माफिया – SanjayRajput.com https://sanjayrajput.com सच की ताकत Thu, 05 Jun 2025 03:30:33 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.4 https://sanjayrajput.com/wp-content/uploads/2024/07/cropped-91-98392-81815-20231027_230113.jpg माफिया – SanjayRajput.com https://sanjayrajput.com 32 32 235187837 Lalu Ke Jungleraj Ki Kahani in Hindi: लालू के जंगलराज की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी https://sanjayrajput.com/2025/05/lalu-ke-jungleraj-ki-kahani-in-hindi.html https://sanjayrajput.com/2025/05/lalu-ke-jungleraj-ki-kahani-in-hindi.html#respond Fri, 30 May 2025 05:10:52 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=1146 Read more

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lalu ke jungleraj ki kahani in hindi

– जब लालू के गुर्गे शहाबुद्दीन ने अपराध और बर्बरता की हदें पार की

– सीवान के व्यवसाई चंदा बाबू के 2 बेटों को तेज़ाब से नहला दिया

– लाश के टुकड़े कर बोरे में भरकर फेंक दिया था

-इसके बाद भी शाहबुद्दीन जीवन भर लालू का यार रहा

-शहाबुद्दीन के तेज़ाब कांड की वो टाइमलाइन, जिसे पढ़कर आप कांप उठेंगे…

lalu ke jungleraj ki kahani in hindi: बात वर्ष 2004 की है, बिहार के सीवान में शहाबुद्दीन का आतंक चरम पर था. सीवान में चंद्रेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू एक छोटे से व्यवसाई थे. मुख्य बाजार में दो दुकानें थीं. एक दुकान पर उनका बेटा सतीश बैठता था, दूसरे पर दूसरा बेटा गिरीश.

उन दिनों शहाबुद्दीन सीवान में अपनी खुद की अदालत लगाता था. उसके गुर्गे खुलेआम जमीनों पर कब्ज़ा, रंगदारी और वसूली करते थे.

अगस्त 2004 के पहले सप्ताह में शहाबुद्दीन के गुंडों ने चंदा बाबू के निर्माणाधीन मकान में बनी एक दुकान पर कब्जा करने की कोशिश की. चंदा बाबू ने इसका मुकाबला किया और दुकान पर कब्ज़ा नहीं होने दिया.

यहां से शहाबुद्दीन भड़क गया और शुरू हुआ उसकी बर्बरता का काला अध्याय…

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वो 16 अगस्त, 2004 का दिन था, शहाबुद्दीन के गुर्गे के चंदा बाबू की किराने की दुकान पर रंगदारी मांगने पहुंचे. दुकान पर उनका बेटा सतीश बैठा था, जिससे 2 लाख रुपए मांगे गए. सतीश ने रंगदारी देने से माना कर दिया और कहा कि पैसे नहीं है. गुंडों ने मारपीट शुरू की तो सतीश का भाई 30-40 हजार रुपए देने को तैयार हो गया.

शहाबुद्दीन के गुंडों ने सतीश की दुकान पर धावा बोल दिय. नगदी लूट ली गई, दुकान ध्वस्त कर दी गई. इसके बाद शहाबुद्दीन के गुंडे सतीश को उठा ले गए.

थोड़ी देर बाद सतीश के भाई गिरीश की दुकान पर धावा बोल दिया और उसे भी उठा लिया. सतीश और गिरीश के भाई राजीव को भी उठा लिया गया.

अब आगे लालू के जंगलराज और शहाबुद्दीन के आतंक की बर्बर कहानी है…

चंदा बाबू के तीनों बेटों का अपहरण कर सीवान के प्रतापपुर ले जाया गया. प्रतापपुर में शहाबुद्दीन की कोठी थी. ईख के खेत के पास गिरीश और सतीश को पेड़ से बांध दिया. राजीव को बैठाकर रखा गया. कुछ देर बाद तत्कालीन सांसद शहाबुद्दीन वहां पहुंचा. शहाबुद्दीन ने अपना कोर्ट लगाया और फैसला सुनाया कि दोनों को तेज़ाब से नहला दो.

शहाबुद्दीन का फरमान सुनते ही उनके गुर्गों ने गिरीश और सतीश पर तेजाब डालना शुरू किया. दोनों पर तेज़ाब से भरी बाल्टियां उड़ेल दी गईं. सतीश और गिरीश तड़पते रहे, तेज़ाब से धुआं उठता रहा, गंध फैलती रही. जैसे जैसे सतीश और गिरीश चिल्लाते, शहाबुद्दीन और गिरीश उतना ही अट्टहास करते. इसके बाद दोनों की लाश के टुकड़े किए गए. लाश के टुकड़ों को बोरे में भरकर फेंक दिया गया.

चंदा बाबू का तीसरा बेटा एकदम सुन्न पड़ गया. राजीव को बंधक बना चंदा बाबू से फिरौती की मांग शुरू कर दी.

जिस दिन ये वारदात हुई, उस दिन चंदा बाबू अपने भाई के पास पटना गए थे. वारदात की ख़बर पूरे सीवान में आग की तरह फैल गई. किसी ने पटना में चंदा बाबू को फोन करके कहा कि वह सीवान न आएं वरना मार दिए जाएंगे. उन्हें बताया गया कि उनके दो बेटे मारे जा चुके हैं, जबकि एक बेटा राजीव कैद में है. राजीव वहीं शहाबुद्दीन की कैद में था. मगर दो दिनों बाद वह किसी तरह भागने में कामयाब हो गया.

