क्या सवर्णों को भी अब सरकार से आरक्षण की मांग नहीं करना चाहिये?

गुजरात का पाटीदार आंदोलन तो आप सबको याद ही होगा। वे अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरे, ट्रेनें रोकी, चक्का जाम किया और सरकार से अपने लिए आरक्षण ले लिया या यूं कहिए की छीन लिया। 

गुजरात में एक बहुत ही मशहूर कहावत है प से पाटेदार और प से पॉवर। गुजरात की सियासत में पाटेदारों की ताकत ये है कि वे जिधर मुड़ते हैं सत्ता का रूख उधर मुड़ जाता है। आबादी में तो ये सिर्फ 15 प्रतिशत हैं। लेकिन 85 प्रतिशत पर भारी पड़ते हैं।

25 अगस्त 2015 को गुजरात के अहमदाबाद में पाटीदार समाज के लोगों का सबसे बड़ा आंदोलन देखने को मिला। इसमें हजारों लोगों ने हिस्सा लिया। आंदोलन के बाद कई जगह हिंसा और तनाव की खबरे भी आई। इसके बाद राज्य के कई शहरों में कर्फ्यू लगाना पड़ा। राज्य में हिंसा और आगजनी की कई घटनाए होने के बाद 28 अगस्त 2015 को स्थिति सामान्य हुई लेकिन 19 सितंबर 2015 को एक बार फिर आंदोलन ने हिंसक रुप ले लिया। इसके बाद सरकार ने जनरल कैटेगिरी के छात्रों के लिए सब्सिडी और स्कॉलरशिप और आर्थिक रुप से कमजोर छात्रों के लिए 10 फीसदी आरक्षण की घोषणा की। हालांकि अगस्त 2016 में गुजरात हाईकोर्ट ने इस आरक्षण पर रोक लगा दी लेकिन पाटीदारों ने जनसंख्या में सिर्फ 15% होने के बावजूद अपनी जो ताकत दिखाई उससे देश के सभी सवर्णों को सबक जरूर लेना चाहिए।

पाटीदार आंदोलन का यहां जिक्र करने का कारण सिर्फ यही है कि यदि आबादी का सिर्फ 15% होने के बावजूद पाटीदार यदि अपने आंदोलन से गुजरात सरकार को झुकने पर मजबूर कर सकते हैं तो देश के अन्य सवर्ण क्यों नहीं?

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क्या अब सवर्णों को भी अपने लिए आरक्षण की मांग को लेकर सड़क पर नहीं उतरना चाहिए? अब तो प्राइवेट नौकरियों में भी आरक्षण की बात शुरू हो गई है। यदि हम सब अब भी मूकदर्शक बने रहे तो हमारी आने वाली पीढ़ियों के हाथ कुछ भी शेष नहीं बचेगा।

सारी नौकरियां सवर्णों के हाथों से निकलती जा रही हैं और सवर्णों का जीवन स्तर दिन प्रतिदिन गिरता ही चला जा रहा है। इसके बावजूद हम सब मूकदर्शक बने हुए हैं।

गलत का विरोध नहीं करना और अपने अधिकारों के लिए न लड़ना कायरता की श्रेणी में आता है और इतिहास गवाह है कि सवर्ण कभी कायर नहीं रहे हैं।

इसलिए बेहतर यही होगा कि हम सब भी एकजुट होकर अपने लिए आरक्षण की मांग करें और नाममात्र के लिए 10% EWS का जो कोटा हमें दिया गया है इसका दायरा भी बढ़ाया जाए।

क्योंकि ये तो अटल सत्य है कि वोट बैंक की गंदी राजनीति के कारण इस देश से जातिगत आरक्षण अब कभी खत्म नहीं हो सकता, तो क्यों न सवर्ण भी अब अपने लिए आरक्षण की मांग करें।

और जो राजनीतिक पार्टी अपने घोषणा पत्र में सवर्णों के लिए आरक्षण देने की बात करे, हम सब एकजुट होकर उसे ही वोट दें। बाकी चाहे कोई भी राजनैतिक दल हो उसका पूरी तरह एकजुट होकर बहिष्कार किया जाए।

यदि अब भी हम सब कायरों की तरह अपनी बर्बादी का तमाशा देखते रहे तो हमारी आने वाली पीढ़ियों का कोई भविष्य नहीं रह जाएगा।

सवर्णों की प्रतिभाएं कुंठित हो रही हैं, जब उन्हें पढ़ाई में अव्वल होने के बावजूद बेरोजगार भटकना पड़ रहा है। जबकि आरक्षण की बैसाखी के सहारे आरक्षित वर्ग के पढ़ाई में फिसड्डी लोग भी सरकारी नौकरियों की मलाई काट रहे हैं और डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, आईपीएस और पीसीएस बन जा रहे हैं।

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जब पढ़ाई में अव्वल कोई सवर्ण छात्र अपने से फिसड्डी आरक्षित वर्ग के सहपाठी को उससे आगे निकलते हुए देखता है तो उसके दिल पर क्या बीतती है इसका अंदाजा हर सवर्ण आसानी से लगा सकता है।

सवर्णों की प्रतिभाएं कुंठित हो रही हैं और कुंठित होकर सवर्णों के बच्चे आए दिन सुसाइड कर रहे हैं। इसके बाद भी हम सब मूकदर्शक बने बैठे हैं।

जातिगत आरक्षण या तो खत्म कर आर्थिक आधार पर किया जाए या सवर्णों को भी आरक्षण दिया जाए, यही हमारी मांग होनी चाहिए।

आरक्षण यदि समाज के अन्य वर्गों का अधिकार है तो हमारा भी है क्योंकि गरीब और जरूरतमंद लोग सवर्णों में भी हैं।

गरीबी जाति देखकर नहीं आती। गरीब समाज के हर वर्ग में हैं क्योंकि अब समाज में जाति और वर्ण आधारित व्यवस्था नहीं है, तो जाति के आधार पर आरक्षण क्यों लागू रहेगा? सिर्फ इसलिए की राजनैतिक दलों के लिए वे एक सॉलिड वोट बैंक हैं?

राजनीतिक पार्टियां सिर्फ अपने राजनैतिक लाभ के लिए सवर्णों को बर्बाद करने और पीछे धकेलने में लगी हैं और सवर्ण शान से ऐसी पार्टियों का झंडा ढो रहे हैं जिन्होंने उनकी आने वाली पीढ़ियों के मुंह से निवाला तक छीन लेने की साजिश रच डाली है।

इसलिए सवर्णों को भी अब जागना होगा और अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरकर संघर्ष करना होगा। अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए हमें अब लाठी गोली खाने से परहेज नहीं करना चाहिए वरना आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।

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