पूर्वांचल – SanjayRajput.com https://sanjayrajput.com सच की ताकत Tue, 31 Dec 2024 10:38:17 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.4 https://sanjayrajput.com/wp-content/uploads/2024/07/cropped-91-98392-81815-20231027_230113.jpg पूर्वांचल – SanjayRajput.com https://sanjayrajput.com 32 32 235187837 Shriprakash Shukla का Encounter हुआ था या पकड़कर मारा गया था? https://sanjayrajput.com/2024/12/was-shriprakash-shukla-encountered-or-caught-and-killed.html https://sanjayrajput.com/2024/12/was-shriprakash-shukla-encountered-or-caught-and-killed.html#respond Tue, 31 Dec 2024 10:38:17 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=958 Read more

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Shriprakash Shukla Story: श्री प्रकाश शुक्ला एक समय में उत्तर प्रदेश में खौफ पैदा करने वाला नाम था, एक कुख्यात गैंगस्टर जिसके आपराधिक कारनामों ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। उसका जीवन और मृत्यु सत्ता, राजनीति और अपराध के एक जटिल जाल की कहानी बयां करती है जो लोगों को आज भी रोमांचित करती है। यह लेख शुक्ला की मौत के इर्द-गिर्द विरोधाभासी कहानियों की पड़ताल करता है, जिसमें आधिकारिक पुलिस कथा और हाल के प्रकाशनों में प्रस्तुत एक वैकल्पिक सिद्धांत पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

श्रीप्रकाश शुक्ला का उदय और शासन

श्री प्रकाश शुक्ला गोरखपुर से था, जहां से उसने आपराधिक दुनिया में अपनी यात्रा शुरू की। मोकामा गिरोह के साथ उसके संबंधों ने उसे तेजी से आगे बढ़ने में मदद की। 1990 के दशक के अंत तक, शुक्ला एक प्रसिद्ध व्यक्ति बन गया थे, जो हाई-प्रोफाइल हत्याओं और जबरन वसूली रैकेट में शामिल थे। उसके शिकार वीरेंद्र शाही (Virendra Shahi) और उपेंद्र विक्रम सिंह जैसे उल्लेखनीय व्यक्ति थे, जिन्होंने शक्तिशाली राजनीतिक संबंधों को भी चुनौती देने की उसकी क्षमता को प्रदर्शित किया।

शुक्ला के कार्यों के महत्वपूर्ण राजनीतिक निहितार्थ थे, जिसने क्षेत्रीय सरकार की स्थिरता को प्रभावित किया। जैसे-जैसे उसकी बदनामी बढ़ती गई, अधिकारियों के बीच उसके द्वारा उत्पन्न खतरे को लेकर चिंताएँ भी बढ़ती गईं।

एसटीएफ का गठन और श्रीप्रकाश शुक्ला की तलाश

शुक्ला के बढ़ते खतरे के जवाब में, विशेष कार्य बल (एसटीएफ) की स्थापना की गई। इस इकाई का उद्देश्य शुक्ला को पकड़ना या खत्म करना था। प्रमुख सदस्यों में अरुण कुमार, राजेश पांडे और सत्येंद्र वर सिंह शामिल थे, जिन्होंने ऑपरेशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

एसटीएफ को शुक्ला का पता लगाने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जो लगातार पकड़ से बचता रहा। विभिन्न क्षेत्रों में पैंतरेबाज़ी और संचालन करने की उसकी क्षमता ने उसे एक कठिन लक्ष्य बना दिया।

एनकाउंटर की परस्पर विरोधी कहानियाँ

22 सितंबर, 1998 को, पुलिस ने दावा किया कि गाजियाबाद के इंदिरापुरम में शुक्ला से मुठभेड़ हुई, जिसके कारण उसकी मौत हो गई। आधिकारिक कहानी में एक सावधानीपूर्वक योजनाबद्ध ऑपरेशन का विवरण दिया गया है, जिसमें शुक्ला को घेर लिया गया और एक भयंकर मुठभेड़ के दौरान गोली मार दी गई। पुलिस का कहना है कि एक महत्वपूर्ण खतरे को खत्म करने के लिए यह एक आवश्यक कार्रवाई थी।

हालांकि, खोजी पत्रकार संदीप के. पांडे ने अपनी पुस्तक “वर्चस्व” में एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार, शुक्ला को मारे जाने से पहले जिंदा पकड़ा गया था, जिससे पता चलता है कि पुलिस की कहानी तथ्य से ज्यादा काल्पनिक हो सकती है। यह विवरण उस दिन की सच्ची घटनाओं के बारे में सवाल उठाता है।