राजीव किसी तरह से गन्ने से लदे एक ट्रैक्टर में छिपकर चैनपुर पहुंचा. वहां से वो उत्तर प्रदेश के पड़रौना जा पहुंचा. वहां उसने स्थानीय सांसद के घर शरण ली. इस दौरान चंदा बाबू की पत्नी, दोनों बेटियां और एक अपाहिज बेटा भी घर छोड़कर जा चुके थे.

चंदा बाबू का पूरा परिवार तबाह हो चुका था, लेकिन शहाबुद्दीन का खौफ और आतंक अभी भी जारी था.

चंदा बाबू हिम्मत जुटाकर सीवान पहुंच गए. उन्होंने वहां पुलिस अधीक्षक से मिलने की कोशिश की लेकिन मिल नहीं सके. थाने पहुंचे तो थानेदार कांप उठा और कहा कि तुरंत सीवान छोड़ दीजिए.

चंदा बाबू छपरा के सांसद को लेकर पटना में एक बड़े नेता के पास गए. उस नेता ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि मामला सीवान का है, तो वह कुछ नहीं कर सकते.

तभी शहाबुद्दीन के गुर्गों ने चंदा बाबू के पटना वाले भाई को फोन कर धमकी दी. वो धमकी से इतना घबरा गए कि उन्होंने फौरन चंदा बाबू का साथ छोड़ दिया और फौरन अपना तबादला पटना से मुंबई करा लिया. वहां जाने के बाद भी उनको धमकी भरे फोन किए गए, जिसकी वजह से उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनकी मौत हो गई.

भाई की मौत की खबर सुनकर चंदा बाबू बेहोश हो गए. अब चंदा बाबू सीवान छोड़कर पटना में रहने लगे. बेसुध घूमते चंदा बाबू को एक विधायक ने शरण दी. पटना में ही चंदा बाबू किसी तरह से एक बार फिर सोनपुर के एक बड़े नेता से मिले. नेता ने मदद का आश्वासन दिया और बिहार के डीजीपी नारायण मिश्र से बात की. डीजीपी ने आईजी को पत्र लिखा. आईजी ने डीआईजी को और फिर डीआईजी ने एसपी को पत्र लिखा लेकिन चंदा बाबू को कोई मदद नहीं मिली.

चंदा बाबू निराश होकर दिल्ली चले गए. वहां उनकी मुलाकात राहुल गांधी से हुई, मगर केवल आश्वासन मिला. हिम्मत करके चंदा बाबू फिर सीवान आए. सीवान आकर एसपी से मिले तो एसपी ने चंदा बाबू को सिवान छोड़ देने की बात कही. निराश होकर चंदा बाबू फिर से डीआईजी ए.के. बेग से मिलने पहुंच गए. डीआईजी ने उनकी बात सुनकर एसपी को फटकार लगाई और फौरन सुरक्षा देने के लिए कहा. उसके बाद चंदा बाबू को सुरक्षा मिल गई. तब वह सीवान में ही रहने लगे.

इस दौरान बिहार में RJD की सरकार थी. चंदबाबू की न तो सरकार सुन रही थी और प्रशासन पंगु बना हुआ था. 2005 में सरकार बदली NDA से नीतीश कुमार CM बने. इसके बाद शहाबुद्दीन पर शिकंजा कसना शुरू हुआ. उसी साल शहाबुद्दीन से दिल्ली से गिरफ्तार हुआ. नीतीश सरकार आने के बाद शहाबुद्दीन पर दर्ज मामलों की सुनवाई भी तेजी से होने लगी, लेकिन अभी शाहबुद्दीन का खौफ ख़त्म नहीं हुआ.

सालों गुजर गए लेकिन चंदा बाबू को न्याय नहीं मिला. शहाबुद्दीन को निचली अदालत ने इस बीच कई मामलों में सजा मिली और वह जेल में था. शाहबुद्दीन के खिलाफ 39 हत्या और अपहरण के मामले थे. 38 में उसे जमानत मिल चुकी थी और 39वां केस राजीव का था जो अपने दो सगे भाईयों की हत्या का चश्मद्दीद गवाह था.

चंदा बाबू हिम्मत हार रहे थे. 2014 में 26 मई को नरेंद्र मोदी ने PM पद की शपथ ली. 30 मई 2014 को चंदा बाबू के बेटे राजीव की शादी हुई. 19 जून 2014 को राजीव की कोर्ट में गवाही होनी थी, जिसके आधार पर शहाबुद्दीन को सजा मिलती. तभी 2016 जून 2014 को राजीव की गोली मारकर हत्या कर दी गई. इस तरह चंदा बाबू के 3 बेटे लालू यादव के दोस्त शहाबुद्दीन ने या तो मार दिए या मरवा दिए.

राजीव की हत्या के साथ शहाबुद्दीन की जमानत का रास्ता साफ हो गया था. आखिरकार 11 साल बाद शहाबुद्दीन जमानत पर बाहर आ गया. उसके बाहर आने से सूबे की सियासत में हलचल मच गई. तब सरकार की पहल पर सुप्रीम कोर्ट ने शहाबुद्दीन की जमानत रद्द कर दी और उसे फिर से जेल जाना पड़ा.

