Rajput History – SanjayRajput.com https://sanjayrajput.com सच की ताकत Sat, 27 Dec 2025 07:00:51 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.4 https://sanjayrajput.com/wp-content/uploads/2024/07/cropped-91-98392-81815-20231027_230113.jpg Rajput History – SanjayRajput.com https://sanjayrajput.com 32 32 235187837 हल्दीघाटी के बाद का संघर्ष: इतिहास के भूले-बिसरे पन्नों में महाराणा प्रताप का अदम्य प्रतिरोध https://sanjayrajput.com/2025/12/haldighati-ke-bad-ka-sangharsh.html https://sanjayrajput.com/2025/12/haldighati-ke-bad-ka-sangharsh.html#respond Sat, 27 Dec 2025 06:59:38 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=1285 Read more

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इतिहास में हल्दीघाटी के युद्ध का उल्लेख तो मिलता है, लेकिन इसके बाद के लगभग एक दशक में मेवाड़ में क्या हुआ, इस पर बहुत कम चर्चा की जाती है। इतिहास के कई ऐसे पन्ने हैं, जिन्हें या तो जानबूझकर दरकिनार किया गया या पाठ्यक्रम से हटा दिया गया। ये वही घटनाएं हैं, जो हिंदू प्रतिरोध, साहस और स्वाभिमान की सशक्त मिसाल प्रस्तुत करती हैं।

इतिहास की पुस्तकों में यह तथ्य भी सीमित रूप से ही बताया गया है कि हल्दीघाटी के युद्ध के दौरान महाराणा प्रताप के प्रचंड आक्रमण से मुगल सेना कुछ समय के लिए पांच-छह कोस तक पीछे हट गई थी। बाद में अकबर के स्वयं आने की अफवाह के चलते शाही सेना दोबारा युद्ध में उतरी। यह उल्लेख स्वयं अबुल फजल की रचना अकबरनामा में मिलता है।

क्या हल्दीघाटी ही अंतिम युद्ध था?

इतिहासकारों द्वारा हल्दीघाटी को एक निर्णायक और अंतिम युद्ध के रूप में प्रस्तुत करना मेवाड़ के इतिहास के साथ अन्याय माना जाता है। वास्तविकता यह है कि हल्दीघाटी केवल महाराणा प्रताप और मुगलों के बीच लंबे संघर्ष की शुरुआत थी। मुगल न तो महाराणा प्रताप को बंदी बना सके और न ही मेवाड़ पर स्थायी नियंत्रण स्थापित कर पाए।

गुरिल्ला युद्ध की रणनीति

हल्दीघाटी के बाद महाराणा प्रताप के पास लगभग सात हजार सैनिक शेष रह गए थे। इसी दौरान मुगलों ने कुम्भलगढ़, गोगुंदा, उदयपुर और आसपास के क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। ऐसी विषम परिस्थितियों में महाराणा प्रताप ने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई और मुगलों को मेवाड़ में स्थायी रूप से बसने से रोके रखा।

इतिहासकारों के अनुसार, 1577 से 1582 के बीच अकबर ने हर वर्ष लगभग एक-एक लाख सैनिकों की सेनाएं मेवाड़ भेजीं, लेकिन वे महाराणा प्रताप को झुकाने में असफल रहीं।

भामाशाह का योगदान और सेना का पुनर्गठन

हल्दीघाटी के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची भामाशाह और उनके भाई ताराचंद मालवा से भारी धनराशि लेकर पहुंचे। इस सहयोग से महाराणा ने पुनः सेना का संगठन किया। कहा जाता है कि इस धन से लगभग 25 हजार सैनिकों को वर्षों तक रसद उपलब्ध कराई जा सकती थी। कुछ ही समय में महाराणा प्रताप ने लगभग 40 हजार योद्धाओं की सशक्त सेना खड़ी कर दी।

दिवेर का युद्ध: इतिहास का अनदेखा अध्याय

सन 1582 में विजयदशमी के दिन महाराणा प्रताप ने मेवाड़ की स्वतंत्रता पुनः प्राप्त करने का संकल्प लिया। सेना को दो भागों में विभाजित किया गया। एक टुकड़ी का नेतृत्व स्वयं महाराणा ने किया, जबकि दूसरी का नेतृत्व युवराज अमर सिंह ने संभाला। इस संघर्ष को इतिहास में दिवेर का युद्ध कहा जाता है।

इतिहासकार कर्नल टॉड ने हल्दीघाटी को “मेवाड़ का थर्मोपाइली” और दिवेर के युद्ध को “राजस्थान का मैराथन” बताया है। उन्होंने महाराणा प्रताप और उनकी सेना की तुलना स्पार्टन्स से की है, जो संख्या में कम होने के बावजूद कई गुना बड़ी सेना से टकराने का साहस रखते थे।

भीषण युद्ध और मुगलों की पराजय

दिवेर का युद्ध अत्यंत भीषण था। युवराज अमर सिंह के नेतृत्व में राजपूत सेना ने दिवेर थाने पर हमला किया। युद्ध में हजारों मुगल सैनिक मारे गए। उल्लेख मिलता है कि अमर सिंह के प्रहार से सुल्तान खान मुगल अपने घोड़े सहित धराशायी हो गया। वहीं, महाराणा प्रताप ने बहलोल खान पर ऐसा वार किया कि वह घोड़े समेत कट गया।

इस युद्ध के बाद लगभग 36 हजार मुगल सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया। दिवेर की पराजय से मुगलों का मनोबल इस कदर टूट गया कि उन्हें मेवाड़ में बने अपने 36 थानों और चौकियों को छोड़कर पीछे हटना पड़ा। यहां तक कि कुम्भलगढ़ का किला भी मुगलों ने रातों-रात खाली कर दिया।

मेवाड़ की पुनः स्वतंत्रता

दिवेर के बाद महाराणा प्रताप ने गोगुंदा, कुम्भलगढ़, बस्सी, चावंड, जावर, मदारिया, मोही और माण्डलगढ़ जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर दोबारा अधिकार कर लिया। चित्तौड़ को छोड़कर मेवाड़ के अधिकांश दुर्ग और ठिकाने पुनः स्वतंत्र करा लिए गए।

इसके पश्चात महाराणा ने कड़े आदेश जारी किए, जिससे मेवाड़ में मुगलों की रसद और कर वसूली पूरी तरह बाधित हो गई। परिणामस्वरूप शाही रसद अजमेर से भारी सुरक्षा में भेजी जाने लगी।

इतिहास का निर्णायक मोड़

दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप के जीवन का, बल्कि मुगल इतिहास का भी एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। इस संघर्ष ने मेवाड़ में अकबर की विजय श्रृंखला पर विराम लगा दिया। इसके बाद अकबर के शासनकाल में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए।

इतिहासकारों का मानना है कि ये वे घटनाएं हैं, जिन्हें दरबारी इतिहासकारों ने जानबूझकर हाशिये पर डाल दिया। अब समय है कि इतिहास के इन भूले-बिसरे अध्यायों को पुनः सामने लाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां मेवाड़ के इस अद्वितीय संघर्ष को जान सकें।

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अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के पूर्वांचल प्रांत का हुआ संगठन विस्तार, युवाओं को मिली नई जिम्मेदारी https://sanjayrajput.com/2025/12/kshatriya-mahasabha-up-has-expanded-its-organization-with-youth-given-new-responsibilities.html https://sanjayrajput.com/2025/12/kshatriya-mahasabha-up-has-expanded-its-organization-with-youth-given-new-responsibilities.html#respond Mon, 15 Dec 2025 11:34:57 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=1271 Read more

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गोरखपुर। अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के पूर्वांचल प्रांत में बड़े स्तर पर संगठन विस्तार किया गया है। रविवार को संगठन के वरिष्ठ प्रदेश उपाध्यक्ष जगदंबा सिंह ‘शक्ति’ के मोहद्दीपुर स्थित आवास पर आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में प्रदेश अध्यक्ष विनोद कुमार सिंह द्वारा नव मनोनीत पदाधिकारियों को मनोनयन पत्र सौंपे गए।

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यह बैठक प्रदेश अध्यक्ष विनोद कुमार सिंह के निर्देश पर, प्रदेश वरिष्ठ महामंत्री अश्वनी कुमार सिंह ‘लालू’ के निवेदन तथा राष्ट्रीय सचिव ओंकार नाथ सिंह के अनुमोदन से आयोजित की गई। बैठक का नेतृत्व वरिष्ठ प्रदेश उपाध्यक्ष जगदंबा सिंह ‘शक्ति’ एवं प्रदेश अध्यक्ष युवा प्रकोष्ठ सूरज सिंह सेंगर ने किया।

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संगठन की मुख्य इकाई में गोविंद प्रकाश शाही को प्रदेश उपाध्यक्ष, अनिल सिंह बबलू को प्रदेश मंत्री बनाया गया। वहीं गोरखपुर मंडल में शिव प्रताप सिंह को मंडल महामंत्री, अभय सिंह राका को मंडल उपाध्यक्ष एवं शंकर दयाल सिंह को मंडल संगठन मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई।

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प्रदेश युवा प्रकोष्ठ में पवन सिंह बारीगांव को वरिष्ठ प्रदेश उपाध्यक्ष, भूपेंद्र सिंह गुड्डू को प्रदेश संगठन मंत्री, राज सिंह को प्रदेश महासचिव, अविनाश सिंह ज़रार एवं मानवेंद्र सिंह को प्रदेश उपाध्यक्ष तथा रंजीत सिंह सिकरवार को प्रदेश मीडिया प्रभारी नियुक्त किया गया। इसके अतिरिक्त कु० राहुल सिंह को प्रदेश अध्यक्ष व्यापार प्रकोष्ठ, कु० राणा प्रताप सिंह को प्रदेश अध्यक्ष किसान मोर्चा एवं राजेश सिंह राहत को प्रदेश अध्यक्ष सांस्कृतिक प्रकोष्ठ बनाया गया।

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युवा प्रकोष्ठ के अंतर्गत सुमित सिंह को गोरखपुर जिलाध्यक्ष, शशि देव सिंह को बलिया जिलाध्यक्ष, अविनाश प्रताप सिंह को संतकबीरनगर जिलाध्यक्ष, प्रियांशु सिंह को महराजगंज जिलाध्यक्ष एवं भूपेंद्र शाही को देवरिया जिलाध्यक्ष नियुक्त किया गया।

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बलिया जिले के युवा प्रकोष्ठ में लड्डू सिंह को जिला मंत्री, कौशल किशोर सिंह को जिला महामंत्री, प्रशांत कुमार सिंह को जिला सचिव, शिवराज सिंह को जिलाध्यक्ष खेलकूद प्रकोष्ठ, अनिकेत सिंह को बलिया नगर अध्यक्ष तथा अनुभव सिंह को नगर उपाध्यक्ष बनाया गया।

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देवरिया जनपद से राजीव कुमार सिंह को युवा प्रकोष्ठ जिला संयोजक, इंद्रेश सिंह रामू को जिला प्रभारी, सुमित सिंह रामू को जिला कोषाध्यक्ष, शैलेन्द्र सिंह टुन्नु को वरिष्ठ जिला महामंत्री, सुधीर सिंह को जिला संगठन मंत्री, समरेंद्र सिंह सम्मी को मंडल मीडिया प्रभारी, प्रशांत सिंह पीयूष को वरिष्ठ मंडल महामंत्री एवं धर्मेंद्र सिंह को मंडल महामंत्री की जिम्मेदारी दी गई।

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इस अवसर पर राष्ट्रीय सचिव ओंकार नाथ सिंह, प्रदेश अध्यक्ष विनोद कुमार सिंह एवं प्रदेश वरिष्ठ महामंत्री अश्वनी कुमार सिंह ‘लालू’ ने सभी नव मनोनीत पदाधिकारियों को शुभकामनाएं देते हुए संगठन को और अधिक मजबूत बनाने का आह्वान किया।

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बैठक में प्रदेश उपाध्यक्ष ज्ञान प्रकाश सिंह, देवरिया के जिला उपाध्यक्ष छोटे सिंह (पूर्व प्रधान इंदुपुर), गोरखपुर के वरिष्ठ महामंत्री राजकुमार सिंह श्रीनेत, जिला वरिष्ठ उपाध्यक्ष विनय चंद, प्रदेश वरिष्ठ महामंत्री युवा प्रकोष्ठ अनुज सिंह कटका, करुण्रेंद्र सिंह सहित गोरखपुर, देवरिया, बलिया, संतकबीरनगर, आजमगढ़ समेत कई जनपदों से सैकड़ों क्षत्रिय समाज के लोग उपस्थित रहे।

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गद्दार नहीं, धर्मपरायण और देशभक्त राजा थे जयचंद – जानिए असली इतिहास https://sanjayrajput.com/2025/12/raja-jaichand-true-history-facts.html https://sanjayrajput.com/2025/12/raja-jaichand-true-history-facts.html#respond Thu, 11 Dec 2025 02:34:50 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=1263 Read more

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भारत के मध्यकालीन इतिहास में राजा जयचंद का नाम अक्सर गलत आरोपों और अधूरी कहानियों के कारण बदनाम किया गया है। सदियों तक लोककथाओं और पक्षपातपूर्ण साहित्य ने उन्हें ‘गद्दार’ के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि वास्तविक इतिहास इससे कहीं अलग तस्वीर दिखाता है।

राजा जयचंद की छवि को गलत क्यों पेश किया गया?

