भारतीय सेना – SanjayRajput.com https://sanjayrajput.com सच की ताकत Tue, 06 Aug 2024 06:54:04 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.1 https://sanjayrajput.com/wp-content/uploads/2024/07/cropped-91-98392-81815-20231027_230113.jpg भारतीय सेना – SanjayRajput.com https://sanjayrajput.com 32 32 235187837 नेहरू को चुनौती देने वाले निडर सैनिक की कहानी https://sanjayrajput.com/2023/07/%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%82-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a5%8c%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87.html https://sanjayrajput.com/2023/07/%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%82-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a5%8c%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87.html#respond Thu, 27 Jul 2023 11:33:00 +0000 https://sanjayrajput.com/2023/07/27/%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a5%82-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a5%8c%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87/ Read more

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साल था 1959, जगह थी अमृतसर. भारतीय सेना के कुछ अधिकारी और उनकी पत्नियाँ अपने एक सहकर्मी को छोड़ने के लिए रेलवे स्टेशन गए हुए थे। कुछ मनचलों ने महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी की और उनके साथ छेड़छाड़ की कोशिश की. सेना के अधिकारियों ने उन गुंडों का पीछा किया जो पास के एक सिनेमा थिएटर में जाकर शरण लिए हुए थे।
मामले की सूचना कमांडिंग ऑफिसर कर्नल ज्योति मोहन सेन को दी गई। घटना के बारे में जानने पर, कर्नल ने सिनेमा हॉल को सैनिकों द्वारा घेरने का आदेश दे दिया। 
जिसके बाद सभी गुंडों को घसीटकर बाहर निकाला गया। गुंडों का सरदार मदमस्त और सत्ता के नशे में चूर था, जो कोई और नहीं बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के करीबी सहयोगी और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों का बेटा था।
हुआ ये की सभी गुंडों को उनके अंडरवियर तक उतारकर नंगे अमृतसर की सड़कों पर घुमाया गया और बाद में छावनी में नजरबंद कर दिया गया। अगले दिन, मुख्यमंत्री क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने बेटे को भारतीय सेना की कैद से छुड़ाने की कोशिश की।
पता है उसके बाद क्या हुआ?
उनके वाहन को वीआईपी वाहन के रूप में छावनी में जाने की अनुमति नहीं दी गई, उन्हें कर्नल से मिलने के लिए पूरे रास्ते पैदल चलने के लिए मजबूर किया गया। जिसके पश्चात क्रोधित मुख्यमंत्री कैरों ने पूरे मामले की शिकायत प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से की।
वो दिन और थे, लोकतंत्र अभी नवजात अवस्था में था, शक्तिशाली होते हुए भी नेताओं में कुछ संकोच और नैतिकता बाकी थी।
हैरान, तथाकथित भारत रत्न प्रधान मंत्री नेहरू ने अपने विश्वासपात्र प्रताप सिंह कैरों से सवाल करने के बजाय, अपने अधिकारियों के आचरण के लिए सेना प्रमुख जनरल थिमय्या से स्पष्टीकरण मांगा।
पता है सेना प्रमुख द्वारा क्या उत्तर दिया गया?
जवाब में सेना प्रमुख द्वारा कहा गया कि, “यदि हम अपनी महिलाओं के सम्मान की रक्षा नहीं कर सकते, तो आप हमसे अपने देश के सम्मान की रक्षा की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?”
