विपक्ष भी मोदी सरकार को युद्ध करने की सलाह क्यों दे रहा है?

2002 में जब भारत ने संसद पर हमले के बाद अपनी फौजें बॉर्डर पर लगाई थीं तब इतने भर से पाकिस्तान घुटनों पर आ गया था. जब छह महीने की फौज की रेड अलर्ट में पाकिस्तान की सांस उखड़ने लगी तब भारत में बैठे उनके हैंडलर्स एक्टिव हो गए थे और इंडिया टुडे और आउटलुक में फ्रंट पेज आर्टिकल छपने लगे कि राजस्थान में बॉर्डर पर बैठे भारतीय फौजी गर्मी से परेशान हैं और उनका मोराल खराब हो रहा है.

लड़ाई लड़ना तो दूर की बात है, सिर्फ लड़ाई की तैयारी भर में जो एक्स्ट्रा खर्चा होता है वहीं पाकिस्तान को कंगाल करने के लिए काफी है. और अब तो पूर्वी बॉर्डर पर जब पाकिस्तान भारत से उलझेगा तो पश्चिमी बॉर्डर पर बलूच भी ठोकने के लिए खड़े हैं.

लेकिन जब भारत में राहुल गांधी और ओवैसी भी पाकिस्तान से लड़ाई की बात करने लगें तो शक होता है कि दुनिया में कोई है जो चाहता है कि भारत युद्ध में उलझे. जो काम रूस को यूक्रेन से लड़ा कर किया गया है वहीं काम भारत के साथ करने की कोशिश हो रही है.
रूस से खुद उलझने की यूरोप की हिम्मत नहीं है तो उन्होंने यूक्रेन को उकसा कर रूस से युद्ध में उलझा दिया. यूक्रेन तो नंगा है, वह लड़ाई में बर्बाद होगा इससे उसकी लीडरशिप को कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन रूस को अपने रिसोर्सेज इस लड़ाई में डालने पड़े इसमें रूस का नुकसान अधिक है.

आज भारत के दोनों ओर एक एक यूक्रेन हैं. पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों नंगे हैं. उनको लड़ाई से फर्क नहीं पड़ता, और उनके बर्बाद होने से उनकी लीडरशिप को फर्क नहीं पड़ता. लेकिन भारत ने जो तरक्की की है उसको रोकने के लिए दुनिया परेशान है. पहले बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले करके भारत को उकसाया गया, फिर यह पहलगाम का हमला हुआ जिसे भारत इग्नोर नहीं कर सकता. वैश्विक तंत्र अपने प्यादे दोनों ओर से आगे करके वजीर को घेरने की कोशिश कर रहा है.

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भारत सामरिक शक्ति और डिप्लोमेटिक स्थिति, दोनों में पाकिस्तान और बांग्लादेश से बहुत बेहतर है. लेकिन जिस एक मोर्चे पर हम कमजोर हैं वह देश के अंदर का आधा मोर्चा. आज तक जब भी पाकिस्तान से लड़ाई हुई है, भारत के अंदर की एक पॉपुलेशन हमेशा शांत, बल्कि बैकफुट पर रही है. लेकिन पहली बार यह स्थिति है कि देश की एक जनसंख्या खुल कर पाकिस्तान के पक्ष में आने को तैयार दिख रही है. यह एक लॉ एंड ऑर्डर की समस्या भर नहीं है बल्कि गृहयुद्ध की स्थितियां हैं.

यह अच्छा है कि धैर्य और संयम हमारे नेतृत्व के कमजोर पक्ष नहीं हैं. मैं युद्ध का विरोधी नहीं हूँ, ना ही युद्ध की आवश्यकता को नकार रहा हूँ. लेकिन कोई भी युद्ध अपने समय से, अपनी सुविधा से, अपनी शर्तों पर होना चाहिए. युद्ध अपने पूर्वनिर्धारित लाभ के लिए लड़े जाने चाहिए, ना कि जनभावना को संतुष्ट करने के लिए. इसलिए सरकार पर अनावश्यक दबाव न बनाएं. हमने अपना क्षोभ और आक्रोश व्यक्त कर दिया, लेकिन उसपर सरकार को क्या प्रतिक्रिया देनी है और कब देनी है यह सरकार पर छोड़ दें.

साभार- सुभद्रा मिश्रा की फेसबुक पोस्ट

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    लेखक दो दशक से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रिंट मीडिया से की और अब डिजिटल पत्रकारिता में भी सक्रिय हैं। राजनीति, टेक्नोलॉजी, क्राइम, स्वास्थ्य और समाज से जुड़ीं खबरों पर विशेष फोकस रखते हैं।

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