चंदा बाबू पूरा जीवन न्याय की लड़ाई लड़ते रहे. वे चाहते थे कि उनके बेटों के हत्यारे शहाबुद्दीन को फांसी हो. फांसी तो नहीं हुई लेकिन शहाबुद्दीन जेल में बंद जरूर रहा.

दिसंबर 2020 को न्यायालय में इंसाफ की लड़ाई लड़ते-लड़ते चंदा बाबू का निधन हो गया. 1 मई 2021 को शहाबुद्दीन का कोरोना के कारण निधन हो गया

शहाबुद्दीन का बेटा ओसामा और बीवी हिना आज भी RJD में है. न्याय और मर्यादा के नाम पर अपने बेटे तेज प्रताप यादव को पार्टी से निकालने वाले लालू यादव शहाबुद्दीन के आतंक पर हमेशा चुप रहे. सिर्फ चुप नहीं रहे बल्कि हमेशा शहाबुद्दीन का साथ दिया और आज भी दे रहे हैं.

आप स्वयं तय करें कि आखिर लालू और RJD का ये कैसा न्याय है, जहां उनकी सत्ता शहाबुद्दीन जैसे कुख्यात अपराधी को खुला संरक्षण देती है और बिहार के विकास में अपना योगदान देने वाले चंदा बाबू को उनका पूरा परिवार तबाह हो जाने के बाद भी न्याय नहीं मिलता.

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Yogi Adityanath History in Hindi: गैंगस्टर्स के गढ़ गोरखपुर में कैसे उभरे योगी आदित्यनाथ? https://sanjayrajput.com/2025/05/yogi-adityanath-history-in-hindi.html https://sanjayrajput.com/2025/05/yogi-adityanath-history-in-hindi.html#respond Fri, 23 May 2025 05:57:16 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=1139 Read more

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हाता और शक्ति सदन की लड़ाई में कैसे हुई योगी आदित्यनाथ की एंट्री?

Yogi Adityanath History in Hindi: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ऐसा नाम है जिसने न केवल अपनी छवि बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीतिक दिशा को भी बदला है—योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath)। उनकी कहानी केवल एक राजनेता की नहीं, बल्कि एक ऐसे क्षेत्र की भी है जो कभी गैंगस्टर्स और अपराधियों के गढ़ के रूप में जाना जाता था। इस लेख में हम देखेंगे कि कैसे गोरखपुर के उस माहौल से निकलकर योगी आदित्यनाथ ने खुद को स्थापित किया और राजनीति की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई।

योगी आदित्यनाथ: असली नाम और शुरुआत

योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) का असली नाम है अजय सिंह बिष्ट, जो उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में जन्मे थे। उन्होंने धार्मिक शिक्षा ग्रहण की और महंत अवैद्यनाथ के सान्निध्य में रहकर गोरखपुर के प्रसिद्ध गोरखनाथ मंदिर से जुड़ गए। महंत अवैद्यनाथ के मार्गदर्शन में योगी ने न केवल धार्मिक गतिविधियों में बल्कि सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभाई।

गोरखपुर, जो कभी अपराधियों और गैंगस्टरों का गढ़ था, वहां योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने धार्मिक और सामाजिक सुधारों के साथ-साथ राजनीतिक सक्रियता भी दिखाई। उनके नेतृत्व में यह क्षेत्र धीरे-धीरे बदलने लगा।

गोरखपुर की राजनीतिक पृष्ठभूमि और अपराध की समस्या

गोरखपुर (Gorakhpur) का राजनीतिक इतिहास काफी जटिल रहा है। 1990 के दशक में यहां के हालात ऐसे थे कि अपराध और हिंसा आम बात थी। राजनीतिक दलों के बीच सत्ता संघर्ष और आपसी लड़ाइयों ने इस क्षेत्र को अस्थिर कर दिया था।

इस दौरान राम जन्मभूमि आंदोलन ने पूरे उत्तर भारत में राजनीतिक माहौल को गहरा प्रभावित किया। राम जन्मभूमि के मुद्दे ने हिंदू राष्ट्रवाद को बल दिया और उसी समय महंत अवैद्यनाथ जैसे धार्मिक नेताओं की भूमिका भी बढ़ी।

योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने इस संदर्भ में खुद को एक मजबूत हिंदू राष्ट्रवादी नेता के रूप में स्थापित किया। उन्होंने न केवल धार्मिक जनसमूह को संगठित किया, बल्कि राजनीतिक मोर्चे पर भी अपनी पकड़ मजबूत की।

महंत अवैद्यनाथ और योगी आदित्यनाथ का संबंध

महंत अवैद्यनाथ, गोरखनाथ मंदिर के पूर्व महंत और एक प्रभावशाली धार्मिक नेता थे, जिन्होंने योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के राजनीतिक करियर की नींव रखी। अवैद्यनाथ ने योगी को अपना उत्तराधिकारी बनाया और उन्हें गोरखपुर से विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया।

महंत अवैद्यनाथ स्वयं भी राजनीति में सक्रिय रहे और उनके प्रभाव ने योगी के राजनीतिक सफर को गति दी। योगी ने महंत जी के नक्शेकदम पर चलते हुए गोरखपुर (Gorakhpur) की राजनीति को नई दिशा दी।