राजनीति और शक्तिशाली संबंधों की भूमिका

शुक्ला के प्रभावशाली राजनेताओं से संबंधों के साक्ष्य उसकी कहानी को जटिल बनाते हैं। आरोपों से पता चलता है कि सत्ता में बैठे लोगों द्वारा संभावित कवर-अप सहित उसके लेन-देन में राजनीतिक हस्तक्षेप की भूमिका हो सकती है। शुक्ला केवल एक अपराधी नहीं था; वह अच्छी तरह से जुड़ा हुआ था और रणनीतिक रूप से तैनात था, जिसके कारण घटनाओं का मंचन किया जा सकता था, जहां उसकी मौत एक सीधी मुठभेड़ नहीं थी।

संभावित कवर-अप के कई कारण हैं, क्योंकि उसका जीवित रहना विभिन्न राजनीतिक हस्तियों को जांच के दायरे में ला सकता था। कहा जाता है कि यदि वो जिंदा पकड़ा जाता तो कई मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की पोल खुल सकती थी।

अनुत्तरित प्रश्न और कमजोर कड़ियां

आधिकारिक खातों और गवाहों की गवाही में विसंगतियां शुक्ला की मौत के इर्द-गिर्द एक धुंधली तस्वीर बनाती हैं। शुक्ला की उपस्थिति के शुरुआती फोटोग्राफिक साक्ष्य की कमी और पुलिस रिपोर्ट में विसंगतियों जैसे प्रश्न अभी भी अनसुलझे हैं। स्पष्टता की कमी के कारण जनता को उसके मारे जाने की वास्तविक प्रकृति के बारे में आश्चर्य होता है।

विरासत और स्थायी प्रभाव

श्री प्रकाश शुक्ला का उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों पर प्रभाव था। उसके कार्यों और उसके बाद की मुठभेड़ के निहितार्थ उसके जीवन और मृत्यु से परे हैं। वे संगठित अपराध और न्याय प्रणाली की जटिलताओं के खिलाफ कानून प्रवर्तन के चल रहे संघर्षों को उजागर करते हैं।

शुक्ला की मुठभेड़ के इर्द-गिर्द चल रही बहसें इस बात की याद दिलाती हैं कि समाज में सत्ता, भ्रष्टाचार और अपराध किस तरह से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

श्री प्रकाश शुक्ला की मौत के इर्द-गिर्द की कहानियां भारत के आपराधिक परिदृश्य में संघर्ष और साज़िश की एक व्यापक कहानी को दर्शाती हैं। परस्पर विरोधी खातों और अनसुलझे सवालों के साथ, आगे की जांच की आवश्यकता आवश्यक है। जब हम इस सम्मोहक मामले पर विचार करते हैं, तो हमें सत्ता की गतिशीलता की स्थायी प्रकृति और न्याय की निरंतर खोज की याद आती है।

श्री प्रकाश शुक्ला की कहानी सिर्फ एक गैंगस्टर के बारे में नहीं है; यह इस बात का एक मार्मिक उदाहरण है कि कैसे अपराध और राजनीति सड़कों पर और सड़कों से दूर जीवन और नियति को आकार दे सकते हैं।

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अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा गोरखपुर की समीक्षा बैठक हुई आयोजित, एकजुट होने का लिया गया संकल्प https://sanjayrajput.com/2024/08/abkm-gorakhpur-meeting-held-in-madhav-lawn.html https://sanjayrajput.com/2024/08/abkm-gorakhpur-meeting-held-in-madhav-lawn.html#respond Sun, 11 Aug 2024 11:49:49 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=709 Read more

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क्षत्रिय एक जाति नहीं धर्म है- लालू सिंह

अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा गोरखपुर की समीक्षा बैठक रविवार को माधव लॉन में संपन्न हुई। जिसमें संगठन के विस्तार और आगे की रणनीति पर चर्चा की गई।

संगठन के प्रदेश अध्यक्ष पूर्वांचल प्रांत उग्रसेन सिंह ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि हम अपने समाज के युवाओं का आह्वान करते हैं कि वे आगे आएं और नेतृत्व करें, हम अभिभावक के तौर पर उनके साथ हैं।

