निठारी कांड: मौत की सजा से लेकर बरी होने तक, फिर हरिद्वार में सुरेंद्र कोली की मौत

Nithari Kand: देश के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में शामिल निठारी कांड के आरोपी रहे सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में मौत हो गई। 18 सितंबर 2026 को वह भूपतवाला-सप्त सरोवर क्षेत्र में अपनी चाय की दुकान के अंदर मृत पाए गए। पुलिस के अनुसार, उनका शव फंदे से लटका मिला था। मौके से कोई सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ है। पुलिस ने पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर आगे की जांच की बात कही है।

कोली की मौत इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि निठारी मामले में वर्षों तक आरोपी और कई मामलों में मृत्युदंड पाए जाने के बाद आखिरकार वह 13वें और अंतिम मामले में भी सुप्रीम कोर्ट से बरी हो गए थे। 11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी क्यूरेटिव याचिका स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि रद्द कर दी और तत्काल रिहाई का आदेश दिया था।

निठारी कांड ने बदल दी सुरेंद्र कोली की जिंदगी

दिसंबर 2006 में नोएडा के निठारी इलाके में कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर के मकान के आसपास नाले और अन्य स्थानों से मानव अवशेष मिलने के बाद पूरे देश में हड़कंप मच गया था। सुरेंद्र कोली उस मकान में घरेलू सहायक के रूप में काम करता था। मामले की जांच बाद में सीबीआई को सौंपी गई और कोली तथा पंढेर को आरोपी बनाया गया।

मामले की सुनवाई आगे बढ़ने के साथ कोली पर कई हत्याओं समेत गंभीर आरोप लगे। अलग-अलग मामलों में उसे कुल 13 बार मृत्युदंड सुनाया गया। लंबे समय तक वह जेल में रहा और मौत की सजा के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ता रहा।

जेल में सीखा पढ़ना-लिखना, खुद जुटाए केस के दस्तावेज

मीडिया रिपोर्टों और अदालती रिकॉर्ड में सामने आए विवरण के अनुसार, जेल में रहते हुए कोली ने पढ़ना-लिखना सीखा और अपने मामलों से जुड़े कानूनी दस्तावेजों को समझने का प्रयास किया। उसने सूचना के अधिकार यानी आरटीआई के जरिए विभिन्न सरकारी विभागों से रिकॉर्ड और जानकारी हासिल करने की कोशिश की।

बचाव पक्ष की ओर से कई मौकों पर बरामदगी, फोरेंसिक सामग्री, जांच की प्रक्रिया और कथित इकबालिया बयान की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए। बाद की न्यायिक कार्यवाही में भी इन साक्ष्यों को लेकर गंभीर सवाल सामने आए।

फांसी से कुछ घंटे पहले टली थी सजा

कोली की कानूनी लड़ाई का सबसे चर्चित अध्याय सितंबर 2014 में सामने आया। उसकी फांसी की तारीख नजदीक आ चुकी थी और उसे मेरठ जेल ले जाया गया था। इसी दौरान उसके वकीलों ने तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की। देर रात हुई कानूनी कार्रवाई के बाद उसकी फांसी पर रोक लग गई।

बाद में वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने भी कोली के मामले में कानूनी टीम को सहयोग दिया। बचाव पक्ष ने उसके कथित इकबालिया बयान, कानूनी सहायता और जांच में सामने आए साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए।

2014 के बाद मामले ने लिया नया मोड़

अक्टूबर 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने कोली की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद भी उसकी कानूनी लड़ाई जारी रही। 2015 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दया याचिका पर निर्णय में हुई देरी के आधार पर उसकी मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया।

इसके बाद निठारी से जुड़े अन्य मामलों की सुनवाई में अभियोजन की जांच और साक्ष्यों पर सवाल उठते गए। बचाव पक्ष ने बरामदगी की परिस्थितियों, फोरेंसिक साक्ष्यों और कथित इकबालिया बयान की विश्वसनीयता को चुनौती दी।

2023 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 12 मामलों में किया बरी

16 अक्टूबर 2023 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निठारी से जुड़े कई मामलों में सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंढेर को बरी कर दिया। अदालत ने अभियोजन के मामले में गंभीर कमियां पाईं और जांच की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। बाद में इन मामलों में राज्य की अपीलें सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचीं।

इस घटनाक्रम के बाद कोली केवल एक मामले में दोषसिद्धि के कारण जेल में बना रहा। यही वह मामला था जिसमें रिम्पा हलधर की हत्या से संबंधित आरोप में उसकी सजा पहले बरकरार रखी गई थी।

