भूमिधरी अधिकार देने के लिए भूमि श्रेणी परिवर्तन केवल राज्य सरकार ही कर सकती है
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि
उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 के तहत उप-विभागीय अधिकारी (SDO) के पास
किसी भी सार्वजनिक उपयोग की भूमि का वर्गीकरण बदलने का अधिकार नहीं है, ताकि उसे भूमिधरी अधिकारों के
अंतर्गत लाया जा सके।
यह फैसला जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने
Babu Singh v. Consolidation Officer and Others मामले में सुनाया।
क्या था मामला?
यह मामला उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले की एक ऐसी भूमि से जुड़ा था, जो राजस्व रिकॉर्ड में
चारागाह और सार्वजनिक उपयोग की भूमि के रूप में दर्ज थी। बाद में इस भूमि को श्रेणी परिवर्तन
के माध्यम से कृषि भूमि मानकर कुछ व्यक्तियों को पट्टे दे दिए गए थे।
समय के साथ जब यह मामला चकबंदी प्रक्रिया में पहुँचा, तो यह सामने आया कि मूल रिकॉर्ड के अनुसार
यह भूमि धारा 132 के अंतर्गत आती है, जिस पर भूमिधरी अधिकार प्रदान नहीं किए जा सकते।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम की समीक्षा करते हुए साफ कहा कि उप-विभागीय अधिकारी द्वारा
किया गया वर्गीकरण परिवर्तन न केवल अधिकार क्षेत्र से बाहर था, बल्कि कानूनन असंभव भी था।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के किसी भी पुनर्वर्गीकरण का अधिकार केवल राज्य सरकार को
धारा 117(6) के तहत प्राप्त है और वह भी निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और सख्त शर्तों के अधीन।
पट्टे घोषित हुए अवैध
न्यायालय ने कहा कि SDO द्वारा किया गया आदेश और उसके आधार पर दिए गए पट्टे शुरू से ही अवैध माने जाएंगे।
साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चारागाह, खलिहान और अन्य सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर
किसी प्रकार का भूमिधरी अधिकार उत्पन्न नहीं हो सकता।
यदि ऐसे मामलों में कोई पट्टा दिया भी गया हो, तो वह केवल सीमित अवधि का आसामी पट्टा माना जाएगा,
जिसकी वैधता पहले ही समाप्त हो चुकी है।