कई साहित्यिक रचनाएँ, विशेषकर लोककाव्य और कथाएँ, समय के साथ राजनीतिक और सामाजिक पक्षपात का शिकार बनीं। इसमें जयचंद को विदेशी आक्रमणों के लिए दोषी ठहराया गया, जबकि इस दावे के समर्थन में कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है

इतिहासकारों का मानना है कि यह छवि अधिकतर प्रतिस्पर्धी राजवंशों की कथाओं और बाद के लेखकों द्वारा गढ़े गए वर्णनों का परिणाम है।

धर्मनिष्ठ और प्रजा-हितैषी शासक

जयचंद न केवल एक शक्तिशाली शासक थे, बल्कि धार्मिक रूप से आस्थावान, कला-संरक्षक और अपने राज्य की समृद्धि के लिए समर्पित राजा भी थे। पुरालेखों और शिलालेखों में उनके द्वारा किए गए दान, सामाजिक कार्यों और सांस्कृतिक योगदानों के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।

क्या जयचंद ने वास्तव में ‘विश्वासघात’ किया था?

आधुनिक इतिहासकारों और शोधकर्ताओं ने स्पष्ट कहा है कि यह एक मिथक है। न तो किसी विदेशी ताकत से उनकी मिलीभगत का रिकॉर्ड मिलता है, न ही किसी युद्ध में उनका ऐसा कोई कदम दर्ज है जिसे विश्वासघात कहा जा सके।

वास्तव में, उन्होंने अपने राज्य की रक्षा हेतु कई महत्वपूर्ण युद्ध लड़े और एक राजपूत शासक के रूप में अपने धर्म और कर्तव्य का निर्वाह किया।

इतिहास में कैसे फैला भ्रम?

  • लोककथाएँ और कवियों द्वारा रचे पक्षपातपूर्ण वर्णन
  • प्रतिद्वंदी राजवंशों की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता
  • बाद के युगों में कथा-नाटकों का अतिशयोक्तिपूर्ण प्रस्तुतिकरण
  • लंबे समय तक इतिहास का व्यवस्थित लेखन न होना

आधुनिक शोध क्या साबित करते हैं?

नए अभिलेखों, शिलालेखों और ऐतिहासिक संदर्भों ने यह सिद्ध कर दिया है कि जयचंद एक धर्मपरायण, जिम्मेदार और देशभक्त शासक थे। गलत धारणाएं केवल लोकप्रिय साहित्य के कारण बनीं।

निष्कर्ष – अब समय है वास्तविक इतिहास जानने का

राजा जयचंद को सदियों तक गलत आरोपों का बोझ उठाना पड़ा, जबकि तथ्य बताते हैं कि उन्होंने अपने धर्म, राज्य और जनता के लिए ईमानदारी से शासन किया। आधुनिक शोध उनके चरित्र को बिल्कुल नए दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता पर जोर देते हैं।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

क्या राजा जयचंद वास्तव में गद्दार थे?

नहीं। ऐसा कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है जो उन्हें गद्दार साबित करे। यह सिर्फ लोक कथाओं का प्रचारित भ्रम है।

जयचंद और विदेशी आक्रमणकारियों की मिलीभगत की कहानी कहाँ से आई?

कुछ कवियों और साहित्यकारों ने राजनीतिक कारणों से उनके विरुद्ध लिख दिया। समय के साथ मिथक को इतिहास मान लिया गया।

जयचंद किस प्रकार के शासक थे?

वे एक धार्मिक, न्यायप्रिय, दानशील और प्रजा-हितैषी शासक थे। उनके शासनकाल के सामाजिक व सांस्कृतिक कार्य इसे प्रमाणित करते हैं।

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मुसाफिर शाही की पांचवीं पुण्यतिथि पर अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा ने दी श्रद्धांजलि https://sanjayrajput.com/2025/12/abkm-paid-tribute-to-musafir-shahi-on-his-fifth-death-anniversary.html https://sanjayrajput.com/2025/12/abkm-paid-tribute-to-musafir-shahi-on-his-fifth-death-anniversary.html#respond Sat, 06 Dec 2025 13:54:03 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=1260 Read more

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मुसाफिर शाही की अनमोल विरासत को बखूबी संभाल रही हैं मंजू शाही: विनोद सिंह

गोरखपुर। स्व मुसाफिर शाही की पांचवीं पुण्यतिथि श्री हरिनारायण चन्द उच्चतर माध्यमिक विद्यालय नेवादा, बड़हलगंज के प्रांगण में मनाई गई। इस अवसर पर एक श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई जिसमें क्षेत्र के तमाम गणमान्य लोग उपस्थित रहे। साथ ही उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र छात्राओं सहित अन्य लोगों को पुरस्कृत भी किया गया।

इस अवसर पर अपने संबोधन में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के प्रदेश अध्यक्ष विनोद कुमार सिंह ‘लालू’ ने कहा कि स्व मुसाफिर शाही की अनमोल विरासत को उनकी बेटी मंजू शाही बखूबी संभाल रही हैं। वे अपने पिता के पद चिन्हों पर चलते हुए समाज के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण पेश कर रही हैं जिस पर पूरे क्षत्रिय समाज को गर्व है।

बता दें कि हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी नेवादा, बड़हलगंज स्थित श्री हरिनारायण चन्द उच्चतर माध्यमिक विद्यालय प्रांगण में स्व मुसाफिर शाही की पांचवीं पुण्यतिथि उनकी पुत्री तथा स्कूल की प्रबंधक मंजू शाही द्वारा तमाम कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस मौके पर मातृ आंचल सेवा संस्थान की संचालिका देहदानी व रक्तदानी पुष्पलता सिंह अम्मा को अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया। साथ ही खेलकूद तथा पढ़ाई में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यालय के छात्र छात्राओं को पुरस्कृत किया गया साथ ही विद्यालय की प्रबंधक मंजू शाही द्वारा कम्बल वितरण भी किया गया।

इस दौरान मुख्य रूप से अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुनील कुमार सिंह, प्रदेश अध्यक्ष विनोद कुमार सिंह, प्रदेश वरिष्ठ महामंत्री अश्वनी कुमार सिंह (लालू सिंह), प्रदेश अध्यक्ष खेलकूद प्रकोष्ठ रंजीत शाही, मंडल अध्यक्ष आरपी सिंह, जिला संगठन मंत्री प्रवीण सिंह, श्री हरिनारायण चन्द उच्चतर माध्यमिक विद्यालय नेवादा की प्रबंधक एवं प्रदेश उपाध्यक्ष वीरांगना प्रकोष्ठ मंजू शाही, आरपीएम स्कूल के डायरेक्टर अजय शाही, एडी इंटर कॉलेज की प्रवक्ता व मशहूर कवियित्री डॉ. चारु शाही सहित हजारों की संख्या में लोग उपस्थित रहे।

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अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा ने गोरखपुर में राष्ट्रीय अध्यक्ष कुँवर हरिवंश सिंह के 75 वें जन्मदिन पर किया वृक्षारोपण https://sanjayrajput.com/2025/09/all-india-kshatriya-mahasabha-planted-trees-in-gorakhpur-on-the-75th-birthday-of-national-president-kunwar-harivansh-singh.html https://sanjayrajput.com/2025/09/all-india-kshatriya-mahasabha-planted-trees-in-gorakhpur-on-the-75th-birthday-of-national-president-kunwar-harivansh-singh.html#respond Thu, 04 Sep 2025 14:32:09 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=1208 Read more

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गोरखपुर। अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्व सांसद कुँवर हरिवंश सिंह के 75 वें जन्मदिन पर गोरखपुर के शहीद अशफाक उल्ला प्राणी उद्यान में संगठन के पदाधिकारियों द्वारा वृक्षारोपण किया गया। इस दौरान संगठन के लोगों द्वारा आंवला, नीम, जामुन, मौलश्री, पाकड़ आदि के पौधे लगाए गए।

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इसके पश्चात राष्ट्रीय अध्यक्ष के जन्मदिन पर संगठन के पदाधिकारियों ने केक काटकर अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष का जन्मदिन मनाया। इस वृक्षारोपण कार्यक्रम के दौरान प्राणी उद्यान के पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. योगेश प्रताप सिंह सहित संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुनील सिंह, प्रदेश अध्यक्ष वीरांगना प्रकोष्ठ सीमा सिंह, प्रदेश सचिव अरविंद सिंह मंटू , पूर्वांचल प्रांत उपाध्यक्ष राजकुमार सिंह, मंडल उपाध्यक्ष इंद्रसेन सिंह, जिला उपाध्यक्ष राघवेंद्र प्रताप सिंह, जिला वरिष्ठ महामंत्री राजकुमार सिंह श्रीनेत, जिला संगठन मंत्री प्रवीण सिंह आदि लोग मौजूद रहे।

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Shaheed Ravindra Singh Gorakhpur: पूर्वांचल का वो युवा नेता जिसने मचा दी थी राजनीति में हलचल https://sanjayrajput.com/2025/08/shaheed-ravindra-singh-gorakhpur.html https://sanjayrajput.com/2025/08/shaheed-ravindra-singh-gorakhpur.html#respond Sat, 30 Aug 2025 10:37:53 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=1199 Read more

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Shaheed Ravindra Singh Gorakhpur: पूर्वांचल के गोरखपुर से ही देश की सियासत में पहली बार अपराधीकरण की शुरुआत हुई। दरअसल 70 के दशक में इमरजेंसी का दौर था। देश में जेपी आंदोलन सियासत के नए चेहरे जन्म दे रहा था। इस आंदोलन से कई युवा प्रभावित हुए और छात्र राजनीति में कूद पड़े। इसी दौर में गोरखपुर यूनिवर्सिटी में हरिशंकर तिवारी और बलवंत सिंह छात्रनेता हुए। दोनों में ही वर्चस्व को लेकर जंग चल रही थी। खास बात ये थी कि इन्होंने छात्र राजनीति में जातिवाद का प्रयोग शुरू कर दिया था। बलवंत सिंह जहां ठाकुर लॉबी को जोड़ने में जुटे थे, वहीं दूसरी तरफ हरिशंकर तिवारी ब्राह्मण युवाओं को अपनी तरफ जोड़ने की कोशिश करते।