11 नवंबर 2025: सुप्रीम कोर्ट ने खत्म की आखिरी दोषसिद्धि

सुरेंद्र कोली की कानूनी लड़ाई का अंतिम और निर्णायक पड़ाव 11 नवंबर 2025 को आया। सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने क्यूरेटिव याचिका स्वीकार करते हुए उसकी अंतिम दोषसिद्धि भी रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि समान साक्ष्य के आधार पर जुड़े अन्य मामलों में जब दोषसिद्धियां टिक नहीं सकीं, तो उसी साक्ष्य के आधार पर एक मामले में दोषसिद्धि को कायम रखना उचित नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में यह भी कहा गया कि निठारी जैसे गंभीर अपराधों में भी दोषसिद्धि अनुमान या संदेह के आधार पर नहीं हो सकती और अभियोजन को विश्वसनीय एवं स्वीकार्य साक्ष्यों के जरिए अपराध साबित करना होता है। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि मामले में वास्तविक अपराधी की पहचान कानूनी मानकों के अनुरूप स्थापित नहीं हो सकी।

इसके साथ ही अदालत ने कोली को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया, यदि किसी अन्य मामले में उसकी हिरासत आवश्यक न हो।

जेल से निकलने के बाद शुरू की नई जिंदगी

रिहाई के बाद कोली ने हरिद्वार में नया जीवन शुरू करने की कोशिश की। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, वह कुछ समय से हरिद्वार में रह रहा था और आजीविका के लिए छोटे-मोटे काम करने के बाद चाय की दुकान चलाने लगा था। कुछ स्थानीय लोगों के अनुसार उसने अपनी पहचान छिपाकर भी रहने की कोशिश की थी। हालांकि इन परिस्थितियों से जुड़े सभी विवरणों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी जांच का विषय हैं।

चाय की दुकान में मिला शव, जांच जारी

18 सितंबर 2026 को हरिद्वार पुलिस को सूचना मिली कि सप्त सरोवर रोड क्षेत्र में एक चाय की दुकान के अंदर एक व्यक्ति मृत मिला है। मौके पर पहुंची पुलिस ने उसकी पहचान सुरेंद्र कोली के रूप में की। पुलिस के मुताबिक शव फंदे से लटका मिला था और घटनास्थल से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला।

पोस्टमार्टम कराया गया है और पुलिस फॉरेंसिक तथा पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रही है। 20 सितंबर की रिपोर्टों के अनुसार, कोली का अंतिम संस्कार हरिद्वार में किया जा चुका है, जबकि उसकी मौत की परिस्थितियों को लेकर जांच जारी है।

निठारी कांड और मीडिया ट्रायल पर फिर उठे सवाल

निठारी कांड की जांच और मुकदमों के दौरान सुरेंद्र कोली की छवि देशभर में बेहद चर्चित हो गई थी। उस समय टीवी चैनलों और अखबारों में मामले की व्यापक कवरेज हुई। कई रिपोर्टों और कार्यक्रमों में उसे अपराध का मुख्य चेहरा बनाकर प्रस्तुत किया गया।

हालांकि किसी आरोपी की मीडिया में बनी छवि और अदालत में साबित हुआ अपराध—दो अलग-अलग बातें हैं। कोली के मामले में वर्षों बाद आए न्यायिक फैसलों ने जांच और साक्ष्यों से जुड़े गंभीर सवालों को सामने रखा। सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में अंतिम दोषसिद्धि रद्द करते हुए कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में गंभीर अपराधों के बावजूद दोषसिद्धि विश्वसनीय और स्वीकार्य साक्ष्यों पर ही आधारित हो सकती है।

एक लंबी कानूनी लड़ाई का अंत

सुरेंद्र कोली की कहानी करीब दो दशकों तक चली एक लंबी कानूनी प्रक्रिया से जुड़ी रही। निठारी कांड में गिरफ्तारी, कई मामलों में मृत्युदंड, फांसी से ऐन पहले मिली राहत, वर्षों तक चली अपीलें, 2023 में कई मामलों में बरी होना और आखिरकार नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट से अंतिम मामले में भी दोषमुक्ति—इस पूरे घटनाक्रम ने भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में जांच, साक्ष्य, कानूनी सहायता और मीडिया कवरेज की भूमिका पर कई सवाल खड़े किए।

अब हरिद्वार में उसकी मौत के बाद इस मामले का एक और अध्याय जुड़ गया है। पुलिस जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ही उसकी मौत की परिस्थितियों के संबंध में आगे की तस्वीर स्पष्ट होगी।

नोट: इस रिपोर्ट में आत्महत्या की परिस्थितियों का उल्लेख उपलब्ध पुलिस एवं मीडिया रिपोर्टों के आधार पर किया गया है। घटनास्थल से सुसाइड नोट मिलने की पुष्टि नहीं हुई है और मौत की परिस्थितियों की जांच जारी है।

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    लेखक SanjayRajput.com के फाउंडर हैं तथा दो दशक से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत दो दशक पहले प्रिंट मीडिया से की थी और अब डिजिटल पत्रकारिता में भी सक्रिय हैं। राजनीति, टेक्नोलॉजी, क्राइम, स्वास्थ्य और समाज हित से जुड़ीं खबरों पर विशेष फोकस रखते हैं।

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