बैठक को संबोधित करते हुए संगठन के जिलाध्यक्ष लालू सिंह ने कहा कि क्षत्रिय एक जाति नहीं धर्म है। हम समाज के हर शोषित, पीड़ित और दबे कुचले की मदद को हमेशा तैयार हैं। हमारा संगठन स्वास्थ्य शिविर, वृक्षारोपण, रक्तदान, खेलकूद और रोजगार जैसे सामाजिक कार्यों में भी निरंतर सक्रिय है।

बैठक को प्रदेश उपाध्यक्ष कामेश्वर सिंह, प्रदेश महामंत्री डॉ. महेश्वर सिंह, मंडल अध्यक्ष आरपी सिंह, वरिष्ठ मंडल उपाध्यक्ष नरेंद्र सिंह, जिला संगठन मंत्री प्रवीण सिंह, जिलाध्यक्ष व्यापार प्रकोष्ठ दीपक सिंह, मंडल महामंत्री मानवेंद्र प्रताप सिंह, संगठन मंत्री युवा प्रकोष्ठ सावन शाही, राघवेंद्र प्रताप सिंह, राजकुमार सिंह, नवीन प्रताप सिंह, आलोक सिंह विशेन आदि ने भी संबोधित किया।

इस समीक्षा बैठक में मुख्य रूप से प्रदेश संरक्षक कैलाश सिंह, प्रदेश अध्यक्ष व्यापार प्रकोष्ठ केपी राव, प्रदेश सचिव संजय कुमार सिंह, जिलाध्यक्ष शिक्षा प्रकोष्ठ डॉ. उमेश सिंह, संजीत सिंह, सुनील सिंह, अनिल सिंह राठौर, कमांडो अजीत सिंह, आलोक सिंह, विजेंद्र सिंह, संगम सिंह, सौरभ चंद कौशिक सहित सैकड़ों लोग उपस्थित रहे।

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पं. हरिशंकर तिवारी को लेकर उनके गांव के इस प्रोफेसर ने कह दी ये बात https://sanjayrajput.com/2024/08/harishankar-tiwari-news-in-hindi.html https://sanjayrajput.com/2024/08/harishankar-tiwari-news-in-hindi.html#respond Thu, 08 Aug 2024 14:17:44 +0000 https://sanjayrajput.com/?p=694 Read more

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Harishankar Tiwari News in Hindi: गोरखपुर में पूर्व मंत्री स्वर्गीय पंडित हरिशंकर तिवारी की 88 वीं जयंती पर 5 अगस्त को उनकी प्रतिमा लगाने के लिए बन रहे चबूतरे को प्रशासन ने कुछ दिनों पूर्व बुलडोजर से गिरा दिया था। जिसके बाद यह मुद्दा गरमा गया।

पूर्वांचल के एक बाहुबली नेता और पूर्व मंत्री स्वर्गीय पंडित हरिशंकर तिवारी (Harishankar Tiwari) एक विवादास्पद राजनीतिक व्यक्तित्व रहे हैं। इस लेख में हम इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा करेंगे, जिसमें मूर्ति स्थापना की पृष्ठभूमि, इसके पीछे के सामाजिक संदेश और इससे जुड़े विवाद शामिल हैं।

पंडित हरिशंकर तिवारी (Harishankar Tiwari) का परिचय

पंडित हरिशंकर तिवारी (Harishankar Tiwari) एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने अपने राजनीतिक करियर में अनेक उतार-चढ़ाव देखे। वे चिल्लूपार विधानसभा से सात बार विधायक रहे और उत्तर प्रदेश की सरकार में मंत्री भी रहे। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने बाहुबल और राजनीतिक कूटनीति के माध्यम से अपना साम्राज्य स्थापित किया।

Harishankar Tiwari की पहचान पूर्वांचल के बाहुबलियों में होती थी। उनका नाम अक्सर विवादों में रहा, और उनके कार्यों को लेकर अनेक आरोप भी लगे। उनके नेतृत्व में कई लोगों ने अपने अधिकारों का हनन अनुभव किया, जिससे उनके व्यक्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगते हैं।

गौरतलब है कि देश की राजनीति में एक समय ऐसा था जब इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के खिलाफ जय प्रकाश नारायण (Jai Prakash Narayan) मोर्चा खोले हुए थे. इस दौरान छात्र जेपी के साथ और इंदिरा के खिलाफ विरोध कर रहे थे. लेकिन पूर्वांचल में अलग ही कहानी चल रही थी. पूर्वांचल में माफिया, शक्ति और सत्ता की लड़ाई शुरू हो चुकी थी. यहां के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के छात्र कट्टों और बंदूकों की नाल साफ कर रहे थे.

