढ़ता जा रहा था तभी चीनी सेना ने अचानक हमला बोल दिया…सभी फौजी चीनी सैनिकों से भिड़ गए और हर तरफ मार काट चीख पुकार मच गई..सैनिक लड़ते लड़ते बर्फीली खाइयों में समाते जा रहे थे…कुछ घायल थे जो मृत्यु के करीब थे…
फौजी सूर्यबली सिंह जी जान से दुश्मन से लड़ रहे थे लेकिन बुरी तरह घायल होने के कारण उनके हाथ पैर जवाब देने लगे थे….अब उन्हें अपनी मौत करीब दिख रही थी लेकिन उस अंतिम वक़्त में भी उन्होंने अपना हौसला नहीं छोड़ा और दुश्मन का डटकर मुकाबला करते रहे…तभी एक चीनी सैनिक ने अचानक पीठ पीछे से हमला कर दिया जिससे सूर्यबली सिंह जो कि पहले ही बुरी तरह से घायल थे, अपना संतुलन खो बैठे और गहरी बर्फीली खाईयों में  समाते चले गए…….सदा-सदा के लिए…..
माँओं की कोख सूनी हुई, दुल्हनों की मांग उजड़ गयी, बच्चे अनाथ हो गए….
और इस तरह भारत चीन युद्ध का अंत हुआ..
फिर एक दिन फौजी सूर्यबली सिंह का फौजी बक्सा और उनका सारा सामान उनकी बटालियन द्वारा उनके गांव भेज दिया गया और कहा गया कि सूर्यबली सिंह युद्ध के दौरान बर्फीली पहाड़ियों में कहीं लापता हो गए और उनका शव भी नहीं मिल सका।
एक नई-नवेली दुल्हन जिसके हाथों की मेहंदी तक अभी नहीं छूटी थी उससे पहले ही उसकी मांग का सुहाग उजड़ गया।
बहुत बरसों तक शहीद फौजी सूर्यबली सिंह की विधवा को इंतज़ार था कि शायद उसका पति जीवित हो और वापस लौट आये।
लेकिन अब तो उस विधवा की आस भी टूट चुकी है और जीने की इच्छा भी….क्योंकि आज तक न तो सरकार ने ही उसकी सुध ली है और न ही उसे एक शहीद की विधवा का दर्जा ही दिया गया…और न ही कभी उसे शहीद की विधवा के रूप में किसी मंच पर सम्मानित ही किया गया।
बेहद अफसोस की बात है कि शहीद सूर्यबली सिंह की शहादत को सेना, सरकार और देश की जनता किसी ने भी कभी याद नही किया और न ही उनकी विधवा कुंती देवी को ही आज तक कभी शहीद की विधवा का सम्मान और दर्जा दिया गया ।

“ज़िंदगी की राह में रौशन रही वो
माँग में सिंदूर, सर चूनर बनी थी,
रात के अंधेर में बेबस हुई अब
जिंदगी की नींव है उजड़ी हुई सी।”
#स्वरचित एवं पूर्णत: सत्य घटना पर आधारित
©संजय राजपूत

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