ये वो दौर था जब पूर्वांचल की राजनीति में एक और युवा अपनी तेजी से अपनी पहचान बना रहा था। नाम था रविंद्र सिंह। रविंद्र सिंह 1967 में गोरखपुर यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे। इसके बाद 1972 में लखनऊ यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे। तेज तर्रार छवि के रविंद्र सिंह ने देखते ही देखते गोरखपुर और आसपास के इलाकों में अपनी अच्छी पहचान बना ली थी। इसी को देखते हुए उन्हें जनता पार्टी ने 1977 में टिकट दिया। अपने पहले ही चुनाव में रविंद्र सिंह कौड़ीराम सीट से विधायक चुने गए। कहा जाता है कि रविंद्र सिंह वीरेंद्र शाही के करीबी थे, वीरेंद्र शाही धीरे-धीरे रविंद्र सिंह से ही राजनीति के गुर सीख रहे थे। लेकिन तभी रविंद्र सिंह की गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर हत्या हो जाती है। उन्हें गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर गोलियों से भून दिया जाता है।

स्व. सिंह जी छात्र जीवन से ही सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। वे आज़ाद भारत के पहले ऐसे विधायक बने जिन्हें गोरखपुर विश्वविद्यालय और लखनऊ विश्वविद्यालय दोनों का छात्रसंघ अध्यक्ष बनने का गौरव प्राप्त हुआ। उनकी कर्मठता और लोकप्रियता के चलते 1977 में जनता पार्टी ने उन्हें कौड़ीराम विधानसभा से प्रत्याशी बनाया और वे भारी मतों से विजयी हुए।

विधानसभा में उनके सशक्त भाषणों और ईमानदार छवि से अपराध और दबंगई के सहारे राजनीति करने वालों की जमीन खिसकने लगी थी। यही वजह थी कि लखनऊ जाते समय गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर उनकी हत्या कर दी गई।

उनके न रहने के बाद भी उनकी विचारधारा जीवित रही। उनकी धर्मपत्नी गौरी देवी जी चार बार उसी विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुनी गईं। समाज और राजनीति में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। 1971 के भारत-पाक युद्ध में युवाओं की फौज तैयार कर देश की सेवा करना, क्यूबा की राजधानी में भारत के युवाओं का प्रतिनिधित्व करना और आपातकाल के दौरान 20 महीने जेल में रहकर लोकतंत्र की रक्षा करना उनकी महान उपलब्धियों में शामिल है।

स्व. रवींद्र सिंह का संघर्षमय जीवन, ईमानदारी और कर्मठता आज भी युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। पूर्वांचल की राजनीति में अपने क्रांतिकारी विचारों और प्रभावशाली व्यक्तित्व से अमिट छाप छोड़ने वाले पूर्व विधायक स्व. रवींद्र सिंह जी की 46वीं पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

“बड़े गौर से सुन रहा था ज़माना, तुम्हीं सो गये दास्तां कहते-कहते।।”

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गमले में उगे पौधे बरगद से मुकाबला नहीं कर सकते: राघवेंद्र सिंह ‘राजू’ https://sanjayrajput.com/2025/08/abkm-gorakhpur-meeting.html https://sanjayrajput.com/2025/08/abkm-gorakhpur-meeting.html#respond Sun, 24 Aug 2025 15:15:18 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=1186 Read more

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अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा पूर्वांचल प्रांत की गोरखपुर में हुई बैठक में राष्ट्रीय वरिष्ठ महामंत्री राघवेंद्र सिंह ‘राजू’ ने नए प्रदेश अध्यक्ष विनोद कुमार सिंह को दिया मनोनयन पत्र

गोरखपुर। अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा पूर्वांचल प्रांत की महत्वपूर्ण बैठक रविवार को शहर के होटल फाइव सेंसेस में आयोजित हुई। इस अवसर पर राष्ट्रीय वरिष्ठ महामंत्री राघवेंद्र सिंह ‘राजू’ ने विनोद कुमार सिंह को प्रदेश अध्यक्ष का मनोनयन पत्र सौंपा।

पढ़ें…अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा का इतिहास

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बैठक से पहले गोरखपुर आगमन पर संगठन की जिला इकाई के कार्यकर्ताओं ने बाघागाड़ा फोरलेन पर फूल मालाओं से दोनों नेताओं का भव्य स्वागत किया।

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मीडिया से बातचीत में राघवेंद्र सिंह ‘राजू’ ने कहा कि अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा देश का सबसे पुराना संगठन है, जिसकी स्थापना वर्ष 1897 में हुई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि संगठन से बाहर निकाले गए कुछ लोग निजी स्वार्थ में समाज को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उनका यह प्रयास कभी सफल नहीं होगा। उन्होंने कहा, “गमले में उगे पौधे बरगद से मुकाबला नहीं कर सकते।” उन्होंने समाज को अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होने की अपील भी की।

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राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुनील सिंह ने कहा कि क्षत्रिय समाज ने हमेशा देश व समाज के लिए बलिदान दिया है, लेकिन आज सरकार से लेकर समाज के कई वर्गों तक क्षत्रियों के विरोध में खड़े हैं। गोरखपुर मंडल अध्यक्ष रविंद्र सिंह राजपूत ने कहा कि क्षत्रिय समाज मान-सम्मान के साथ जीता और मरता आया है, और यही हमारी सबसे बड़ी पहचान है।

बैठक को राष्ट्रीय सचिव ओंकार नाथ सिंह, देवरिया जिलाध्यक्ष राजेश सिंह श्रीनेत सहित कई अन्य पदाधिकारियों ने भी संबोधित किया।

इस अवसर पर मुख्य रूप से राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुनील सिंह, प्रदेश वीरांगना प्रकोष्ठ अध्यक्ष सीमा सिंह, प्रदेश संगठन मंत्री अरुण कुमार सिंह, व्यापार प्रकोष्ठ अध्यक्ष दीपक सिंह, संगठन मंत्री प्रवीण सिंह, जिला उपाध्यक्ष राघवेंद्र प्रताप सिंह, युवा प्रकोष्ठ मंत्री सुमित सिंह श्रीनेत, युवा नेता आर्यन शाही, सावन शाही व सूरज सिंह सेंगर समेत गोरखपुर, देवरिया, बलिया, बस्ती, आजमगढ़ और महाराजगंज से आए सैकड़ों क्षत्रिय समाज के लोग उपस्थित रहे।

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अभाक्ष महासभा की युवा इकाई में सात्विक मंडल उपाध्यक्ष, शशांक जिला उपाध्यक्ष, आर्यन सचिव तथा धीरज संगठन मंत्री मनोनीत https://sanjayrajput.com/2025/04/abkm-gorakhpur-news.html https://sanjayrajput.com/2025/04/abkm-gorakhpur-news.html#respond Sun, 13 Apr 2025 16:30:24 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=1097 Read more

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गोरखपुर। अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा संगठन विस्तार अभियान के तहत रविवार को गोरखपुर शहर के छात्र नेता सात्विक सिंह ‘श्रीनेत’ को गोरखपुर मंडल उपाध्यक्ष युवा मनोनीत किया गया। साथ ही शशांक शेखर सिंह को जिला उपाध्यक्ष युवा प्रकोष्ठ, आर्यन शाही को सचिव युवा प्रकोष्ठ तथा धीरज सिंह को संगठन मंत्री युवा प्रकोष्ठ मनोनीत किया गया।

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इस अवसर पर प्रदेश सदस्यता प्रभारी एवं गोरखपुर जिलाध्यक्ष अश्वनी कुमार सिंह लालू ने कहा कि हमें आशा है कि इन युवाओं के संगठन में जुड़ने से संगठन की युवा इकाई और अधिक मजबूत होगी तथा आने वाले दिनों में ज्यादा से ज्यादा युवा संगठन से जुड़ेंगे। उन्होंने ये भी कहा कि सभी युवा नशे से दूर रहें तथा दूसरे युवाओं को भी नशे की लत से दूर रहने के लिए प्रेरित करें।

इस दौरान प्रदेश अध्यक्ष पूर्वांचल प्रांत उग्रसेन सिंह, प्रदेश सदस्यता प्रभारी एवं गोरखपुर जिलाध्यक्ष अश्वनी कुमार सिंह लालू, मंडल अध्यक्ष आरपी सिंह, राजकुमार सिंह वरिष्ठ जिला महामंत्री, डॉ उमेश सिंह श्रीनेत अध्यक्ष बौद्धिक प्रकोष्ठ, वेद प्रकाश सिंह जिला मंत्री, सुमित सिंह श्रीनेत जिला मंत्री युवा प्रकोष्ठ, बाल्मीकि सिंह मंडल संगठन मंत्री, शशांक शेखर सिंह जिला उपाध्यक्ष युवा प्रकोष्ठ, आरडी सिंह, अनूप सिंह सहित दर्जनों लोग उपस्थित रहे।

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वीर शिरोमणि राणा सांगा के सम्मान में गोरखपुर की सड़कों पर उतरे क्षत्रिय समाज के लोग https://sanjayrajput.com/2025/04/people-of-kshatriya-community-came-out-on-the-streets-of-gorakhpur-in-honour-of-veer-shiromani-rana-sanga.html https://sanjayrajput.com/2025/04/people-of-kshatriya-community-came-out-on-the-streets-of-gorakhpur-in-honour-of-veer-shiromani-rana-sanga.html#respond Fri, 04 Apr 2025 12:57:19 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=1093 Read more

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सभी जाति धर्म के देवी देवताओं और महापुरुषों पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वालों को सजा हेतु बने कठोर कानून- अश्वनी कुमार सिंह लालू

गोरखपुर। अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा, करणी सेना भारत तथा श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना ने संयुक्त रूप से पिछले दिनों सपा के राज्यसभा सांसद रामजीलाल सुमन के द्वारा वीर शिरोमणि महाराणा सांगा को गद्दार कहने तथा सभी हिंदुओं को गद्दार की औलाद कहने पर आक्रोशित होते हुए शुक्रवार को गोरखपुर के इंदिरा बाल विहार पर रामजीलाल सुमन का पुतला फूंका तथा जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा।
इस दौरान प्रदेश अध्यक्ष पूर्वांचल प्रांत उग्रसेन सिंह, प्रदेश सदस्यता प्रभारी एवं गोरखपुर जिलाध्यक्ष अश्वनी कुमार सिंह लालू, रंजीत शाही प्रदेश अध्यक्ष खेलकूद प्रकोष्ठ, राजकुमार सिंह वरिष्ठ महामंत्री, संजय सिंह जिला उपाध्यक्ष देवरिया, अमरजीत सिंह बांसगांव, अमरेश सिंह बांसगांव, कृष्णेश शाही, पुरंदर शाही, करणी सेना भारत के जिलाध्यक्ष राणा प्रताप सिंह, श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना के जिलाध्यक्ष राणा देवेंद्र सिंह, लक्ष्मीकांत सिंह परमार, हरि नारायण सिंह गोला सिंह, भाजपा नेता विनय सिंह जेआरएफ, वरिष्ठ उपाध्यक्ष विनय चंद, अनुज सिंह कटका मंडल अध्यक्ष युवा, अनिल सिंह राठौर, चंदन सिंह सहित हजारों लोग शामिल हुए।