यही वो वक्त था जब पूर्वांचल की राजनीति में हरिशंकर तिवारी (Harishankar Tiwari) की एंट्री होती है. लंबे समय से मूलभूत सुविधाओं से वंचित इस क्षेत्र के युवाओं की दिलचस्पी किताबों को छोड़ कट्टों और खतरनाक हथियारों में होने लगी.

जेल में रहते हुए हरिशंकर तिवारी (Harishankar Tiwari) चुनाव जीते और साल 1997 से लेकर 2007 तक वे लगातार यूपी में मंत्री बने रहे. वह 22 सालों तक चिल्लूपार सीट से विधायक रहे.

Harishankar Tiwari को केवल 2 बार हार का सामना करना पड़ा. वह पहली बार साल 2007 में और दूसरी बार साल 2012 में चुनाव हारे. भाजपा, सपा, बसपा सभी सरकारों में वे कई मंत्रालयों को संभालते रहे.

मूर्ति स्थापना का मामला

हाल ही में पंडित हरिशंकर तिवारी (Harishankar Tiwari) की मूर्ति उनके पैतृक गांव टांडा में स्थापित की जाने वाली थी। हालांकि, प्रशासन ने इसे नियमों के खिलाफ बताते हुए रोक दिया। इस निर्णय के पीछे 28 वर्ष अमेरिका में रहे उनके गांव के ही निवासी बीएचयू के प्रोफेसर राजा वशिष्ठ त्रिपाठी का विरोध था, जिन्होंने प्रशासन को पत्र लिखकर सार्वजनिक जमीन पर इस मूर्ति स्थापना का विरोध किया था।

देखें वीडियो-

https://www.facebook.com/reel/534133808957769?mibextid=rS40aB7S9Ucbxw6v

प्रोफेसर त्रिपाठी का कहना है कि एक अपराधी की मूर्ति लगाकर समाज में गलत संदेश दिया जा रहा है। उनका मानना है कि इससे युवा पीढ़ी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

प्रशासन की कार्रवाई

प्रशासन ने Harishankar Tiwari की मूर्ति स्थापित करने के लिए बनाए गए चबूतरे को हटाने का निर्णय लिया। यह कार्रवाई प्रोफेसर राजा वशिष्ठ त्रिपाठी की शिकायत के आधार पर की गई। प्रशासन का तर्क था कि यह कार्रवाई नियमों के अनुसार की गई है, और किसी भी प्रकार की अनियमितता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

प्रशासन की इस कार्रवाई ने गांव में राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दिया। कुछ लोग इसे सही मानते हैं, जबकि अन्य इसे राजनीति का एक हिस्सा मानते हैं।

समाज पर मूर्ति के प्रभाव

प्रोफेसर राजा वशिष्ठ त्रिपाठी का कहना है कि मूर्ति स्थापना का मुद्दा केवल एक मूर्ति लगाने का नहीं है, बल्कि यह समाज में अपराध और राजनीति के संबंधों पर भी प्रकाश डालता है। जब समाज में ऐसे व्यक्तियों की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं, तो यह संदेश जाता है कि अपराधियों को सम्मानित किया जा रहा है।

वे आगे कहते हैं कि इससे युवा पीढ़ी को गलत संदेश मिलता है, और वे इसे अपने आदर्श मानने लगते हैं। यह एक गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि इससे समाज में नैतिकता का हनन होता है।

राजनीतिक दृष्टिकोण

राजनीति में हमेशा से ही ऐसे मुद्दों का उपयोग किया जाता रहा है। पंडित हरिशंकर तिवारी (Harishankar Tiwari) की मूर्ति स्थापना का मामला भी राजनीतिक हितों से जुड़ा हुआ है। विभिन्न राजनीतिक दल इस मुद्दे को अपने-अपने तरीके से भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे दलों ने इस मुद्दे को उठाते हुए योगी सरकार पर बदले की भावना से कार्य करने का आरोप लगाया है। यह राजनीतिक खेल समाज में और भी विभाजन पैदा करने का काम कर रहा है।

प्रोफेसर राजा वशिष्ठ त्रिपाठी का दृष्टिकोण

प्रोफेसर वशिष्ठ त्रिपाठी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वे हरिशंकर तिवारी (Harishankar Tiwari) को आदर्श नहीं मानते। उनका मानना है कि हरिशंकर तिवारी का व्यक्तित्व विवादास्पद रहा है, और उन्हें समाज में आदर्श के रूप में स्थापित नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि हरिशंकर तिवारी (Harishankar Tiwari) के खिलाफ उनके पास ठोस प्रमाण हैं, और वे इस बात को साबित करने के लिए तैयार हैं। उनका मानना है कि समाज को ऐसे व्यक्तियों से दूरी बनानी चाहिए।