उत्तर प्रदेश की राजनीतिक राजनीति: 1990 का दशक

1990 के दशक में उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई अहम घटनाएं हुईं, जिनका योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के उभार पर गहरा प्रभाव पड़ा। उस समय के राष्ट्रपति शासन, मंडल आयोग की सिफारिशें, और तत्कालीन प्रधानमंत्रियों जैसे अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, राजीव गांधी के दौर ने प्रदेश की राजनीति को जटिल बना दिया।

राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) की हत्या के बाद राजनीतिक स्थिरता में कमी आई, जिससे उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की राजनीति और भी अस्थिर हो गई। इसी बीच योगी आदित्यनाथ ने धार्मिक और सामाजिक आधार पर अपना जनाधार मजबूत किया।

राम जन्मभूमि आंदोलन और योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक उदय

राम जन्मभूमि आंदोलन ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। इस आंदोलन ने धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक ताकत में बदल दिया। योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और इसे अपनी राजनीतिक पहचान का आधार बनाया।

उन्होंने राम मंदिर के मुद्दे को राजनीतिक मंच पर उठाया और हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा को मजबूती से अपनाया। इस कारण वे उत्तर प्रदेश में बीजेपी के मजबूत चेहरों में से एक बने।

गोरखपुर से मुख्यमंत्री तक: योगी आदित्यनाथ का सफर

गोरखपुर से सांसद बनने के बाद योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने लगातार अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की। उनके नेतृत्व में गोरखपुर का विकास हुआ, साथ ही सामाजिक सुधारों पर भी जोर दिया गया। वे लगातार 5 बार गोरखपुर सीट से सांसद चुने गए।

2017 में, योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश में कानून-व्यवस्था, विकास और धार्मिकता के मुद्दे प्रमुख रहे।

कानून-व्यवस्था में सुधार

उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति सुधारने के लिए योगी सरकार ने कई कदम उठाए। गैंगस्टर और अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई, जिससे प्रदेश में अपराध दर में कमी आई।

धार्मिक और सामाजिक सुधार

धार्मिक स्थलों के विकास और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ योगी ने सामाजिक सुधारों पर भी ध्यान दिया। उन्होंने सामाजिक समरसता और विकास के लिए कई योजनाएं शुरू कीं।

राजनीतिक क़िस्से: गलतफहमियां और सुधार

राजनीतिक इतिहास में अक्सर गलतफहमियां और भ्रांतियां होती हैं। ऐसे मामलों में सत्य की खोज और सुधार आवश्यक होता है। यह दिखाता है कि राजनीति में तथ्यों की जांच और सही जानकारी का महत्व कितना बड़ा है। योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के राजनीतिक सफर में भी कई बार गलतफहमियां और आलोचनाएं आईं, लेकिन उन्होंने अपने कार्यों से अपनी छवि मजबूत की।

निष्कर्ष: योगी आदित्यनाथ और गोरखपुर की नई पहचान

गोरखपुर, जो कभी अपराध और अस्थिरता का केंद्र था, आज योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) के नेतृत्व में एक नए युग में प्रवेश कर चुका है। उनकी धार्मिक जड़ों और राजनीतिक कुशलता ने इस क्षेत्र को न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी बदल दिया है।

योगी का सफर यह दिखाता है कि कैसे एक क्षेत्र की जटिल राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं को समझकर, सही नेतृत्व और दृढ़ इच्छाशक्ति से बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है। उनकी कहानी न केवल गोरखपुर के लिए प्रेरणा है, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश और भारत के लिए भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अध्याय है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) की भूमिका आज भी चर्चा का विषय बनी हुई है, और उनकी कहानी राजनीतिक क़िस्सों में एक प्रेरणादायक मिसाल के रूप में याद रखी जाएगी।

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गैंग्स ऑफ गोरखपुर https://sanjayrajput.com/2024/07/gangs-of-gorakhpur.html https://sanjayrajput.com/2024/07/gangs-of-gorakhpur.html#respond Wed, 03 Jul 2024 15:43:00 +0000 Read more