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सपा सांसद द्वारा राणा सांगा पर अपमानजनक टिप्पणी के विरोध में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा ने दिया ज्ञापन https://sanjayrajput.com/2025/03/akhil-bharatiya-kshatriya-mahasabha-submitted-a-memorandum-in-protest-against-the-derogatory-remarks-made-by-sp-mp-on-rana-sanga.html https://sanjayrajput.com/2025/03/akhil-bharatiya-kshatriya-mahasabha-submitted-a-memorandum-in-protest-against-the-derogatory-remarks-made-by-sp-mp-on-rana-sanga.html#respond Tue, 25 Mar 2025 09:29:12 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=1088 Read more

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गोरखपुर। सपा के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन द्वारा राणा सांगा के प्रति अपमानजनक टिप्पणी पर संसदीय गरिमा को क्षति एवं न्यायोचित कार्रवाई की मांग का राष्ट्रपति को लिखित पत्रक मंगलवार को अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के प्रदेश अध्यक्ष उग्रसेन सिंह पूर्वांचल प्रांत उत्तर प्रदेश एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुनील सिंह के नेतृत्व में जिलाधिकारी गोरखपुर को दिया गया।

इस दौरान खेलकूद प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष रंजीत शाही, प्रदेश संरक्षक कैलाश सिंह, प्रदेश उपाध्यक्ष राजकुमार सिंह, प्रदेश उपाध्यक्ष कामेश्वर सिंह, प्रदेश सचिव अरविंद सिंह मंटू, मंडल अध्यक्ष रविंद्र प्रताप सिंह, मंडल उपाध्यक्ष ज्ञानेंद्र सिंह राजू, मंडल वरिष्ठ महामंत्री आलोक सिंह बिसेन, शिक्षा प्रकोष्ठ के मंडल अध्यक्ष भगवान सिंह, गोरखपुर जनपद के वरिष्ठ उपाध्यक्ष विनय चंद, जिला संरक्षक चंद्र प्रकाश सिंह, गोरखपुर जनपद के अध्यक्ष अर्जुन शाही, अजय सिंह अध्यक्ष सैनिक प्रकोष्ठ, जिला मंत्री युवा सुमित सिंह, रामबाबू, अमित कुमार, मंडल विधि प्रकोष्ठ के अध्यक्ष एडवोकेट मुकेश सिंह, मंडल संगठन मंत्री वाल्मीकि सिंह, धर्मेंद्र प्रताप चंद, ओमप्रकाश सिंह सहित संगठन के दर्जनों लोग उपस्थित रहे।

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अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा द्वारा राष्ट्रीय अध्यक्ष के पुत्र के आकस्मिक निधन पर शोक सभा https://sanjayrajput.com/2025/03/condolence-meeting-organized-by-akhil-bharatiya-kshatriya-mahasabha-on-the-sudden-demise-of-the-son-of-the-national-president.html https://sanjayrajput.com/2025/03/condolence-meeting-organized-by-akhil-bharatiya-kshatriya-mahasabha-on-the-sudden-demise-of-the-son-of-the-national-president.html#respond Thu, 20 Mar 2025 10:52:35 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=1071 Read more

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कुंवर हरिवंश सिंह के द्वितीय पुत्र का अचानक हृदयगति रुकने से हो गया था निधन

अखिल भारती क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्व सांसद कुंवर हरिवंश सिंह के द्वितीय पुत्र दुर्गेश सिंह के आकस्मिक निधन पर पूर्वांचल प्रांत उत्तर प्रदेश की तरफ से एक शोक सभा का आयोजन गुरुवार को माधव लान तारामंडल, गोरखपुर में किया गया।

इस शोकसभा में मुख्य रूप से राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुनील सिंह, प्रदेश अध्यक्ष उग्रसेन सिंह, प्रदेश कोषाध्यक्ष सुभाष सिंह, प्रदेश अध्यक्ष खेलकूद प्रकोष्ठ रंजीत शाही, प्रदेश सचिव संतोष चंद, प्रदेश संगठन मंत्री पूर्वांचल प्रांत अरुण कुमार सिंह, मंडल उपाध्यक्ष ज्ञानेंद्र सिंह राजू, मंडल अध्यक्ष यूथ अनुज सिंह, जिला अध्यक्ष लालू सिंह, वरिष्ठ जिला मंत्री राजकुमार सिंह, वरिष्ठ उपाध्यक्ष विनय चंद, वरिष्ठ उपाध्यक्ष राघवेंद्र सिंह, जिला उपाध्यक्ष अर्जुन शाही, मंडल अध्यक्ष सैनिक प्रकोष्ठ अजय सिंह, नगर अध्यक्ष अभिषेक सिंह सहित संगठन के दर्जनों लोगों ने उपस्थित होकर स्व. दुर्गेश सिंह की आत्मा की शांति के लिए 2 मिनट मौन रखकर एवं उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

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क्षत्रिय कैसे एक बार फिर खुद को स्थापित कर सकते हैं? https://sanjayrajput.com/2025/03/how-can-the-kshatriyas-establish-themselves-once-again.html https://sanjayrajput.com/2025/03/how-can-the-kshatriyas-establish-themselves-once-again.html#respond Tue, 18 Mar 2025 09:22:10 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=1066 Read more

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यूपी के राजपूत बाहुबलियों ने अपने लिए बहुत कुछ हासिल किया और समुदाय के अन्य व्यक्तियों की भी मदद की, जैसे सूर्यदेव सिंह ने कई ठाकुरों को करोड़पति बनाया, या बृजभूषण सिंह की कॉलेजों और अन्य व्यवसायों की श्रृंखला ने हजारों राजपूत युवाओं को रोजगार प्रदान किया, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन अमीर बाहुबलियों को सामूहिक सामुदायिक हितों की भी परवाह है? 

जब बॉलीवुड बलात्कारी, अत्याचारी ठाकुर कथा का निर्माण कर रहा था, तब उन्होंने क्या किया?

या शिक्षा जगत में लॉबी ने सामंतवाद का शोषण कथा का निर्माण किया?

खैर, उन्होंने कुछ नहीं किया।

सामुदायिक चेतना वाला कोई भी नेता हाथरस की घटना के बाद बलात्कारी ठाकुर कथा चलाने वाले सभी पत्रकारों, मीडिया चैनलों और यूट्यूबर्स को अदालत में घसीट लेता। लेकिन क्या उन्होंने ऐसा किया? नहीं। मुद्दा यह है कि, उनमें सामूहिक सामुदायिक चेतना नहीं है।

जहां तक उदारता की बात है, एक सीमा से अधिक उदारता आत्मघाती हो जाती है। उदारता सामरिक होनी चाहिए। आज राजपूत समाज के लिए जमीन और धन त्यागने की बात करते हैं, लेकिन सवाल यह है कि बदले में हमें क्या मिला? हमारे पैसे से हमारी जमीन पर बने विश्वविद्यालयों का इस्तेमाल सामंतवाद की कहानी गढ़ने के लिए किया गया और हमें खलनायक के रूप में पेश किया गया। आज उन्हीं विश्वविद्यालयों का इस्तेमाल हमारे पूर्वजों की पहचान को विकृत करके दूसरों में बांटने के लिए किया जा रहा है। हमें उस ‘उदारता’ से क्या मिला? वह उदारता त्याग नहीं बल्कि आत्महत्या थी।

मैं संस्थानों के निर्माण के पक्ष में हूं, लेकिन हमें नियंत्रण पूरी तरह अपने हाथों में रखना चाहिए। और यहां ‘हम’ का मतलब राजपूतों से है, हिंदुओं से नहीं। अपने खुद के ट्रस्ट बनाएं, उन्हें चलाने के लिए अपने लोगों को रखें।

समाधान ये हैं:

✔गोत्रवाद और क्षेत्रवाद और वंश संघर्ष को रोकने के लिए हमें अपने समुदाय को एक अलग संप्रदाय के साथ केंद्रीकृत करने की आवश्यकता है जो गुजरात से जम्मू और छत्तीसगढ़ तक के सभी राजपूतों को एक समान धार्मिक/संप्रदाय पहचान के तहत लाएगा। हमारे अपने मंदिर, अपने पुजारी, अपना साहित्य।

✔सरकारी नियंत्रण से अपने मंदिरों, किलों आदि को वापस पाने के लिए राजनीतिक और कानूनी लड़ाई। छोटे यूरोपीय देश हर साल पर्यटन से सैकड़ों अरब डॉलर कमा रहे हैं। कल्पना कीजिए कि अगर राजपूतों को हमारे सभी ऐतिहासिक स्मारकों का स्वामित्व वापस मिल जाए। गुजरात से जम्मू और छत्तीसगढ़ तक एक विश्व स्तरीय पर्यटन सर्किट का विस्तार, हमारे समुदाय के लोगों द्वारा कड़ाई से नियंत्रित, लाखों नौकरियां पैदा करना और आने वाले दशकों में भारतीय अर्थव्यवस्था के उछाल के साथ सैकड़ों अरब डॉलर का वार्षिक राजस्व पैदा करना। यह हमें एक आम सरकारी बाबू नौकरी की दौड़ से कहीं ज़्यादा फ़ायदा पहुँचाएगा।

✔ चूंकि राजपूत सबसे बड़े भूस्वामियों में से एक हैं, इसलिए कृषि का आधुनिकीकरण हमें सबसे अधिक मदद करेगा और कृषि व्यवसाय के एक बड़े हिस्से को नियंत्रित करने का अवसर प्रदान करेगा।

अपने लोगों को व्यवसाय के अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ाने के लिए अतिरिक्त संसाधनों का उपयोग करें।

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अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा का इतिहास I Akhil Bharatiya Kshatriya Mahasabha History https://sanjayrajput.com/2025/02/akhil-bharatiya-kshatriya-mahasabha-history.html https://sanjayrajput.com/2025/02/akhil-bharatiya-kshatriya-mahasabha-history.html#respond Thu, 13 Feb 2025 15:20:55 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=1013 Read more

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Akhil Bharatiya Kshatriya Mahasabha History: अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा भारत का सबसे पुराना क्षत्रिय संगठन है। अंग्रेजों के समय में ही इसकी शुरुआत हुई और तमाम राजा महाराजाओं ने इस संगठन के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया। हालांकि आगे चलकर इसी संगठन से टूटकर तमाम नए संगठन भी बने और कुछ ने मिलते जुलते नाम भी रख लिए लेकिन अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा भारत में आज भी क्षत्रियों का सबसे बड़ा संगठन है। तो आइए आज जानते हैं अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा का इतिहास। (Akhil Bharatiya Kshatriya Mahasabha History)

Akhil Bharatiya Kshatriya Mahasabha History

बिहार के राजा खड़ग बहादुर मल्ल मझौली और ठाकुर रामदीन सिंह ठिकानेदार (विलासप्रेस बांकीपुर) ने तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत के 1860 के सोसाइटी  रजिस्ट्रेशन कानून की कुनीति को भांपते हुए 1862 में गठित अपंजीकृत क्षत्रिय हितकारिणी सभा ही 19 October 1897 में क्षत्रिय महासभा के रूप में पंजीकृत हुई। पुन: क्षत्रिय महासभा को भंग करके 1986 में अखिल भारतीय महासभा का गठन हुआ। परन्तु 113/147 सालों का समाज के श्रेष्ठ संगठनिक पुरुषों के पुरुषार्थ का संकलन पुस्तक के रूप में उपलब्ध नहीं है।

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1857 के स्वतंत्रता के इतिहास का अहम् योगदान था क्षत्रिय सभा के निर्माण में। अंग्रेजी शासन काल में, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अंग्रेजों द्वारा क्षत्रियों के विरुद्ध अपनाई गई कलुषित नीति के विरुद्ध विदेशी दासता से मुक्ति पाने के लिए एक खुली अघोषित क्रांति थी जिसका प्रमुख केंद्र बिंदु उत्तर भारत था। शुरुआत में इसके सूत्रपात्र के दो मुख्य श्रोत “सैनिक क्रांति” और “जन क्रांति” थे। इसके सूत्रपात्र का जिम्मा शुरुआती दौर में उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, दिल्ली, पंजाब (वर्तमान हरियाणा) तथा आँध्रप्रदेश के उत्पीड़ित क्षत्रिय शासकों ने उठाया था।