उनका ये जवाब सुनकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी अवाक रह गये थे। यह उसी बहादुर सैनिक की कहानी थी जिसने प्रधानमंत्री को भी चुनौती दे दी थी।
यह लेख “भारतीय सैनिक को सलाम” पत्रिका में मेजर जनरल ध्रुव सी कटोच द्वारा योगदान दिया गया था।

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पाकिस्तान से पर्सनल दुश्मनी किसकी है? https://sanjayrajput.com/2022/08/%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%a8%e0%a4%b2-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b6%e0%a5%8d.html https://sanjayrajput.com/2022/08/%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%a8%e0%a4%b2-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b6%e0%a5%8d.html#respond Tue, 30 Aug 2022 12:03:00 +0000 https://sanjayrajput.com/2022/08/30/%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%a8%e0%a4%b2-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b6%e0%a5%8d/ Read more

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बॉलीवुड की महादयालु सिंगर नेहा कक्कड़ की पाकिस्तानियों से कोई पर्सनल दुश्मनी नहीं है, इसीलिए वो पाकिस्तानी सिंगर आतिफ असलम के साथ स्टेज शो कर सकती हैं। 
विराट हृदय वाले क्रिकेटर विराट कोहली की भी पाकिस्तानियों से कोई पर्सनल दुश्मनी नहीं है, इसीलिए वो दुबई में शाहीन अफरीदी से बिंदास गले मिल के हालचाल ले सकते हैं। भारतीय क्रिकेट टीम की कोई पर्सनल दुश्मनी नहीं है, इसीलिए वो पाकिस्तान से क्रिकेट खेल सकती है।
अपने देश के कलाकारों को चाहे काम मिले या न मिले लेकिन डी कंपनी द्वारा संचालित बॉलीवुड का दिल तो बहुत बड़ा है और उसकी पाकिस्तान से कोई दुश्मनी भी नहीं है इसीलिए वो वहाँ के आर्टिस्ट्स को हर हाल में काम देते रहेंगे। 
भारत-पाक मैच पर सट्टा लगाने वालों की भी पाकिस्तान से कोई दुश्मनी नहीं है, इसीलिए वो भी जमकर सट्टा लगायेंगे और खूब कमाएंगे।
पाकिस्तानियों से पर्सनल दुश्मनी तो बस भारतीय सेना के जवान लांस नायक रमेश, सूबेदार बलजीत, लेफ्टिनेंट मनोज और इन जैसे तमाम भारतीय जवानों की है। लगता है जैसे इनकी भैंस पाकिस्तानी खोल ले गए हैं, इसीलिए वो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी दिन रात बॉर्डर पर पहरा दे रहे हैं और 24 घंटे अपनी जान देने को तैयार हैं।
भारतीय सेना के उन जवानों का क्या जो पाकिस्तानियों की गोलियों से बेवजह शहीद हो गए? बेवजह शहीद हुए उन जवानों के बीवी-बच्चों, बूढ़े मां-बाप की क्या कोई पर्सनल दुश्मनी थी पाकिस्तान से?
अच्छा है तुम लोग ये क्रिकेट, गीत-संगीत, गजल-मुशायरा, मेल-मिलाप इंजॉय करो, तुम्हारी पाकिस्तान से कोई पर्सनल दुश्मनी थोड़ी है।
जिसकी पाकिस्तान से पर्सनल दुश्मनी है, वो खड़ा है बॉर्डर पर सीना ताने, दुश्मन की गोली खाने को। और जब उसकी पाकिस्तानी गोलियों से मारे जाने की ख़बर आये तो सोशल मीडिया पर ‘दिखावे के दो आँसू’ वाली एक पोस्ट डाल देना, बस हो गया एक हिंदुस्तानी होने का फर्ज अदा।
शुरू कर देना फिर वही क्रिकेट, गीत-संगीत, गजल-मुशायरा, स्टेज शो, मेल-मिलाप…पाकिस्तान से तुम्हारी कोई पर्सनल दुश्मनी थोड़ी है।