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पूर्वांचल क्षेत्र की राजनीति और सामाजिक संरचना में गैंगवार और गुटबाजी की एक लंबी परंपरा रही है। इस क्षेत्र में कई ऐसे डॉन और गैंगस्टर उभरे हैं जिन्होंने अपने दबदबे से राज्य की राजनीति को प्रभावित किया है। इन गैंगस्टर्स के पीछे उनके जाति आधारित संरक्षण और राजनीतिक संबंध रहे हैं। इस लेख में हम पूर्वांचल के इन गैंगस्टर्स और उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।
गोरखपुर: गैंगवार का केंद्र
गोरखपुर जिला पूर्वांचल क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण जिला है। यहां की राजनीति में तीन केंद्र रहे हैं – गोरखनाथ मठ, ब्राह्मण राजनीति का केंद्र ‘हाता’, और क्षत्रिय राजनीति का केंद्र ‘शक्ति सदन’। 
इन तीनों केंद्रों के बीच राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष चलता रहा है। 1970 के दशक में गोरखपुर यूनिवर्सिटी में दो प्रमुख नेता, बलवंत सिंह (ठाकुर) और हरिशंकर तिवारी (ब्राह्मण) के बीच इस संघर्ष ने खूनी रूप ले लिया।
हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र प्रताप शाही
हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र प्रताप शाही के बीच चला यह गैंगवार 1980 के दशक तक चलता रहा। इस दौरान 50 से अधिक लोगों की हत्याएं हो गईं। तिवारी और शाही दोनों ने अपने-अपने जाति समूहों से राजनीतिक और सामाजिक संरक्षण प्राप्त किया। इस संघर्ष में कई नेता और गैंगस्टर उभरे, जिनमें से मुख्तार अंसारी और बृजेश सिंह प्रमुख हैं।
श्रीप्रकाश शुक्ला: उत्तर प्रदेश का सबसे खतरनाक गैंगस्टर
इस संघर्ष के बीच एक और गैंगस्टर का उदय हुआ, जिसने पूरे उत्तर प्रदेश में अपना दबदबा कायम कर लिया। वह था श्री प्रकाश शुक्ला। शुक्ला ने अपनी क्रूरता और हिंसक प्रवृत्ति से पूरे प्रदेश में अपना खौफ फैला दिया। उसने कई नेताओं और बाहुबलियों को मौत के घाट उतार दिया। अंततः 1998 में एक स्पेशल पुलिस टास्क फोर्स (STF) ने उसका सफाया कर दिया।
राजनीतिक संरक्षण और जाति आधारित गुटबाजी
इन गैंगस्टर्स को उनके जाति आधारित संरक्षण और राजनीतिक संबंध मजबूत करते रहे। हरिशंकर तिवारी को कई सरकारों में कैबिनेट मंत्री पद मिलता रहा, जबकि वीरेंद्र शाही और श्री प्रकाश शुक्ला को भी उनकी जाति के नेताओं का समर्थन प्राप्त था। इस प्रकार जाति और राजनीतिक संबंधों ने पूर्वांचल क्षेत्र में गैंगवार और अपराध को बढ़ावा दिया।
मुख्तार अंसारी और बृजेश सिंह: अगले दौर का संघर्ष
वीरेंद्र शाही के बाद पूर्वांचल में ठाकुरों का एक और प्रमुख नेता बृजेश सिंह उभरा। वह और मुख्तार अंसारी के बीच एक नया संघर्ष शुरू हुआ, जो अगले दो दशक से अधिक समय तक चलता रहा। यह संघर्ष भी जाति और राजनीतिक संरक्षण पर ही आधारित था।

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पूर्वांचल के माफियाओं और शूटरों का पसंदीदा आशियाना बना नवाबों का शहर लखनऊ https://sanjayrajput.com/2021/02/%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%94%e0%a4%b0.html https://sanjayrajput.com/2021/02/%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%94%e0%a4%b0.html#respond Sun, 28 Feb 2021 03:45:00 +0000 https://sanjayrajput.com/2021/02/28/%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%94%e0%a4%b0/ Read more

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यूपी की राजधानी लखनऊ एक लंबे अरसे से पूर्वांचल के माफियाओं की मनपसन्द शरणस्थली रही है। यही कारण है कि अक्सर यहाँ दिनदहाड़े गैंगवार और ताबड़तोड़ फायरिंग की घटनाएं आम बात हो गयी है। पिछले कुछ साल से पूर्वांचल के सभी जिलों के माफिया के गुर्गों और शूटरों ने भी राजधानी में अपने छुपने और ऐशो-आराम के अड्डे बना लिए हैं। शहर के पॉश इलाकों में साल-दर साल बढ़ रहीं गैंगवॉर और एनकाउंटर की घटनाएं इसका सबसे बड़ा सबूत हैं।

यूपी के अन्य जिलों से जिलाबदर होने या पुलिस की कार्रवाई से बचने के लिए ज्यादातर अपराधी लखनऊ आ जाते हैं और अपनी पहचान छिपाकर आलीशान फ्लैटों में ऐशो-आराम से रहते हैं। किराएदारों का पुलिस सत्यापन न होने से ये अपराधी पुलिस की पकड़ में भी नहीं आते।

मुख्तार अंसारी का शूटर था अजीत सिंह
विभूतिखंड के कठौता चौराहे के पास विगत 6 जनवरी 2021 बुधवार की रात एक गैंगवॉर में मऊ के पूर्व ब्लॉक प्रमुख अजीत सिंह की हत्या कर दी गई थी। पुलिस की शुरुआती छानबीन में पता चला कि मऊ से जिलाबदर होने के बाद अजीत सिंह लखनऊ आकर रह रहा था।

पूर्व आईजी आरके चतुर्वेदी का कहना हैं कि अजीत सिंह कोई माफिया नहीं है, बल्कि मुख्तार अंसारी का महज एक शूटर था। पुलिस के मुताबिक, वह राप्ती अपार्टमेंट में किराए पर रहता था। करीब दो माह पहले वह अलकनंदा का प्लैट छोड़कर यहां रहने आया था। इसके अलावा अन्य कई शूटरों की लोकेशन भी इसी इलाके में मिली है।
पुलिस के लिए मुसीबत बना अपार्टमेंट कल्चर
विगत कुछ वर्षों से राजधानी लखनऊ में अपार्टमेंट कल्चर की बाढ़ सी आ गयी है। चिनहट, गोमतीनगर, गोमतीनगर विस्तार, विभूतिखंड, एल्डको और सुशांत गोल्फ सिटी में बने अपार्टमेंटों में ज्यादातर लोगों ने निवेश के नाम पर फ्लैट लेकर किराए पर दे रखे हैं। ऐसे अपार्टमेंट में किराए पर रहने वाले लोगों का पुलिस सत्यापन तक नहीं होता। ऐसे में संदिग्ध लोग बड़े आराम से इन फ्लैटों में किराए पर रहने लगते हैं।