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संयुक्त प्रान्त, आगरा एवं अवध में, बनारस के राजा चेत सिंह की फांसी, रुहेलखण्ड के क्षत्रिय सरदारों के प्रति ईस्ट इंडिया कंपनी की उपेक्षा पूर्ण नीति और दिल्ली के अंतिम मुगल शासक बहादुरशाह जफ़र के दो बेटों को दिल्ली में बीच मार्ग पर खड़ा करके गोली मारने की घटना ने आग में घी डालने का काम किया। साथ ही क्षत्रिय राजाओं को गोद लेने की प्रथा को समाप्त करने की लार्ड डलहौजी की घोषणा ने भी भीषण जनक्रांति को जन्म दिया ।

विकिपीडिया के अनुसार 1857 के विद्रोह के बाद कई तालुकदारों और राजपूत एस्टेट धारकों की स्थिति, जिन्होंने क्रांतिकारियों का समर्थन किया या उनके साथ भाग लिया, समझौता कर लिया गया। अंग्रेजों ने उनकी कई जमीनों और संपत्तियों को जब्त कर लिया और उन पर भारी जुर्माना लगाया गया।

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कालाकांकर के प्रमुख राजा हनुमंत सिंह ऐसे ही एक तालुकदार थे, जिन्हें 1857 के विद्रोह का समर्थन करने के लिए उनकी कई संपत्तियों से बेदखल कर दिया गया था। राजा हनुमंत सिंह ने महसूस किया कि उनके समुदाय द्वारा सामना किए जा रहे अन्याय और आवाज को उठाने के लिए एक अखिल भारतीय संगठन आवश्यक था। उन्होंने अवध के अन्य तालुकदारों के साथ मिलकर वर्ष 1857 में राम दल नामक संगठन की स्थापना की। 1860 में इसका नाम बदलकर क्षत्रिय हितकारिणी सभा कर दिया गया । इस प्रकार राजपूत समुदायों के अधिकारों और हितों की रक्षा और उनके लिए लड़ने के लिए एक संगठन का गठन किया गया था।

क्षत्रिय महासभा क्षत्रिय हितकारिणी सभा का उत्तराधिकारी है, जिसका नाम कोटला के ठाकुर उमराव सिंह, कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह और भिंगा के राजा उदय प्रताप सिंह के साथ अवागढ़ के राजा बलवंत सिंह के नेतृत्व में 1897 में क्षत्रिय महासभा रखा गया था। अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा 19 अक्टूबर 1897 को अस्तित्व में आई, जिसने क्षत्रियों और राजपूतों के हितों को बढ़ावा देने के लिए एक मंच तैयार किया।

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1898 में ‘राजपूत मासिक’ नामक एक समाचार पत्र शुरू किया गया। एसोसिएशन का पहला सम्मेलन आगरा के राजपूत बोर्डिंग हाउस में हुआ था। जम्मू और कश्मीर के महाराजा सर प्रताप सिंह ने लाहौर से पाक्षिक के रूप में राजपूत गजट नामक एक उर्दू प्रकाशन शुरू करने का प्रायोजन किया।

उस समय रियासतों के शासकों और बड़े ज़मींदारों का बोलबाला था और उन्होंने शिक्षा के लिए और क्षत्रिय समुदाय के छात्रों को प्राथमिकता देने के लिए अपने क्षेत्रों में विभिन्न स्कूल और कॉलेज शुरू किए।

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हालाँकि, आज़ादी के बाद, उच्च क्षत्रिय जाति और उसके प्रभावशाली सदस्यों के लिए स्थिति नाटकीय रूप से बदल गई। 1947 में भारत की आज़ादी के तुरंत बाद रियासतों को भारत संघ में मिला दिया गया और बाद में ज़मींदारी को भी समाप्त कर दिया गया और संघ दिशाहीन हो गया। हालाँकि, बिहार के एक प्रमुख राजपूत राजनेता बाबू राम नारायण की अध्यक्षता में, वर्ष 1955 में उज्जैन में बैठक हुई और संघ को पुनर्जीवित किया गया।

अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा की स्थापना के बाद से अब तक निम्न उल्लेखनीय व्यक्ति इस संगठन का नेतृत्व कर चुके हैं :-

  1. अवागढ़ के राजा बलवंत सिंह – 1897
  2. महाराजा रामपाल सिंह (कालाकांकर)- 1899
  3. महाराजा प्रताप सिंह (जम्मू कश्मीर)- 1902 & 1913
  4. ले. कर्नल प्रताप सिंह (इदर)- 1903
  5. बीकानेर के जनरल महाराजा सर गंगा सिंह – 1904
  6. राजा कौशल किशोर सिंह (मझौली)- 1906
  7. राजा प्रताप बहादुर सिंह (प्रतापगढ़)- 1907
  8. सैलाना के महाराजा सर जसवन्त सिंह – 1911
  9. सैलाना के महाराजा ढालीप सिंह – 1920
  10. महाराजाधिराज सर नाहर सिंह जी (शाहापुरा)- 1922
  11. राव साहब गोपाल सिंह खरवा, अजमेर – 1924
  12. महाराजा सवाई सिंह जी (अलवर)- 1925
  13. महाराजा साहब सज्जन सिंह (रतलाम)- 1929
  14. सैलाना के महाराजा ढालीप सिंह – 1930
  15. महाराजा राम सिंह (ओरछा)- 1933
  16. कुंवर साहब सर विजय प्रताप सिंह (बागला)- 1940
  17. महाराजा राम रणविजय प्रताप सिंह बहादुर (डुमरांव)- 1941
  18. महाराजा कुमार विजय आनन्द (मोतिहारी)- 1942
  19. राजा कामाख्या नारायण सिंह (रामगढ़)- 1942 & 1953
  20. पन्ना के महाराजा यादवेन्द्र सिंह जूदेव – 1946
  21. अलवर के महाराजा सवाई तेज सिंह – 1947
  22. ठाकुर साहब कर्नल जोधपुर के मान सिंहजी भाटी – 1948
  23. बाबू राम नारायन सिंह (हजारीबाग)- 1955
  24. महाराजा लक्ष्मण सिंह (डूंगरपुर)- 1960
  25. सिंगरामऊ, जौनपुर के राजा श्रीपाल सिंह – 1986
  26. राजा डॉ. दिग्विजय सिंह (वाँकानेर)- 1997
  27. श्रीपाल सिंह (सिगरामऊ)- 2000
  28. पूर्व सांसद कुंवर हरिवंश सिंह- 2004 से अब तक

अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्व सांसद कुंवर हरिवंश सिंह हैं। 4 सितंबर 1950 को उत्तर प्रदेश के जौनपुर में जन्मे कुँवर हरिवंश सिंह ने गोरखपुर यूनिवर्सिटी से विज्ञान में स्नातक किया है। वे उत्तर प्रदेश की प्रतापगढ़ लोकसभा सीट से सांसद रह चुके हैं। वे 2014 लोकसभा चुनाव में प्रतापगढ़ लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से 16 वीं लोकसभा के लिए निर्वाचित किये गए थे। वे अपना दल के टिकट पर प्रतापगढ़ संसदीय सीट से चुनाव लड़े और विजयी हुए। उन्होंने बसपा के प्रत्याशी आसिफ निजामुद्दीन को 168222 वोटों के अंतर से हराया था। 74 वर्षीय कुंवर हरिवंश सिंह मुंबई के एक बड़े बिजनेसमैन भी हैं।

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वर्तमान में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के सबसे सक्रिय पदाधिकारी राष्ट्रीय वरिष्ठ महामंत्री राघवेंद्र सिंह राजू हैं। इन्होंने अपना पूरा जीवन संगठन को समर्पित कर दिया है। प्रतिदिन भारत के किसी न किसी स्थान पर कार्यक्रम करते हुए राघवेंद्र सिंह राजू देश भर के क्षत्रियों को एकजुट करने के प्रति दृढ़ संकल्पित हैं। वे एक कुशल वक्ता होने के साथ ही क्षत्रियों के हितों के प्रति मुखर भी हैं और क्षत्रिय हित से जुड़े मुद्दों को प्रभावशाली तरीके से जनता और मीडिया के समक्ष रखने में भी सक्षम हैं।

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राघवेंद्र सिंह राजू बताते हैं कि उन्हें जीवन में कई बार बड़े बड़े राजनैतिक दलों से ऑफर मिले लेकिन उनका उद्देश्य छात्र जीवन से ही राजनीति में न जाकर सिर्फ अपने समाज की लड़ाई लड़ने का रहा।

अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा का
पंजीकृत कार्यालय – 202-202
राज अपार्टमेंट 7 जापलिंग रोड (नियर देनिक जागरण चौराहा) लखनऊ, उत्तर प्रदेश

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राजपूत काल से वर्तमान तक: 25% जीडीपी से 3.37% जीडीपी तक की समृद्धि की गिरावट https://sanjayrajput.com/2025/01/rajput-period-to-present-decline-of-prosperity-from-25-gdp-to-3-37-gdp.html https://sanjayrajput.com/2025/01/rajput-period-to-present-decline-of-prosperity-from-25-gdp-to-3-37-gdp.html#respond Tue, 07 Jan 2025 14:17:43 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=971 Read more

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जहां कोई एक गज जमीन नहीं दे सकता, वहां राजपूत समाज का बलिदान और संघर्ष अनमोल हैं। 565 रियासतें, 43 गढ़, 18,700 किले, बल्कि 40 लाख एकड़ जमीन देकर भारत को एक सशक्त राष्ट्र बनाने वाला भी राजपूत ही था।

भारत का इतिहास एक प्रेरणा है, जो हमें हमारे गौरवमयी अतीत और कठिन संघर्षों की याद दिलाता है। राजपूत काल वह स्वर्णिम समय था, जब भारत की आर्थिक, सांस्कृतिक और सैन्य शक्ति पूरी दुनिया में पहचानी जाती थी। लेकिन आज, उस गौरव के कई पहलू धुंधले पड़ गए हैं, और यह बदलाव सिर्फ किसी एक वर्ग या समाज का नहीं, बल्कि हमारे देश की समग्र दिशा का परिणाम है।

राजपूत काल: समृद्धि का युग

जब राजपूतों ने देश के निर्माण में अपना योगदान दिया, तो भारत अपने समय की सबसे समृद्ध अर्थव्यवस्था था। वैश्विक जीडीपी में भारत का योगदान 25% था।

1. आर्थिक समृद्धि – व्यापार और उद्योग तेजी से बढ़े। भारतीय कारीगरी, मसाले, कपास और आभूषण दुनिया भर में प्रसिद्ध थे। भारत सोने और चांदी के भंडार से लैस था।

2. संस्कृति और कला – राजपूत किले, मंदिर, और स्थापत्य कला ने हमारे सांस्कृतिक धरोहर को संजोकर रखा। संगीत, नृत्य, और शिल्पकला के वह अद्वितीय समय आज भी हमारे दिलों में जीवित हैं।

3. सैन्य और शौर्य – राजपूतों के साहस और युद्ध कौशल ने भारत को कई युद्धों में विजय दिलाई। उनकी निष्ठा, साहस और समर्पण ने भारतीय सैन्य इतिहास को गौरवपूर्ण बना दिया।

राजपूत समाज की बदलती छवि

समय के साथ राजपूत समाज के खिलाफ कुछ गलत धारणाएं और नकारात्मक प्रचार फैलने लगे। इन प्रचारों ने समाज को अपनी पहचान छिपाने पर मजबूर कर दिया। पहले जहां समाज की स्थिति मजबूत थी, वहीं आज हमें कई सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