यह लेख सरहद पर शहीद हुए भारतीय सेना के हर जवान को समर्पित है।
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शहीद की विधवा https://sanjayrajput.com/2018/09/blog-post.html https://sanjayrajput.com/2018/09/blog-post.html#respond Wed, 26 Sep 2018 03:40:00 +0000 https://sanjayrajput.com/2018/09/26/%e0%a4%b6%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7%e0%a4%b5%e0%a4%be/ Read more

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यह सच्ची कहानी भारतीय सेना के एक ऐसे वीर सैनिक की कथा है जो 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान दुश्मन से लड़ते हुए लेह-लद्दाख की बर्फीली पहाड़ियों में ही कहीं लापता हो गए थे और आजतक उनका कोई पता नहीं चला ।
श्री सूर्यबली सिंह पुत्र स्व0 श्री साहब सिंह जो कि ऊत्तर प्रदेश राज्य के मऊ जिले के गांव खुंटी मखना पोस्ट बहादुरगंज के निवासी थे, वे अपने पिता की सबसे छोटी संतान थे ।
उनका विवाह 1960 में यूपी के बलिया जिले के ग्राम वीरचंद्रहा की कुंती देवी से हुआ था । शादी के कुछ माह बाद ही सन 1961 में सूर्यबली सिंह फौज में भर्ती होकर ट्रेनिंग के लिए चले गए और फिर कभी वापस नहीं लौटे । उनकी ट्रेनिंग पूरी होते होते ही भारत-चीन के बीच हालात खराब होने लगे थे और अंततः 1962 में भारत-चीन युद्ध छिड़ गया ।  सभी जवानों की छुट्टियां रद्द कर दी गयी और सबको युद्ध के लिए कूच करने का आदेश जारी कर दिया गया…
सूर्यबली सिंह जिनकी शादी को अभी महज कुछ माह ही बीते थे कि उन्हें अपनी नई नवेली दुल्हन को छोड़कर युद्ध के मैदान में कूदना पड़ रहा था…ऐसे में जबकि दोनों पति-पत्नी एक दूसरे से ठीक से परिचित भी नहीं हो पाए थे न ही जी भर के बातचीत ही कर पाए थे । लेकिन कौन जानता था कि वे सदा सदा के लिए एक दूजे से जुदा हो रहे थे । उस नई नवेली दुल्हन को क्या पता था कि उसके हाथों की मेहंदी का रंग उतरने से पहले ही उसका सुहाग युद्ध की बलि बेदी पर शहीद हो जाएगा…
उस समय गांवों में आज इतना खुलापन कहां होता था..पति-पत्नी बडे-बुजुर्गों की नजरें बचाकर बड़ी मुश्किल से ही कभी-कभार मिल पाया करते थे..उस दुल्हन ने तो अभी अपने जीवनसाथी को जी भरके फुरसत से देखा भी नहीं था न ही खुलके कभी बातें ही कर पाई थी…
अभी तो वे अपनी नई जिंदगी के सपने बुनने शुरू ही कि थीं और अपने पति के ट्रेनिंग पर से लौटकर छुट्टी में घर आने की राह देख ही रही थीं तभी उनको भारत-चीन में युद्ध छिड़ जाने की खबर मिली..और पता चला कि उनके पति सूर्यबली सिंह भी युद्ध लड़ने के लिए जा रहे हैं।
यह खबर सुनते ही बेचारी उस दुल्हन की स्थिति ऐसी हो गयी मानो काटो तो खून नहीं…वो घर में बदहवास सी इधर से उधर दौड़ती, लेकिन एक नई दुल्हन को चारदीवारी से बाहर निकलने तक कि इजाजत कहाँ थी उस जमाने में…न ही संपर्क करने का कोई साधन ही मौजूद था आज की तरह।
वो बेचैन थी कि किसी तरह वो अपने पति की एक झलक देख पाती या एक बार बात कर पाती…लेकिन वो अंदर ही अंदर घुटती रह गयी और उधर सूर्यबली सिंह जो कि अभी नए नए रंगरूट थे तो उनको ड्यूटी दी गयी सीमा पर युद्ध लड़ते जवानों को खाद्य-रसद सामग्री मुहैया कराने की ।