समाज में नैतिकता का संकट

प्रोफेसर राजा वशिष्ठ त्रिपाठी का कहना है कि यह मामला एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। क्या हम ऐसे व्यक्तियों को सम्मानित करना चाहते हैं, जिनका इतिहास विवादास्पद रहा है? समाज में नैतिकता का संकट बढ़ता जा रहा है। जब समाज में अपराधियों को सम्मान दिया जाता है, तो यह युवा पीढ़ी को गलत दिशा में ले जाता है।

वे आगे कहते हैं कि समाज को यह समझने की आवश्यकता है कि ऐसे व्यक्तियों की मूर्तियां स्थापित करने से हम किस प्रकार का संदेश भेज रहे हैं। यह केवल एक व्यक्ति की पहचान नहीं, बल्कि समाज की पहचान भी है।

निष्कर्ष

गोरखपुर में पंडित हरिशंकर तिवारी की मूर्ति स्थापना का मामला एक गंभीर मुद्दा है, जो समाज में नैतिकता, राजनीति और अपराध के संबंधों को उजागर करता है। प्रशासन की कार्रवाई और प्रोफेसर वशिष्ठ त्रिपाठी का विरोध यह दर्शाता है कि समाज में अभी भी ऐसे लोग हैं, जो सही और गलत के बीच का अंतर समझते हैं।

प्रोफेसर राजा वशिष्ठ त्रिपाठी कहते हैं कि हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि समाज में केवल उन व्यक्तियों को सम्मान दिया जाए, जो वास्तव में आदर्श हैं। इसके लिए हमें जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है, ताकि युवा पीढ़ी सही मार्ग पर चल सके।

*Disclaimer– यह लेख प्रोफेसर वशिष्ठ त्रिपाठी द्वारा एक न्यूज चैनल को दिए गए इंटरव्यू पर आधारित है, ये लेखक के निजी विचार नहीं हैं।

देखिए प्रोफेसर वशिष्ठ त्रिपाठी का एक न्यूज चैनल को दिया गया इंटरव्यू-

https://youtu.be/3C87g1wyBbM?si=qKlG1jjrPVaa-OL8

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गैंग्स ऑफ गोरखपुर https://sanjayrajput.com/2024/07/gangs-of-gorakhpur.html https://sanjayrajput.com/2024/07/gangs-of-gorakhpur.html#respond Wed, 03 Jul 2024 15:43:00 +0000 Read more