आज का भारत: 3.37% जीडीपी योगदान

आज हम 3.37% की वैश्विक जीडीपी में योगदान दे रहे हैं, जबकि कभी भारत 25% जीडीपी में योगदान करता था। यह बदलाव हमारी दिशा के गलत मोड़ का परिणाम है।

समाज और देश के लिए एक नई शुरुआत की आवश्यकता

अब समय आ गया है कि हम अपने स्वाभिमान, संघर्ष और बलिदान को याद करें और फिर से उन मूल्यों को अपनाएं, जो हमें राजपूतों ने सिखाए। हमें अपने अतीत से प्रेरणा लेकर अपने समाज को फिर से सशक्त बनाना है, ताकि हम एक बार फिर उस समृद्धि, गौरव और सम्मान की ओर लौट सकें।

हम सभी को मिलकर एक नई शुरुआत करनी होगी, एक ऐसी शुरुआत जो हमारे देश और समाज को मजबूत और सशक्त बनाए।

इस पोस्ट का उद्देश्य किसी जाति या समाज के बीच कोई भेदभाव उत्पन्न करना नहीं है। मेरा मकसद केवल यह है कि हम सभी इस सच्चाई को समझें कि अपने स्वार्थ की पूर्ति और राजनीतिक लाभ के लिए राजपूत समाज को अनावश्यक रूप से बदनाम किया गया। वास्तव में, राजपूत वह थे जो अपने राज्य की सही दिशा और अपने लोगों की भलाई के लिए अपनी जान की बाजी लगाने से भी नहीं कतराते थे। वे वही वीर योद्धा थे जिन्होंने अपने राज्य और समाज के लिए शहादत दी, और जो किसी भी परिस्थिति में अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हटते थे।

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अभिषेक सिंह बने अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के गोरखपुर महानगर अध्यक्ष युवा प्रकोष्ठ https://sanjayrajput.com/2024/12/abhishek-singh-became-the-gorakhpur-city-youth-cell-president-of-akhil-bharatiya-kshatriya-mahasabha.html https://sanjayrajput.com/2024/12/abhishek-singh-became-the-gorakhpur-city-youth-cell-president-of-akhil-bharatiya-kshatriya-mahasabha.html#respond Sat, 28 Dec 2024 14:34:39 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=954 Read more

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नशा मुक्ति केंद्र के संचालक दुर्गेश सिंह ‘चंचल’ को मोमेंटो और प्रशस्ति पत्र देकर किया गया सम्मानित

गोरखपुर। अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा की मासिक बैठक शनिवार को नशा मुक्ति केंद्र के संचालक दुर्गेश सिंह ‘चंचल’ के बिलंदपुर स्थित कार्यालय पर आयोजित हुई जिसमें अभिषेक सिंह को महानगर अध्यक्ष (युवा प्रकोष्ठ) मनोनीत किया गया तथा युवाओं को नशे की लत से छुटकारा दिलाने के लिए नशा मुक्ति केंद्र चलाकर समाज हित में अपना उत्कृष्ट योगदान देने हेतु उन्हें प्रशस्ति पत्र तथा मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया।

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बैठक में अपने संबोधन में वक्ताओं ने दुर्गेश सिंह चंचल द्वारा नशा मुक्ति केंद्र के माध्यम से समाज हित में किए जा रहे उत्कृष्ट कार्यों की प्रशंसा की।

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुनील सिंह ने कहा कि अभिषेक सिंह के महानगर अध्यक्ष (युवा प्रकोष्ठ) बनाए जाने से संगठन की युवा टीम गोरखपुर में और अधिक मजबूत होगी।

प्रदेश अध्यक्ष पूर्वांचल प्रांत उग्रसेन सिंह ने कहा कि दुर्गेश सिंह चंचल नशामुक्ति के लिए जो सराहनीय कार्य कर रहे हैं उससे समस्त क्षत्रिय समाज को उन पर गर्व है।

जिलाध्यक्ष लालू सिंह ने कहा कि युवाओं को नशे की लत से छुटकारा दिलाना आज के समय में हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। हमारा युवा जब तक नशे से दूर नहीं होगा हमारे देश की तरक्की संभव नहीं है।

मनोनीत महानगर अध्यक्ष (युवा प्रकोष्ठ) अभिषेक सिंह ने कहा कि संगठन ने उन्हें जो जिम्मेदारी दी है वे उसे निभाने का पूरा प्रयास करेंगे और महानगर में संगठन से अधिक से अधिक युवाओं को जोड़ने की कोशिश करेंगे।

बैठक के दौरान राष्ट्रीय, प्रदेश तथा जिला कार्यकारिणी के दर्जनों पदाधिकारी तथा सदस्यगण उपस्थित रहे।

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शैलेश प्रताप सिंह बने अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा आजमगढ़ के मंडल अध्यक्ष https://sanjayrajput.com/2024/12/shailesh-became-the-divisional-president-of-akhil-bharatiya-kshatriya-mahasabha-azamgarh.html https://sanjayrajput.com/2024/12/shailesh-became-the-divisional-president-of-akhil-bharatiya-kshatriya-mahasabha-azamgarh.html#respond Wed, 25 Dec 2024 10:30:54 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=945 Read more

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आजमगढ़। अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा संगठन विस्तार के क्रम में बुधवार को गोविंदपुर (अतरौलिया) निवासी शैलेश प्रताप सिंह को आजमगढ़ मंडल का अध्यक्ष बनाया गया है।

अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के “खाड़ी से पहाड़ी तक” संगठन विस्तार अभियान के तहत अतरौलिया (आजमगढ़) में बुधवार को प्रदेश अध्यक्ष पूर्वांचल प्रांत उग्रसेन सिंह की अध्यक्षता में एक बैठक संपन्न हुई जिसमें मूल रूप से गोविंदपुर (अतरौलिया) निवासी शैलेश प्रताप सिंह को सर्वसम्मति से आजमगढ़ मंडल का अध्यक्ष मनोनीत किया गया।

बता दें कि शैलेश प्रताप सिंह की पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनैतिक रही है, उनके पिता स्व. लालजी सिंह 8 वर्षों तक अतरौलिया ब्लॉक के ब्लॉक प्रमुख रहे हैं।

इस दौरान मुख्य रूप से प्रदेश अध्यक्ष पूर्वांचल प्रांत उग्रसेन सिंह, प्रदेश सदस्यता प्रभारी अश्वनी कुमार सिंह उर्फ लालू सिंह, प्रदेश अध्यक्ष खेलकूद प्रकोष्ठ रंजीत शाही, गोरखपुर मंडल अध्यक्ष आरपी सिंह, वरिष्ठ महामंत्री राजकुमार सिंह, प्रदेश मीडिया प्रभारी संजय कुमार सिंह, आजमगढ़ जिलाध्यक्ष अजय सिंह, पूर्व प्रधान आशीष सिंह, भूपेंद्र प्रताप सिंह, अखिलेश सिंह, योगेन्द्र सिंह, घनश्याम सिंह, राम नगीना सिंह, संदीप सिंह, राजेश सिंह, आशीष सहित दर्जनों लोग उपस्थित रहे।

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लोनिया समाज द्वारा क्षत्रिय सम्राट पृथ्वीराज चौहान को अपना पूर्वज बताना कितना सही? https://sanjayrajput.com/2024/11/prithviraj-chauhan-history-in-hindi.html https://sanjayrajput.com/2024/11/prithviraj-chauhan-history-in-hindi.html#respond Mon, 04 Nov 2024 13:31:53 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=832 Read more

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Prithviraj Chauhan History: इतिहास में एक बहुत ही पराक्रमी चौहान क्षत्रिय राजा हुए हैं पृथ्वीराज चौहान, जिनके बारे में हम सब भली भांति जानते हैं। विकिपीडिया के अनुसार पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) का जन्म 1166 ईस्वी में अजमेर के राजा सोमेश्वर चौहान और रानी कर्पूरादेवी के घर हुआ था। पिता की मृत्यु के बाद 13 साल की उम्र में ही उन्होंने अजमेर के राजगढ़ की गद्दी संभाल ली। वे एक महान योद्धा थे और उन्होंने मुस्लिम शासक मुहम्मद गौरी को युद्ध में 17 बार हराया था। Prithviraj Chauhan आवाज़ सुनकर लक्ष्य को भेदने में निपुण थे। भारतीय इतिहास के सबसे प्रसिद्ध हिन्दू राजपूत राजाओं में से एक पृथ्वीराज चौहान का राज्य राजस्थान और हरियाणा तक फैला था। 

साहसी और युद्ध कला में निपुण सम्राट पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) बचपन से ही तीर कमान और तलवारबाजी पसंद करते थे। कई पौराणिक लेखनों में इसका वर्णन किया गया है। इनमें सबसे लोकप्रिय कवि चंदबरदाई द्वारा लिखित ‘पृथ्वीराज रासो’ है, जो उन्हें “राजपूत” राजा के रूप में प्रस्तुत करता है। चंदबरदाई पृथ्वीराज के बचपन के मित्र और उनके राजकवि थे और उनकी युद्ध यात्राओं के समय वीर रस की कविताओं से सेना को प्रोत्साहित भी करते थे।

विकिपीडिया के अनुसार चौहान राजवंश के संस्थापक राजा वासुदेव चौहान माने जाते हैं। इतिहासविदों का मत है कि, चौहानवंशीय क्षत्रिय जयपुर के साम्भर तालाब के समीप में, पुष्कर प्रदेश में और आमेर-नगर में निवास करते थे। सद्य वे उत्तर भारत में विस्तृत रूप से फैले हैं। उत्तरप्रदेश राज्य के मैनपुरी, बिजनौर जिले में अथवा नीमराणा राजस्थान में बहुधा निवास करते हैं और नीमराणा से ये उत्तरप्रदेश और उत्तर हरियाणा में फ़ैल गये ।

चौहान वंश (चाहमान वंश) एक भारतीय राजवंश था जिसके शासकों ने वर्तमान राजस्थान, गुजरात एवं इसके समीपवर्ती क्षेत्रों पर ७वीं शताब्दी से लेकर १२वीं शताब्दी तक शासन किया। उनके द्वारा शासित क्षेत्र ‘सपादलक्ष’ कहलाता था। वे चरणमान (चौहान) कबीले के सबसे प्रमुख शासक परिवार थे।

चौहानों ने मूल रूप से शाकंभरी (वर्तमान में सांभर लेक टाउन) में अपनी राजधानी बनाई थी। 10वीं शताब्दी तक, उन्होंने राजपूत प्रतिहार जागीरदारों के रूप में शासन किया। जब त्रिपिट्री संघर्ष के बाद राजपूत प्रतिहार शक्ति में गिरावट आई, तो चमन शासक सिमरजा ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। 12वीं शताब्दी की शुरुआत में, अजयराजा ने राज्य की राजधानी को अजयमेरु (आधुनिक अजमेर) में स्थानांतरित कर दिया। इसी कारण से, चम्मन शासकों को अजमेर के चौहानों के रूप में भी जाना जाता है।

जैसा कि सर्वविदित है कि पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) एक क्षत्रिय सम्राट थे और क्षत्रियों में जो चौहान सरनेम लिखने वाले क्षत्रिय हैं वे वर्तमान समय में अधिकतर हरियाणा, राजस्थान, मैनपुरी, बिजनौर, आगरा, नोएडा, मथुरा, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात आदि स्थानों पर निवास करते हैं।