फौज के नए जवान सूर्यबली सिंह अपने फर्ज को निभाने के लिए लेह-लद्दाख की बर्फीली पहाड़ियों में सिर पर कफन बांधकर उत्तर गए लेकिन उनकी आंखों में बार-बार अपनी नई-नवेली दुल्हन कुंती का ही चेहरा घूम रहा था।
युद्ध अपने पूरे जोरों पर था….भारतीय सेना ने दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे…चीनी सेना बदहवास और बौखलाई हुई थी….और सूर्यबली सिंह की दुल्हन भी चारदीवारी के अंदर बदहवास और डरी-सहमी बैठी रहती थी…एक अनजाना सा डर उसे हर पल सताता रहता था…वो अपने पति की कुशलता जानने के लिए उतावली थी लेकिन कुछ भी पता चल पाना कठिन था । उस जमाने में एक रेडियो ही था जिससे  थोड़ा बहुत समाचार  मिल पाता था…
सिपाही सूर्यबली सिंह का काफिला लद्दाख की बर्फीली पहाड़ियों के बीच से होता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था..रास्ता बहुत ही कठिन और खतरनाक था और बर्फ के नीचे दलदल का भी खतरा था जिसपर पैर पड़ते ही न जाने कितनी गहराई में समा जाने का डर था…
काफिला आगे बढ़ता जा रहा था तभी चीनी सेना ने अचानक हमला बोल दिया…सभी फौजी चीनी सैनिकों से भिड़ गए और हर तरफ मार काट चीख पुकार मच गई..सैनिक लड़ते लड़ते बर्फीली खाइयों में समाते जा रहे थे…कुछ घायल थे जो मृत्यु के करीब थे…
फौजी सूर्यबली सिंह जी जान से दुश्मन से लड़ रहे थे लेकिन बुरी तरह घायल होने के कारण उनके हाथ पैर जवाब देने लगे थे….अब उन्हें अपनी मौत करीब दिख रही थी लेकिन उस अंतिम वक़्त में भी उन्होंने अपना हौसला नहीं छोड़ा और दुश्मन का डटकर मुकाबला करते रहे…तभी एक चीनी सैनिक ने अचानक पीठ पीछे से हमला कर दिया जिससे सूर्यबली सिंह जो कि पहले ही बुरी तरह से घायल थे, अपना संतुलन खो बैठे और गहरी बर्फीली खाईयों में  समाते चले गए…….सदा-सदा के लिए…..
माँओं की कोख सूनी हुई, दुल्हनों की मांग उजड़ गयी, बच्चे अनाथ हो गए….
और इस तरह भारत चीन युद्ध का अंत हुआ..
फिर एक दिन फौजी सूर्यबली सिंह का फौजी बक्सा और उनका सारा सामान उनकी बटालियन द्वारा उनके गांव भेज दिया गया और कहा गया कि सूर्यबली सिंह युद्ध के दौरान बर्फीली पहाड़ियों में कहीं लापता हो गए और उनका शव भी नहीं मिल सका।
एक नई-नवेली दुल्हन जिसके हाथों की मेहंदी तक अभी नहीं छूटी थी उससे पहले ही उसकी मांग का सुहाग उजड़ गया।
बहुत बरसों तक शहीद फौजी सूर्यबली सिंह की विधवा को इंतज़ार था कि शायद उसका पति जीवित हो और वापस लौट आये।
लेकिन अब तो उस विधवा की आस भी टूट चुकी है और जीने की इच्छा भी….क्योंकि आज तक न तो सरकार ने ही उसकी सुध ली है और न ही उसे एक शहीद की विधवा का दर्जा ही दिया गया…और न ही कभी उसे शहीद की विधवा के रूप में किसी मंच पर सम्मानित ही किया गया।
बेहद अफसोस की बात है कि शहीद सूर्यबली सिंह की शहादत को सेना, सरकार और देश की जनता किसी ने भी कभी याद नही किया और न ही उनकी विधवा कुंती देवी को ही आज तक कभी शहीद की विधवा का सम्मान और दर्जा दिया गया ।

“ज़िंदगी की राह में रौशन रही वो
माँग में सिंदूर, सर चूनर बनी थी,
रात के अंधेर में बेबस हुई अब
जिंदगी की नींव है उजड़ी हुई सी।”
#स्वरचित एवं पूर्णत: सत्य घटना पर आधारित
©संजय राजपूत

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