बदलता समाज-तरक्की या पतन?



क्या आपने कभी सोचा है कि पहले के मुकाबले आज के समय में हमारा सामाजिक और पारिवारिक ढांचा कैसे तेजी से बदलता जा रहा है। या यूं कहें कि बिगड़ता और बिखरता जा रहा है। आज अकेलापन और खालीपन हर व्यक्ति के जीवन में घर कर चुका है।

लोग शिक्षित तो होते जा रहे हैं लेकिन संयुक्त परिवार खत्म हो चले हैं, लोग अकेले रहने लगे हैं, बूढे माँ-बाप को लोग वृद्धाश्रम में डाल रहे हैं। फिर अकेलेपन की देन डिप्रेशन, तनाव, आत्महत्या। भाई-भाई का दुश्मन, जमीन-जायदाद के झगड़े, बंटवारा आदि…

क्या ये तरक्की है? इसे आगे बढ़ना कहते हैं या गर्त में जाना कहते हैं?

नीचे कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं, जिनसे आप पहले और आज के अंतर को आसानी से समझ सकते हैं…
पढ़ें और सोचें कि क्या हमारा समाज वाकई तरक्की कर रहा है??

पहले खाने को सादा दाल रोटी होती थी लेकिन फिर भी किसी को खून की कमी नहीं होती थी। डॉक्टरों के महंगे इलाज की जरूरत नहीं पड़ती थी।

स्कूल मे अध्यापक खूब कान खींचते थे, डंडों से पिटाई होती थी लेकिन कोई बच्चा स्कूल में डिप्रेशन के कारण आत्महत्या नहीं करता था।

बचपन मे महँगे खिलौने नहीं मिलते थे, खेलने के लिए महंगे किट नहीं थे फिर भी हर खेल बहुत आनंदित करता था। बच्चे हर शाम खेलने के बाद पसीने, धूल-मिट्टी और गंदे कपड़े लिए घर जाते और पिटाई भी खूब होती। लेकिन खूब मस्ती करते थे।

घर कच्चे होते थे, कमरे कम होते थे लेकिन माता -पिता कभी वृद्धाश्रम नहीं जाते थे। हर दिन घर में त्योहारों जैसा माहौल होता था।

घर मे गाय की, कुत्ते की, अतिथि की, मेहमानों की रोटियां बनती थी, फिर भी घर का बजट संतुलित रहता था। आज सिर्फ़ अपने परिवार की रोटी महंगी हो गयीं है।

महिलाओं के लिए कोई जिम या कसरत के विशेष साधन नहीं थे, देखभाल और सुविधाएं नहीं थी फिर भी महिलाएं संपूर्ण रूप से स्वस्थ्य रहती थी। 

भाई -भाई मे,भाई-बहनों मे अनेक बार खूब झगड़ा होता था, आपस मे मार-पीट तक होती थी परंतु आपस मे मनमुटाव और बंटवारा कभी नहीं होता था।

परिवार बहुत बडे होते थे, पडोसियों के बच्चे भी दिनभर आकर खेलते थे, फिर भी घरों में ही शादियां होती थी, हॉल या होटल नहीं बुक करना पड़ता था।

माता-पिता थोडी सी बात पर थप्पड़ मार देते थे, लेकिन उनका मान-सम्मान कभी कम नहीं होता था।



अब आप खुद निर्णय करें कि क्या हमारे समाज में तेजी से हो रहे ये बदलाव और पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण हमें आगे ले जा रहा है या बर्बाद कर रहा है?

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