विगत दिनों विभूतिखंड जैसे पॉश इलाके में पुलिस चौकी से कुछ ही दूरी पर इस तरह की घटना गम्भीर चिंता का विषय है। अब माफियाओं के शूटर लखनऊ में आकर आपराधिक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं और यहीं छुप रहे है तो पुलिस के सूचना तंत्र पर सवाल उठना तो लाजिमी है। ऐसे में बेहतर ट्रेनिंग और सूचना तंत्र को मजबूत करने की जरूरत है – विक्रम सिंह (पूर्व डीजीपी)
राजधानी लखनऊ में है हर माफिया का ठिकाना
राजधानी लखनऊ और पूर्वांचल के माफियाओं का रिश्ता कई दशक पुराना है। पूर्व आईजी आरके चतुर्वेदी बताते हैं कि पूर्वांचल के माफियाओं के लिए लखनऊ हमेशा से एक मुफीद जगह रही है। चाहे हरीशंकर तिवारी हो या वीरेंद्र शाही, पूर्वांचल के माफिया लखनऊ में आकर ऐशो-आराम की जिंदगी गुजारते थे और यहीं रहकर राजनीति में भी घुसे।


गौरतलब है कि माफिया श्रीप्रकाश शुक्ला ने अपनी शुरुआत तो गोरखपुर से की थी लेकिन बाद में उसने लखनऊ को अपना आशियाना बना लिया। उसने लखनऊ में कई आलीशान मकान किराए पर लिए थे और यहीं से अपना गैंग भी ऑपरेट करता था। इतना ही नहीं, माफिया मुख्तार अंसारी, बबलू श्रीवास्तव, बृजेश सिंह, धनंजय सिंह या फिर मुन्ना बजरंगी हों, सभी ने लखनऊ में अपना-अपना कोई न कोई ठिकाना बना रखा है। गोरखपुर के टॉप 10 में शामिल माफिया अजीत शाही ने भी लखनऊ में ही अपना ठिकाना बना रखा है। विनोद उपाध्याय, चंदन सिंह आदि का भी ठिकाना लखनऊ में रहा है।
राजधानी लखनऊ ही क्यों है माफियाओं की पसंदीदा जगह?
पूर्व आईजी आरके चतुर्वेदी कहते हैं कि पश्चिमी यूपी के बदमाशों और माफियाओं को लखनऊ कभी भी रास नहीं आया। पश्चिम के माफिया और उनके गुर्गों ने हमेशा दिल्ली, हरियाणा, नोएडा और गुड़गांव को ही अपनी शरणस्थली के रूप में चुना। इसी तरह यूपी की राजधानी लखनऊ पूर्वांचल के माफियाओं के लिए दिल्ली के बराबर है। छुपने की सुरक्षित जगह से लेकर हाई क्लास सोसायटी तक सब कुछ राजधानी लखनऊ में मिलता है।


लखनऊ में साल दर साल बढ़ रहीं हैं वारदातें
28 जनवरी, 2014: लखनऊ के विशालखंड में किराए पर रहने वाले हिस्ट्रीशीटर झूंसी (प्रयागराज) निवासी आशीष मिश्र और उसके साथी रोहित की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई।
5 मार्च, 2016: मुन्ना बजरंगी के साले पुष्पजीत सिंह को विकासनगर में शूटरों ने ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर छलनी कर दिया। इसमें पुष्पजीत का दोस्त संजय भी मारा गया था।
1 दिसंबर, 2017:  मुन्ना बजरंगी का दाहिना हाथ माने जाने वाले तारिक को गोमतीनगर में ग्वारी पुल पर शूटरों ने गोलियों से भून दिया। चार गोली लगने से मौके पर ही तारिक की मौत हो गई।


4 नवंबर, 2019:  विभूतिखंड में यूपी एसटीएफ ने 50 हजार रुपये के इनामी बदमाश सचिन पांडेय को मुठभेड़ में मार गिराया। सचिन ने एक ग्राम प्रधान और एक पुलिसकर्मी की हत्या की सुपारी ली थी। उसने लखनऊ के गोमतीनगर विस्तार में एक फ्लैट में शरण ले रखी थी।
8 अगस्त, 2020:  बीजेपी विधायक कृष्णानंद राय की हत्या में शामिल माफिया मुख्तार अंसारी और मुन्ना बजरंगी के करीबी शूटर राकेश पांडेय उर्फ हनुमान पांडेय को एसटीएफ ने सरोजनीनगर इलाके में मार गिराया। राकेश ने भी राजधानी लखनऊ में ही अपना ठिकाना बना रखा था।

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वो दौर जब गोरखपुर था ‘अपराधों की राजधानी’ https://sanjayrajput.com/2020/05/once-upon-time-in-gorakhpur.html https://sanjayrajput.com/2020/05/once-upon-time-in-gorakhpur.html#respond Tue, 26 May 2020 12:26:00 +0000 https://sanjayrajput.com/2020/05/26/%e0%a4%b5%e0%a5%8b-%e0%a4%a6%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%96%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a7/ Read more