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पूर्वांचल क्षेत्र की राजनीति और सामाजिक संरचना में गैंगवार और गुटबाजी की एक लंबी परंपरा रही है। इस क्षेत्र में कई ऐसे डॉन और गैंगस्टर उभरे हैं जिन्होंने अपने दबदबे से राज्य की राजनीति को प्रभावित किया है। इन गैंगस्टर्स के पीछे उनके जाति आधारित संरक्षण और राजनीतिक संबंध रहे हैं। इस लेख में हम पूर्वांचल के इन गैंगस्टर्स और उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।
गोरखपुर: गैंगवार का केंद्र
गोरखपुर जिला पूर्वांचल क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण जिला है। यहां की राजनीति में तीन केंद्र रहे हैं – गोरखनाथ मठ, ब्राह्मण राजनीति का केंद्र ‘हाता’, और क्षत्रिय राजनीति का केंद्र ‘शक्ति सदन’। 
इन तीनों केंद्रों के बीच राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष चलता रहा है। 1970 के दशक में गोरखपुर यूनिवर्सिटी में दो प्रमुख नेता, बलवंत सिंह (ठाकुर) और हरिशंकर तिवारी (ब्राह्मण) के बीच इस संघर्ष ने खूनी रूप ले लिया।
हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र प्रताप शाही
हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र प्रताप शाही के बीच चला यह गैंगवार 1980 के दशक तक चलता रहा। इस दौरान 50 से अधिक लोगों की हत्याएं हो गईं। तिवारी और शाही दोनों ने अपने-अपने जाति समूहों से राजनीतिक और सामाजिक संरक्षण प्राप्त किया। इस संघर्ष में कई नेता और गैंगस्टर उभरे, जिनमें से मुख्तार अंसारी और बृजेश सिंह प्रमुख हैं।
श्रीप्रकाश शुक्ला: उत्तर प्रदेश का सबसे खतरनाक गैंगस्टर
इस संघर्ष के बीच एक और गैंगस्टर का उदय हुआ, जिसने पूरे उत्तर प्रदेश में अपना दबदबा कायम कर लिया। वह था श्री प्रकाश शुक्ला। शुक्ला ने अपनी क्रूरता और हिंसक प्रवृत्ति से पूरे प्रदेश में अपना खौफ फैला दिया। उसने कई नेताओं और बाहुबलियों को मौत के घाट उतार दिया। अंततः 1998 में एक स्पेशल पुलिस टास्क फोर्स (STF) ने उसका सफाया कर दिया।
राजनीतिक संरक्षण और जाति आधारित गुटबाजी
इन गैंगस्टर्स को उनके जाति आधारित संरक्षण और राजनीतिक संबंध मजबूत करते रहे। हरिशंकर तिवारी को कई सरकारों में कैबिनेट मंत्री पद मिलता रहा, जबकि वीरेंद्र शाही और श्री प्रकाश शुक्ला को भी उनकी जाति के नेताओं का समर्थन प्राप्त था। इस प्रकार जाति और राजनीतिक संबंधों ने पूर्वांचल क्षेत्र में गैंगवार और अपराध को बढ़ावा दिया।
मुख्तार अंसारी और बृजेश सिंह: अगले दौर का संघर्ष
वीरेंद्र शाही के बाद पूर्वांचल में ठाकुरों का एक और प्रमुख नेता बृजेश सिंह उभरा। वह और मुख्तार अंसारी के बीच एक नया संघर्ष शुरू हुआ, जो अगले दो दशक से अधिक समय तक चलता रहा। यह संघर्ष भी जाति और राजनीतिक संरक्षण पर ही आधारित था।

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वो दौर जब गोरखपुर था ‘अपराधों की राजधानी’ https://sanjayrajput.com/2020/05/once-upon-time-in-gorakhpur.html https://sanjayrajput.com/2020/05/once-upon-time-in-gorakhpur.html#respond Tue, 26 May 2020 12:26:00 +0000 https://sanjayrajput.com/2020/05/26/%e0%a4%b5%e0%a5%8b-%e0%a4%a6%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a4%ac-%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%96%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a7/ Read more

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योगी आदित्यनाथ का शहर गोरखपुर आज भले ही विकास का रोल मॉडल बनकर सीएम सिटी के रूप में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है मगर 1970 के दशक में जब पूरे देश में जेपी आंदोलन जोरों पर था उन दिनों गोरखपुर सिर्फ जातीय संघर्षों, वर्चस्व की लड़ाई और गैंगवार के लिए ही बदनाम हुआ करता था। 
कई नए माफियाओं के उदय की भूमि होने के चलते गोरखपुर को ‘Crime Capital of North India’ कहा जाने लगा था। यहां की छात्र राजनीति भी दो गुटों में बँटी हुई थी और गोरखपुर यूनिवर्सिटी में ब्राह्मण और क्षत्रिय दो गुट हुआ करते थे। इन दोनों गुटों की आपसी रंजिश और मुठभेड़ से गोरखपुर में रोज अपराध की एक नई कहानी लिखी जाती थी।

उस वक्त जब देश भर के छात्र नेता देश को बदलने के जुनून में सड़कों पर आंदोलन करने में जुटे थे। वहीं गोरखपुर के छात्र नेता देशी तमंचे लहराते हुए अपने वर्चस्व को कायम करने में जुटे हुए थे। उस समय गोरखपुर यूनिवर्सिटी में दो छात्र नेता हुआ करते थे, ठाकुर गुट के रविन्द्र सिंह और ब्राह्मण गुट के हरिशंकर तिवारी। इन दोनों छात्र नेताओं में हमेशा वर्चस्व को लेकर लड़ाई ठनी रहती थी। वो एक ऐसा दौर था जब गोरखपुर यूनिवर्सिटी शिक्षा का केंद्र न होकर ब्राह्मण-ठाकुर जातीय संघर्ष का अखाड़ा बनकर रह गया था।

इन दोनों गुटों में गोरखपुर यूनिवर्सिटी में अपना-अपना वर्चस्व कायम करने हेतु आए दिन असलहे लहराना, मारपीट और बवाल होते रहते थे। इस बीच ठाकुरों के नेता रविन्द्र सिंह को वीरेंद्र प्रताप शाही नाम का एक नया और तेज तर्रार लड़का मिला जो कि उनकी ही जाति से था। 