अब बात करते हैं नोनिया या लोनिया बिरादरी की, जो पूर्वांचल में कुछ जगहों पर निवास करते हैं और ये लोग भी ‘चौहान’ सरनेम लिखते हैं। इन्हें ओबीसी की आरक्षित कैटेगरी में रखा गया है। सरकार द्वारा निर्गत जाति प्रमाण पत्र में इन्हें लोनिया (चौहान) के रूप में अंकित किया जाता है। इन्हें ओबीसी आरक्षण का लाभ मिलता है।

हुआ ये कि लोनिया बिरादरी के लोगों का एक संगठन है अखिल भारतीय चौहान महासभा, जिसके द्वारा दिनांक 3 नवंबर को देवरिया जिले की सदर तहसील क्षेत्र के ग्राम पंचायत सरौरा के चौहान टोला में क्षत्रिय सम्राट पृथ्वीराज चौहान स्मारक का शिलान्यास देवरिया सदर से भाजपा विधायक डॉ. शलभ मणि त्रिपाठी और खजनी के भाजपा विधायक श्रीराम चौहान के द्वारा किए जाने का कार्यक्रम रखा गया।

बता दें कि इस कार्यक्रम के जो पोस्टर बैनर और आमंत्रण पत्र छपे थे उन पर सिर्फ लोनिया बिरादरी के लोगों का ही नाम लिखा हुआ था। क्षत्रिय समाज के किसी भी व्यक्ति को न तो इस कार्यक्रम में बुलाया गया और न ही किसी का कहीं नाम ही दिया गया।

इसी बात को लेकर क्षत्रिय समाज उद्वेलित हो उठा। क्योंकि इस शिलान्यास कार्यक्रम की रूपरेखा से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे पृथ्वीराज चौहान को लोनिया समाज के ये लोग अपना पूर्वज दर्शाते हुए ये कार्यक्रम आयोजित करने जा रहे थे।

इसके बाद क्षत्रिय समाज के लोगों ने देवरिया जिला प्रशासन से अपना विरोध दर्ज कराया जिसके बाद मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने यह शिलान्यास कार्यक्रम निरस्त कर दिया।

देवरिया प्रशासन द्वारा शिलान्यास कार्यक्रम निरस्त करने पर मीडिया में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अखिल भारतीय चौहान महासभा के देवरिया जिलाध्यक्ष जयनारायण चौहान ने कहा कि शासन प्रशासन का हम सम्मान करते हैं इसलिए शिलान्यास कार्यक्रम को स्थगित कर दिए हैं। शिलान्यास चौहान महासभा के लोग अपने दिल में कर लिए हैं। हम इसी स्थान पर मूर्ति का अनावरण करेंगे। उस समय देखते हैं कौन रोकता है। अगर क्षत्रिय समाज के वह वंशज थे तो क्षत्रिय समाज के लोग सिंह के साथ चौहान भी जोड़ें। हमारा समाज पृथ्वीराज चौहान को अपना पूर्वज मानता है।

अखिल भारतीय चौहान महासभा के प्रदेश अध्यक्ष डा. रामनाथ चौहान ने कहा कि क्षत्रिय समाज के द्वारा विरोध किए जाने पर चक्रवर्ती सम्राट पृथ्वीराज चौहान स्मारक का शिलान्यास जिला प्रशासन ने रोक दिया, लेकिन कार्यक्रम स्थल पर जुटे चौहान समाज के सैकड़ों लोगों की उपस्थिति में शेष कार्यक्रम किया गया। कार्यक्रम को अखिल भारतीय चौहान महासभा के दर्जन भर लोगों ने सम्बोधित किया। शिलान्यास कार्यक्रम स्थगित जरूर हुआ है, किन्तु निकट भविष्य में हम चक्रवर्ती सम्राट पृथ्वीराज चौहान स्मारक जरूर बनाएंगे। चक्रवर्ती सम्राट पृथ्वीराज चौहान के जाति को लेकर जो दावा क्षत्रिय समाज कर रहा है वह सही नहीं है। इस सम्बंध में हम जिला प्रशासन के समक्ष अपना पक्ष रखेंगे।

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ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार तो सर्वविदित है कि पृथ्वीराज चौहान एक चौहान क्षत्रिय सम्राट थे लेकिन अब लोनिया समाज के लोग भी उन्हें अपना पूर्वज बताकर दावा कर रहे हैं कि वे उनके समाज के राजा थे। हालांकि उनके दावे का आधार सिर्फ चौहान सरनेम ही प्रतीत होता है। जबकि पृथ्वीराज चौहान के क्षत्रिय कुल का राजा होने के तमाम प्रमाण इतिहास में मौजूद हैं।

एक बड़े क्षत्रिय नेता अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहते हैं- ‘क्षत्रियों ने अपनी रियासतें तक देश की एकता और अखंडता के लिए दान कर दी। सीलिंग एक्ट लगाकर हमारी जमीन जायदाद सब सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया। जातिगत आरक्षण लागू कर हमें समाज में सबसे पीछे धकेलने की साजिश की गई और अब हमारे पूर्वजों और महापुरुषों को अपना बताकर उन्हें भी हथियाने की साजिश की जा रही है।’

वे आगे कहते हैं- ‘जो लोग हमारे महापुरुषों को अपना बता रहे हैं क्या उन्हें अपने पूर्वजों को अपना पूर्वज बताने में शर्म महसूस होती है? हमें अपने पूर्वजों पर गर्व है, उन्हें भी अपने ही पूर्वजों पर गर्व होना चाहिए। लिखने का क्या है आजकल तो कोई भी कुछ भी सरनेम लगा लेता है। सरनेम लगाने और असली होने में बहुत फर्क है।

राष्ट्रवादी क्षत्रिय संघ (भारत) के विशाल सिंह ‘दीपू’ का कहना है-

लोनिया समाज का स्वागत है, वे आएं, बस आरक्षण छोड़ दें। यदि लोनिया समाज खुद को क्षत्रिय सम्राट पृथ्वीराज चौहान का वंशज मानता है तो अखिल भारतीय चौहान महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लिखकर दें कि उनके समाज को आरक्षण का लाभ नहीं चाहिए। यदि वे क्षत्रिय राजा पृथ्वीराज चौहान के वंशज हैं तो उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं लेना चाहिए।”

*Disclaimer:- यह लेख ऐतिहासिक तथ्यों, विकिपीडिया तथा विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों पर आधारित है। यह लेखक के निजी विचार नहीं हैं।

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दूसरे समाज के लोगों द्वारा क्षत्रिय सम्राट पृथ्वीराज चौहान स्मारक का शिलान्यास कराए जाने पर भड़के क्षत्रिय समाज के लोग, कार्यक्रम हुआ निरस्त https://sanjayrajput.com/2024/11/people-of-kshatriya-community-got-angry-when-people-of-other-community-laid-the-foundation-stone-of-kshatriya-emperor-prithviraj-chauhan-memorial-the-program-was-cancelled.html https://sanjayrajput.com/2024/11/people-of-kshatriya-community-got-angry-when-people-of-other-community-laid-the-foundation-stone-of-kshatriya-emperor-prithviraj-chauhan-memorial-the-program-was-cancelled.html#respond Sun, 03 Nov 2024 10:57:13 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=829 Read more

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रविवार 3 नवंबर को देवरिया के सरौरा चौराहा (चौहान टोला) में नोनिया और बेलदार समाज के लोगों द्वारा क्षत्रिय सम्राट पृथ्वीराज चौहान स्मारक का शिलान्यास देवरिया से भाजपा विधायक शलभ मणि त्रिपाठी और खजनी के भाजपा विधायक श्रीराम चौहान के द्वारा किए जाने की सूचना पर क्षत्रिय समाज के लोग उद्वेलित हो गए और देवरिया प्रशासन से अपना विरोध जताया, जिसके बाद मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन द्वारा इस कार्यक्रम को निरस्त कर दिया गया।

राष्ट्रवादी क्षत्रिय संघ (भारत) के अमित सिंह एडवोकेट ने बताया कि, हम लोगों को शनिवार को खबर मिली कि अखिल भारतीय चौहान महासभा के लोगों द्वारा रविवार को देवरिया के सरौरा चौराहा पर क्षत्रिय सम्राट पृथ्वीराज चौहान स्मारक का शिलान्यास कराए जाने का कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम में किसी भी क्षत्रिय समाज के व्यक्ति को न तो आमंत्रित किया गया है और न ही क्षत्रिय समाज के लोगों को इस कार्यक्रम में शामिल किया गया है। इससे साफ प्रतीत होता है कि बेलदार और नोनिया बिरादरी के लोग जो चौहान सरनेम लिखते हैं वे एक साजिश के तहत क्षत्रिय सम्राट पृथ्वीराज चौहान को अपना पूर्वज साबित करना चाहते हैं। इसलिए हमने देवरिया प्रशासन से अपना विरोध दर्ज कराया जिसके पश्चात इस कार्यक्रम को निरस्त कर दिया गया।

राष्ट्रवादी क्षत्रिय संघ (भारत) के विशाल सिंह ने कहा कि, इतिहास में वर्णित है कि पृथ्वीराज चौहान क्षत्रिय जाति के महाराजा थे। इतिहास को गलत बताकर महापुरुष को उनके कुल परंपरा से हटाकर सम्मानित करना उचित नहीं है। क्योंकि वह हमारे महापुरुष थे हम सब उनके वंशज हैं इसलिए समाज के लोगों के साथ मिल जुलकर मूर्ति की स्थापना करना चाहिए, इससे आपसी सौहार्द भाईचारा भी बना रहता। लेकिन इस तरह से शिलान्यास करना गलत है, क्षत्रिय समाज इसकी अनुमति नहीं देता।

शिलान्यास करने वाले नेता जो पढ़ें लिखे व्यक्ति हैं और इतिहास को जानते हैं, उन्हें भी सोचना चाहिए कि हम क्या करने जा रहे हैं, क्या इसका असर अन्य लोगों पर नहीं पड़ेगा।

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अभियंता अमरेश सिंह को अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा ने किया सम्मानित https://sanjayrajput.com/2024/11/er-amresh-singh-honored-by-akhil-bharatiya-kshatriya-mahasabha.html https://sanjayrajput.com/2024/11/er-amresh-singh-honored-by-akhil-bharatiya-kshatriya-mahasabha.html#respond Sat, 02 Nov 2024 07:38:22 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=819 Read more

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बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए डीएम गोंडा द्वारा किया जा चुका है सम्मानित

गोरखपुर। समाज में अपने उत्कृष्ट कार्यों से अलग पहचान बनाने वाले लोगों को सम्मानित करने के क्रम में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा गोरखपुर द्वारा जिलाध्यक्ष लालू सिंह के नेतृत्व में बाढ़ कार्यखंड गोंडा में सहायक अभियंता के तौर पर कार्यरत अमरेश कुमार सिंह को मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया।

बता दें कि बांसगांव के मूल निवासी अमरेश कुमार सिंह विगत 2016 से बाढ़ कार्यखंड गोंडा में बतौर सहायक अभियंता कार्यरत हैं। इस दौरान बाढ़ से बचाव और बांध टूटने से बचाने हेतु उत्कृष्ट कार्य करने के लिए पिछले दिनों उन्हें गोंडा की डीएम नेहा शर्मा द्वारा प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित भी किया गया था।

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इस अवसर पर जिलाध्यक्ष लालू सिंह, मंडल उपाध्यक्ष इंद्रसेन सिंह, वरिष्ठ जिला महामंत्री राजकुमार सिंह, जिलाध्यक्ष बौद्धिक प्रकोष्ठ डॉ. उमेश सिंह सहित अन्य लोग मौजूद रहे।

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Paliwal Rajput History: पालीवाल राजपूतों का इतिहास https://sanjayrajput.com/2024/08/paliwal-rajput-history-in-hindi.html https://sanjayrajput.com/2024/08/paliwal-rajput-history-in-hindi.html#respond Wed, 28 Aug 2024 07:06:27 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=745 Read more