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योगी आदित्यनाथ का शहर गोरखपुर आज भले ही विकास का रोल मॉडल बनकर सीएम सिटी के रूप में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है मगर 1970 के दशक में जब पूरे देश में जेपी आंदोलन जोरों पर था उन दिनों गोरखपुर सिर्फ जातीय संघर्षों, वर्चस्व की लड़ाई और गैंगवार के लिए ही बदनाम हुआ करता था। 
कई नए माफियाओं के उदय की भूमि होने के चलते गोरखपुर को ‘Crime Capital of North India’ कहा जाने लगा था। यहां की छात्र राजनीति भी दो गुटों में बँटी हुई थी और गोरखपुर यूनिवर्सिटी में ब्राह्मण और क्षत्रिय दो गुट हुआ करते थे। इन दोनों गुटों की आपसी रंजिश और मुठभेड़ से गोरखपुर में रोज अपराध की एक नई कहानी लिखी जाती थी।

उस वक्त जब देश भर के छात्र नेता देश को बदलने के जुनून में सड़कों पर आंदोलन करने में जुटे थे। वहीं गोरखपुर के छात्र नेता देशी तमंचे लहराते हुए अपने वर्चस्व को कायम करने में जुटे हुए थे। उस समय गोरखपुर यूनिवर्सिटी में दो छात्र नेता हुआ करते थे, ठाकुर गुट के रविन्द्र सिंह और ब्राह्मण गुट के हरिशंकर तिवारी। इन दोनों छात्र नेताओं में हमेशा वर्चस्व को लेकर लड़ाई ठनी रहती थी। वो एक ऐसा दौर था जब गोरखपुर यूनिवर्सिटी शिक्षा का केंद्र न होकर ब्राह्मण-ठाकुर जातीय संघर्ष का अखाड़ा बनकर रह गया था।

इन दोनों गुटों में गोरखपुर यूनिवर्सिटी में अपना-अपना वर्चस्व कायम करने हेतु आए दिन असलहे लहराना, मारपीट और बवाल होते रहते थे। इस बीच ठाकुरों के नेता रविन्द्र सिंह को वीरेंद्र प्रताप शाही नाम का एक नया और तेज तर्रार लड़का मिला जो कि उनकी ही जाति से था। 


यह वो दौर था जब जाति को सबसे ज्यादा तवज्जो दी जाती थी। जिले में ब्राह्मण और ठाकुर दोनों गुट अपना-अपना वर्चस्व कायम करने में जुटे रहते थे। और इन दोनों गुटों की आपसी वर्चस्व की लड़ाई ने गोरखपुर का अमन चैन पूरी तरह छीन लिया था। उन दिनों आये दिन गोरखपुर की सड़कों पर मर्डर, फिरौती, रंगबाजी, डकैती का ही तांडव हुआ करता था। 


उन दिनों गोरखपुर के हालात ऐसे हुआ करते थे कि इन दोनों गुटों के लोग दुकान से सामान लेते और दुकानदार द्वारा पैसे मांगने पर गोली मार देते थे। गुंडई का आलम यह था कि यहाँ लोग पेट्रोल भराकर पैसे तक नहीं देते थे और पैसे मांगने पर गोली मार देते थे। ऐसी घटनाएं आम होने लगी थी। फिर इन दोनों गुटों को वर्चस्व के साथ-साथ पैसे की अहमियत भी समझ में आने लगी थी। उसी दौर में रेलवे के स्क्रैप की ठेकेदारी भी मिलने लगी थी और दोनों गुट अब अपने-अपने वर्चस्व का इस्तेमाल करके ठेकेदारी और अन्य कामों में लग गए। 
1980 में हरिशंकर तिवारी ने रेलवे के ठेके में अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी।  हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र शाही दोनों ने अपने-अपने गुट को मजबूत करना शुरू कर दिया था। इन दोनों ने अपने-अपनेे संगठित गैंग भी बना लिए थे। उन्हीं दिनों कई बार ऐसा हुआ जब दोनों माफियाओं के बीच जारी वर्चस्व की जंग में पूरा गोरखपुर शहर थर्रा गया था। 
तब पूर्वांचल में रोज कहीं न कहीं गैंगवार में चली गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई देती रहती थी। आए दिन दोनों गुटों के कुछ लोग मारे जाते थे। साथ ही कई निर्दोष लोग भी मरते थे। इसी दौरान ब्राह्मण-ठाकुर जातीय संघर्ष में लखनऊ और गोरखपुर विवि के छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके युवा विधायक रविंद्र सिंह की भी हत्या हो गई।

बताया जाता हैं कि इस घटना के बाद ठाकुरों के गुट ने वीरेंद्र प्रताप शाही को अपना नेता मान लिया। कुछ ही दिनों में वीरेंद्र शाही की तूती बोलने लगी और उन्हें ‘शेरे-पूर्वांचल’ तक कहा जाने लगा। अब गोरखपुर माफियाराज से पूरी तरह रूबरू हो चुका था और सरकारी सिस्टम यहाँ पूरी तरह फेल हो चुका था। इन दोनों गुटों की गैंगवार के चलते गोरखपुर ही नहीं आसपास के जिलों की कानून-व्यवस्था भी पूरी तरह फेल हो गयी थी।
फिर जब दोनों गुटों ने ठेके आदि से खुद को आर्थिक रूप से सक्षम बना लिया तब पूर्वांचल से निकलकर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इन दोनों गुटों ने अपनी-अपनी एक समानांतर सरकार बना ली। इन लोगों के यहाँ अपनी अपनी बिरादरी के जनता दरबार भी लगने लगे। जमीनी विवाद से लेकर हर तरह के मुद्दे इनके दरबार में आने लगे थे। लोग अपने विवादों के निपटारे के लिए कोर्ट जाने से बेहतर इन माफियाओं के दरबार को समझने लगे थे।