यह वो दौर था जब जाति को सबसे ज्यादा तवज्जो दी जाती थी। जिले में ब्राह्मण और ठाकुर दोनों गुट अपना-अपना वर्चस्व कायम करने में जुटे रहते थे। और इन दोनों गुटों की आपसी वर्चस्व की लड़ाई ने गोरखपुर का अमन चैन पूरी तरह छीन लिया था। उन दिनों आये दिन गोरखपुर की सड़कों पर मर्डर, फिरौती, रंगबाजी, डकैती का ही तांडव हुआ करता था। 


उन दिनों गोरखपुर के हालात ऐसे हुआ करते थे कि इन दोनों गुटों के लोग दुकान से सामान लेते और दुकानदार द्वारा पैसे मांगने पर गोली मार देते थे। गुंडई का आलम यह था कि यहाँ लोग पेट्रोल भराकर पैसे तक नहीं देते थे और पैसे मांगने पर गोली मार देते थे। ऐसी घटनाएं आम होने लगी थी। फिर इन दोनों गुटों को वर्चस्व के साथ-साथ पैसे की अहमियत भी समझ में आने लगी थी। उसी दौर में रेलवे के स्क्रैप की ठेकेदारी भी मिलने लगी थी और दोनों गुट अब अपने-अपने वर्चस्व का इस्तेमाल करके ठेकेदारी और अन्य कामों में लग गए। 
1980 में हरिशंकर तिवारी ने रेलवे के ठेके में अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी।  हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र शाही दोनों ने अपने-अपने गुट को मजबूत करना शुरू कर दिया था। इन दोनों ने अपने-अपनेे संगठित गैंग भी बना लिए थे। उन्हीं दिनों कई बार ऐसा हुआ जब दोनों माफियाओं के बीच जारी वर्चस्व की जंग में पूरा गोरखपुर शहर थर्रा गया था। 
तब पूर्वांचल में रोज कहीं न कहीं गैंगवार में चली गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई देती रहती थी। आए दिन दोनों गुटों के कुछ लोग मारे जाते थे। साथ ही कई निर्दोष लोग भी मरते थे। इसी दौरान ब्राह्मण-ठाकुर जातीय संघर्ष में लखनऊ और गोरखपुर विवि के छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके युवा विधायक रविंद्र सिंह की भी हत्या हो गई।

बताया जाता हैं कि इस घटना के बाद ठाकुरों के गुट ने वीरेंद्र प्रताप शाही को अपना नेता मान लिया। कुछ ही दिनों में वीरेंद्र शाही की तूती बोलने लगी और उन्हें ‘शेरे-पूर्वांचल’ तक कहा जाने लगा। अब गोरखपुर माफियाराज से पूरी तरह रूबरू हो चुका था और सरकारी सिस्टम यहाँ पूरी तरह फेल हो चुका था। इन दोनों गुटों की गैंगवार के चलते गोरखपुर ही नहीं आसपास के जिलों की कानून-व्यवस्था भी पूरी तरह फेल हो गयी थी।
फिर जब दोनों गुटों ने ठेके आदि से खुद को आर्थिक रूप से सक्षम बना लिया तब पूर्वांचल से निकलकर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इन दोनों गुटों ने अपनी-अपनी एक समानांतर सरकार बना ली। इन लोगों के यहाँ अपनी अपनी बिरादरी के जनता दरबार भी लगने लगे। जमीनी विवाद से लेकर हर तरह के मुद्दे इनके दरबार में आने लगे थे। लोग अपने विवादों के निपटारे के लिए कोर्ट जाने से बेहतर इन माफियाओं के दरबार को समझने लगे थे।


इसी बीच 1985 में गोरखपुर के वीर बहादुर सिंह ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल ली। उनके लिए प्रदेश संभालने से महत्वपूर्ण माफियाओं को संभालना चुनौती थी। हर एक की निगाह वीर बहादुर सिंह पर ही थी। उन्होेंने इसके लिए गैंगेस्टर एक्ट लाया। लेकिन इन लोगों को सामाजिक स्वीकार्यता मिल चुकी थी। राजनीति में भी इनकी बराबर भागीदारी और स्वीकार्यता मिल चुकी थी। जानकार बताते हैं कि इनकी स्वीकार्यता का ही नतीजा है कि पंडित हरिशंकर तिवारी छह बार तो वीरेंद्र प्रताप शाही दो बार विधायक चुने गए। कानून व्यवस्था को दरबारी बनाने के लिए इन पर अंगुलियां उठी तो न जाने कितने इनके दर पर आकर न्याय पाकर दुआ देते हुए लौटे भी। अलग-अलग क्षेत्रों में दबंग छवि वालों को जनता अपना रहनुमा चुनने लगी। पूर्व विधायक अंबिका सिंह, पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी, पूर्व सांसद ओम प्रकाश पासवान, पूर्व सांसद बालेश्वर यादव आदि का उनके क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ने के साथ जनप्रतिनिधि के रूप में लोगों के रहनुमा बन चुके थे।