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Paliwal Rajput History in Hindi: भारत देश में क्षत्रियों का सबसे समृद्ध और गौरवशाली इतिहास रहा है। क्षत्रियों ने मातृभूमि की रक्षा हेतु अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। जहां समाज के लोग एक एक इंच जमीन के लिए अपने भाई तक से लड़ रहे हैं वहीं देश की एकता अखंडता के लिए क्षत्रियों ने अपनी रियासतें तक दान कर दी। क्षत्रियों के हर वंश की अपनी एक महान वीरगाथा है, जिसे सिर्फ एक पोस्ट में समेट पाना संभव नहीं है। फिर भी हमारा प्रयास है कि प्रत्येक क्षत्रिय वंश द्वारा देश और मातृभूमि के लिए किए गए उल्लेखनीय योगदान के बारे में अपने पाठकों को जानकारी दें। इसी क्रम में आज हम आप लोगों को पालीवाल राजपूतों (paliwal rajput) के इतिहास के बारे में बताने जा रहे हैं।

पालीवाल वंश की उत्पत्ति और इतिहास

उपनाम पालीवाल का मूल पाली+वाल (पाली का एक व्यक्ति) है। पाली के अधिकांश निवासी पालीवाल कहलाते हैं। पाली राजस्थान में एक जिला है। ऐसा माना जाता है कि पाली से लोग मुगल काल के दौरान विभिन्न स्थानों पर चले गए।

पाली भारत के थार रेगिस्तान में एक छोटा सा राज्य था, 13 वीं शताब्दी में किसी समय, वे तत्कालीन राज्य जैसलमेर में कुलधारा के क्षेत्र में चले गए। उनके मूल की पहचान पालीवाल द्वारा की गई थी।

पालीवालों राजपूतों (paliwal rajput) का समुदाय पूर्वी और पश्चिमी यूपी में चला गया। पूर्वी यूपी के आजमगढ़ अंबेडकर नगर जिलों में, पालीवाल राजपूत गांव 42 कोसी (दूरी की इकाई जैसे कोसी परिक्रमा) के क्षेत्र में फैले हुए हैं। पालीवाल राजपूतों से संबंधित इस क्षेत्र में सैकड़ों गाँव स्थित हैं। अहिरौली रानी मऊ और मकरही रियासत, हंसवर रियासत राजपूतों के अम्बेडकर नगर जिले में स्थित मुख्य गाँव में से एक है। कुछ परिवार उत्तर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में चले गए।

पालीवाल राजपूतों (paliwal rajput) का पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार में राजनीति में एक मजबूत गढ़ है। पालीवाल राजपूत पांडवों के वंशज हैं। पालीवाल राजपूतों का संबंध व्याघ्रपथ गोत्र से है। वे चन्द्रवंश के राजपूत हैं और राजा भरत के पूर्वज होने के नाते कुछ राजपूतों ने खुद को भारतवंशी बताया। पालीवाल राजपूत (paliwal rajput) अपने समय में महान सेनानी थे।

उदयपुर में मेवाड़ के शाही पुस्तकालय (उदयपुर के शाही परिवार से संबंधित एक निजी पुस्तकालय) में रखे पालीवाल के इतिहास (paliwal samaj ka itihaas) के बारे में कुछ ऐतिहासिक ग्रंथ हैं।

पालीवालों की उत्पत्ति से संबंधित दूसरा सिद्धांत

पाली राजस्थान मूल के पालीवाल राजपूत (paliwal rajput) मूल रूप से सोलंकी राजपूत हैं, कुछ का कहना है कि वे पांडवों के वंशज हैं और वे तोमर राजपूत हैं, यूपी में कुछ पालीवाल राजपूत हर अच्छे कार्य से पहले देवी काली माता और हाथी की प्रार्थना करते हैं। वहीं कुछ का मानना है कि पलवल राजपूतों की कुलदेवी पाली और राजस्थान में क्षेमकरी (खिलजी) माता है।

1100 ईसा पूर्व के बाद सोलंकी राजपूतों का राजवंश लुप्त हो गया और भविष्य में वाधेलों ने भी ऐसा ही किया। इस राजपूतों को राजा पाल (सोलंकी राजवंश के अंतिम राजा) के नाम से जाना जाता है। आगे उन्होंने व्याघ्र गोत्र को अपने वंश के रूप में लिखना शुरू किया।

पालीवाल राजपूतों (paliwal rajput) के पूर्वी यूपी के जिला आजमगढ़ के अरूसा गहाजी व अन्य और जिला अंबेडकरनगर जिले के मकरही, हंसवर, विमावल, मसेना मिर्ज़ापुर और उत्तर बिहार में पाँच गाँव हैं। पालीवाल राजपूत इन पाँच गाँवों से संबंधित थे, जो अपने शाही जीवन, बहादुरी और राजनीतिक और सामाजिक शक्ति के लिए जाने जाते थे। पांच गांवों में सासामुसा, रामपुर माधो, दौदा, रामपुर उचकागांव और पहाड़पुर शामिल हैं।

पालीवाल (paliwal rajput) उपनाम का मूल पाली + वाल (पाली का एक व्यक्ति) है. पाली में रहने के कारण ही लोग पालीवाल कहलाए. पालीवाल समुदाय आमतौर पर खेती और मवेशी पालने पर निर्भर रहता था. पालीवाल राजपूत (paliwal rajput) राजस्थान के पाली के अलावा फैजाबाद, गोरखपुर, आजमगढ़, और बिहार के गोपालगंज में भी पाए जाते हैं. उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में भी पालीवाल जाति के लोग रहते हैं.

अयोध्या एवं राम जन्मभूमि हेतु पालीवाल राजाओं का योगदान

राम जन्मभूमि की लड़ाई में दोनों पालीवाल राजपूत (paliwal rajput) रियासतें हंसवर और मकरही का बलिदान भुलाया नहीं जा सकता।

Paliwal Rajput's contribution in ramjanm Bhumi andolan

मकरही (पालीवाल वंश) के राजा संग्राम सिंह द्वारा आक्रमण:

नासिरुद्दीन हैदर के समय में मकरही के राजा के नेतृत्व में जन्मभूमि को पुन: अपने रूप में लाने के लिए हिन्दुओं के 3 आक्रमण हुए जिसमें बड़ी संख्या में हिन्दू मारे गए। इस संग्राम में भीती, हंसवर, मकरही, खजूरहट, दीयरा, अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह आदि सम्मिलित थे। हारती हुई हिन्दू सेना के साथ वीर चिमटाधारी साधुओं की सेना आ मिली और इस युद्ध में शाही सेना को हारना पड़ा और जन्मभूमि पर पुन: हिन्दुओं का कब्जा हो गया। लेकिन कुछ दिनों के बाद विशाल शाही सेना ने पुन: जन्मभूमि पर अधिकार कर लिया और हजारों रामभक्तों का कत्ल कर दिया गया।

पालीवाल राजपूतों की रियासत मकरही हवेली अम्बेडकर नगर उत्तर प्रदेश. ५२ कोस में फैली थी ये रियासत

Makarahi kothi

हंसवर राजा रणविजय सिंह द्वारा तीसरा आक्रमण और उनके वीरगति के पश्चात रानी जयराज कुमारी जी द्वारा आक्रमण:

देवीदीन पाण्डेय की मृत्यु के १५ दिन बाद हंसवर के महाराज रणविजय सिंह ने आक्रमण करने को सोचा। हालाकी रणविजय सिंह की सेना में सिर्फ २५हजार सैनिक थे और युद्ध एकतरफा थामीरबाँकी की सेना बड़ी और शस्त्रो से सुसज्जित थी, इसके बाद भी रणविजय सिंह ने जन्मभूमि रक्षार्थ अपने क्षत्रियोचित धर्म का पालन करते हुए युद्ध को श्रेयस्कर समझा। 10 दिन तक युद्ध चला और महाराज जन्मभूमि के रक्षार्थ वीरगति को प्राप्त हो गए।

माताओं बहनों का जन्मभूमि के रक्षार्थ आक्रमण:

रानी जयराज कुमारी का नारी सेना बना कर जन्मभूमि को मुक्त करने का प्रयास। रानी जयराज कुमारी हंसवरक स्वर्गीय महाराज रणविजय सिंह की पत्नी थ।जन्मभूमि की रक्षा में महाराज के वीरगति प्राप्त करने के बाद महारानी ने उनके कार्य को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया और तीन हजार नारियों की सेना लेकर उन्होंने जन्मभूमि पर हमला बोल दिया.बाबर की आपर सैन्य सेना के सामने ३ हजार नारियों की सेना कुछ नहीं थी अतः उन्होंने गुरिल्ला युद्ध जारी रखा और वो युद्ध रानी जयराज कुमारी ने हुमायूँ के शासनकाल तक जारी रखा जब तक की जन्मभूमि को उन्होंने अपने कब्जे में नहीं ले लिया। रानी के गुरु स्वामी महेश्वरानंदजी ने रामभक्तो को इकठ्ठा करके सेना का प्रबंध करके जयराज कुमारी की सहायता की। चूकी रामजन्म भूमि के लिए संतो और छोटे राजाओं के पास शाही सेना के बराबर संख्याबल की सेना नहीं होती थी अतः स्व्वामी महेश्वरानंद जी ने सन्यासियों की सेना बनायीं। इसमें उन्होंने २४ हजार सन्यासियों को इकठ्ठा किया और रानी जयराज कुमारी के साथ, हुमायूँ के समय १० हमले जन्मभूमि के उद्धार के लिए किये और १०वें हमले में शाही सेना को काफी नुकसान हुआ और जन्मभूमि पर रानी जयराज कुमारी का अधिकार हो गया।

लगभग एक महीने बाद हुमायूँ ने पूर्ण रूप से तैयार शाही सेना फिर भेजी, इस युद्ध में स्वामी महेश्वरानंद और रानी कुमारी जयराज कुमारी लड़ते हुए अपनी बची हुई सेना के साथ मारे गए और जन्मभूमि पर पुनः मुगलों का अधिकार हो गया।

इस युद्ध का वर्णन दरबारे अकबरी कुछ इस प्रकार करता है:

“सुल्ताने हिन्द बादशाह हुमायूँ के वक्त में सन्यासी स्वामी महेश्वरानन्द और रानी जयराज कुमारी दोनों अयोध्या के आस पास के हिंदुओं को इकट्ठा करके लगातार 10 हमले करते रहे । रानी जयराज कुमारी ने तीन हज़ार औरतों की फौज लेकर बाबरी मस्जिद पर जो आखिरी हमला करके कामयाबी हासिल की। इस लड़ाई मे बड़ी खूंखार लड़ाई लड़ती हुई जयराज कुमारी मारी गयी और स्वामी महेश्वरानंद भी अपने सब साथियों के साथ लड़ते लड़ते खेत रहे।

संदर्भ: दरबारे अकबरी पृष्ठ 301

Haswar haweli

पालीवाल जमींदारी रियासत हंसवर अम्बेडकर नगर उत्तर प्रदेश

वंश– चंद्रवंश

कुल – पालीवाल/परिवार/पलीवार

गोत्र – व्याघ्र पद

कुल देवी – मां काली

ईष्ठ देव – नाग & डीह बाबा (हाथी की पूजा)

रियासत का विस्तार – ८४ कोस (मौजूदा अम्बेडकर नगर, फैजाबाद, बस्ती, गोरखपुर, आजमगढ़) तक था।

डिस्क्लेमर: यह लेख ऐतिहासिक पुस्तकों तथा विभिन्न सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर लिखा गया है। यह लेखक के निजी विचार नहीं हैं। यदि आप इस लेख के किसी अंश से असहमत हैं तो हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर बता सकते हैं।

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