इसी बीच 1985 में गोरखपुर के वीर बहादुर सिंह ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल ली। उनके लिए प्रदेश संभालने से महत्वपूर्ण माफियाओं को संभालना चुनौती थी। हर एक की निगाह वीर बहादुर सिंह पर ही थी। उन्होेंने इसके लिए गैंगेस्टर एक्ट लाया। लेकिन इन लोगों को सामाजिक स्वीकार्यता मिल चुकी थी। राजनीति में भी इनकी बराबर भागीदारी और स्वीकार्यता मिल चुकी थी। जानकार बताते हैं कि इनकी स्वीकार्यता का ही नतीजा है कि पंडित हरिशंकर तिवारी छह बार तो वीरेंद्र प्रताप शाही दो बार विधायक चुने गए। कानून व्यवस्था को दरबारी बनाने के लिए इन पर अंगुलियां उठी तो न जाने कितने इनके दर पर आकर न्याय पाकर दुआ देते हुए लौटे भी। अलग-अलग क्षेत्रों में दबंग छवि वालों को जनता अपना रहनुमा चुनने लगी। पूर्व विधायक अंबिका सिंह, पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी, पूर्व सांसद ओम प्रकाश पासवान, पूर्व सांसद बालेश्वर यादव आदि का उनके क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ने के साथ जनप्रतिनिधि के रूप में लोगों के रहनुमा बन चुके थे।

राजनीति से अपराधियों के गठजोड़ की अपने देश में पुरानी परंपरा है। कहा जाता है किं यदि सौ गुनाह करने के बाद भी कानून की नजरों से बचना हो तो राजनीति का चोला ओढ़ लो। इसी फॉर्मूले को अपनाकर इन दोनों गुटों के माफियाओं ने भी बाद में पैसे के बल पर राजनीति की चादर ओढ़ ली और माफिया से माननीय बन गए। 


फिर 90 के दशक में गोरखपुर के गांव मामखोर के एक शिक्षक का लड़का श्रीप्रकाश शुक्ला सबको पीछे छोड़ते हुए जरायम की दुनिया में तेजी से उभरा। अपनी बहन को छेड़े जाने पर उसने पहली हत्या की और उसके बाद हरिशंकर तिवारी ने उसे बैंकॉक भेजकर उसे पुलिस के हाथों बचाया। अपनी बिरादरी के होने के नाते हरिशंकर तिवारी ने उसे गुनाह की दुनिया में अपने फायदे के लिए एक मोहरे की तरह इस्तेमाल करना शुरू किया। लेकिन महत्वाकांशी श्रीप्रकाश शुक्ला ने गुनाह की दुनिया में तिवारी से बगावत करते हुए AK-47 जैसे असलहों से लैस अपनी अलग गैंग बनाकर पूर्वांचल से बिहार, दिल्ली, ग़ाज़ियाबाद तक अपने खौफ का साम्राज्य फैलाना शुरू कर दिया। अब बिहार के माफिया डॉन और रेलवे के ठेकेदार सूरजभान का भी हाथ श्रीप्रकाश के सिर पर था। 1997 में श्रीप्रकाश शुक्ला ने वीरेंद्र शाही की लखनऊ में गोली मारकर हत्या कर दी। उसका अगला टारगेट माफिया से माननीय बना हरिशंकर तिवारी ही था परन्तु इस बीच उसने सूबे के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को मारने के लिए 6 करोड़ की सुपारी ले ली जिसके बाद यूपी एसटीएफ (STF) ने 1998 में श्रीप्रकाश शुक्ला को लखनऊ में एक एनकाउंटर के दौरान मार गिराया। 

वीरेंद्र शाही की हत्या के बाद छोटे-छोटे गिरोह ने अपनी धमक बनानी शुरू कर दी। कुछ ने जरायम की दुनिया में हनक दिखाने के साथ राजनीति में भी कदम रखा। जो सिलसिला आज भी कायम है। कई आज की तारीख में सत्ता के लाभ वाले पद को भी सुशोभित कर रहे हैं।  
क्योंकि हमारे समाज में गुंडों को पूजने का पुराना रिवाज है इसलिए यहाँ लोग जेल से भी चुनाव लड़कर जीत जाते हैं। जब भी कोई माफिया, बाहुबली पैसों के बल पर जोर-शोर से लाव-लश्कर के साथ चुनाव लड़ता है तो वो बम्पर वोटों से जीत हासिल करता है। वहीं जब कोई साधारण और बेदाग छवि वाला आदमी बिना लाव-लश्कर के चुनाव लड़ता है तो उसकी जमानत तक जब्त हो जा्ती है।


योगी आदित्यनाथ के यूपी का सीएम बनने के बाद पूरे प्रदेश से गुंडाराज खत्म हुआ है और प्रदेश के साथ-साथ गोरखपुर में भी चलने वाले छोटे-बड़े गैंग या तो खत्म हो गए हैं या सभी अपराधी और गुंडे भूमिगत हो गए हैं। पहले जहाँ गोरखपुर में आये दिन सरेआम फिरौती, रंगबाजी और लूटपाट आम बात थी वहीं अब कानून व्यवस्था फिर से कायम हुई है। 

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