राजनीति से अपराधियों के गठजोड़ की अपने देश में पुरानी परंपरा है। कहा जाता है किं यदि सौ गुनाह करने के बाद भी कानून की नजरों से बचना हो तो राजनीति का चोला ओढ़ लो। इसी फॉर्मूले को अपनाकर इन दोनों गुटों के माफियाओं ने भी बाद में पैसे के बल पर राजनीति की चादर ओढ़ ली और माफिया से माननीय बन गए। 


फिर 90 के दशक में गोरखपुर के गांव मामखोर के एक शिक्षक का लड़का श्रीप्रकाश शुक्ला सबको पीछे छोड़ते हुए जरायम की दुनिया में तेजी से उभरा। अपनी बहन को छेड़े जाने पर उसने पहली हत्या की और उसके बाद हरिशंकर तिवारी ने उसे बैंकॉक भेजकर उसे पुलिस के हाथों बचाया। अपनी बिरादरी के होने के नाते हरिशंकर तिवारी ने उसे गुनाह की दुनिया में अपने फायदे के लिए एक मोहरे की तरह इस्तेमाल करना शुरू किया। लेकिन महत्वाकांशी श्रीप्रकाश शुक्ला ने गुनाह की दुनिया में तिवारी से बगावत करते हुए AK-47 जैसे असलहों से लैस अपनी अलग गैंग बनाकर पूर्वांचल से बिहार, दिल्ली, ग़ाज़ियाबाद तक अपने खौफ का साम्राज्य फैलाना शुरू कर दिया। अब बिहार के माफिया डॉन और रेलवे के ठेकेदार सूरजभान का भी हाथ श्रीप्रकाश के सिर पर था। 1997 में श्रीप्रकाश शुक्ला ने वीरेंद्र शाही की लखनऊ में गोली मारकर हत्या कर दी। उसका अगला टारगेट माफिया से माननीय बना हरिशंकर तिवारी ही था परन्तु इस बीच उसने सूबे के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को मारने के लिए 6 करोड़ की सुपारी ले ली जिसके बाद यूपी एसटीएफ (STF) ने 1998 में श्रीप्रकाश शुक्ला को लखनऊ में एक एनकाउंटर के दौरान मार गिराया। 

वीरेंद्र शाही की हत्या के बाद छोटे-छोटे गिरोह ने अपनी धमक बनानी शुरू कर दी। कुछ ने जरायम की दुनिया में हनक दिखाने के साथ राजनीति में भी कदम रखा। जो सिलसिला आज भी कायम है। कई आज की तारीख में सत्ता के लाभ वाले पद को भी सुशोभित कर रहे हैं।  
क्योंकि हमारे समाज में गुंडों को पूजने का पुराना रिवाज है इसलिए यहाँ लोग जेल से भी चुनाव लड़कर जीत जाते हैं। जब भी कोई माफिया, बाहुबली पैसों के बल पर जोर-शोर से लाव-लश्कर के साथ चुनाव लड़ता है तो वो बम्पर वोटों से जीत हासिल करता है। वहीं जब कोई साधारण और बेदाग छवि वाला आदमी बिना लाव-लश्कर के चुनाव लड़ता है तो उसकी जमानत तक जब्त हो जा्ती है।


योगी आदित्यनाथ के यूपी का सीएम बनने के बाद पूरे प्रदेश से गुंडाराज खत्म हुआ है और प्रदेश के साथ-साथ गोरखपुर में भी चलने वाले छोटे-बड़े गैंग या तो खत्म हो गए हैं या सभी अपराधी और गुंडे भूमिगत हो गए हैं। पहले जहाँ गोरखपुर में आये दिन सरेआम फिरौती, रंगबाजी और लूटपाट आम बात थी वहीं अब कानून व्यवस्था फिर से कायम हुई है। 

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