जो समस्याएं भारत में आम हैं, वे चीन में क्यों नहीं दिखतीं? सिस्टम, इच्छाशक्ति और अनुशासन का बड़ा फर्क

भारत और चीन—दुनिया की दो सबसे बड़ी आबादी वाले देश। दोनों का इतिहास हजारों साल पुराना, सभ्यताएं प्राचीन और संसाधन विशाल। इसके बावजूद आज जब हम बुनियादी व्यवस्थाओं, नागरिक सुविधाओं और शासन की प्रभावशीलता की बात करते हैं, तो एक सवाल बार-बार उठता है—जो समस्याएं भारत में दशकों से बनी हुई हैं, वे चीन में क्यों नजर नहीं आतीं?

यह सवाल सिर्फ सोशल मीडिया बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि नीति-निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और आम नागरिकों के बीच भी गंभीर चर्चा का विषय बन चुका है। आइए, तथ्यों और व्यवस्थागत अंतर के आधार पर समझने की कोशिश करते हैं।


1. निर्णय लेने की गति: लोकतंत्र बनाम केंद्रीकृत सत्ता

भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां नीति निर्माण में संसद, न्यायपालिका, राज्य सरकारें, विपक्ष, मीडिया और जनमत की अहम भूमिका होती है। यह व्यवस्था नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा तो करती है, लेकिन निर्णय प्रक्रिया को धीमा भी कर देती है।

वहीं चीन में सत्ता पूरी तरह केंद्रीकृत है। वहां सरकार जो फैसला लेती है, वह तुरंत जमीन पर लागू होता है। न लंबी बहस, न अदालतों में सालों तक लटके मामले। इसी वजह से इंफ्रास्ट्रक्चर, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, स्मार्ट सिटी और ट्रांसपोर्ट सिस्टम बेहद तेजी से विकसित होते हैं।


2. कानून का सख्त पालन: नियम सबके लिए समान

भारत में कानून हैं, लेकिन उनका पालन एक बड़ी चुनौती है। ट्रैफिक नियम तोड़ना, अतिक्रमण करना, टैक्स चोरी, सरकारी जमीन पर कब्जा—ये सब आम दृश्य बन चुके हैं। अक्सर राजनीतिक संरक्षण या सिस्टम की ढिलाई के कारण दोषी बच निकलते हैं।

चीन में कानून तोड़ने की कीमत बेहद भारी होती है। वहां नियमों का उल्लंघन करने पर कड़ी सजा तय है और वह बिना भेदभाव लागू होती है। आम नागरिक से लेकर बड़े अधिकारी तक, कानून के सामने सभी समान हैं। यही कारण है कि वहां सार्वजनिक अनुशासन स्वतः दिखाई देता है।

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3. भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई

भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून और एजेंसियां मौजूद हैं, लेकिन जांच और सजा की प्रक्रिया लंबी और जटिल है। कई हाई-प्रोफाइल मामले वर्षों तक अदालतों में चलते रहते हैं।

चीन में भ्रष्टाचार के मामलों में सरकार जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाती है। बड़े-बड़े अफसरों और उद्योगपतियों तक को कड़ी सजा दी गई है। इसका सीधा असर यह हुआ कि सिस्टम में डर भी है और अनुशासन भी।


4. इंफ्रास्ट्रक्चर: योजना से लेकर क्रियान्वयन तक अंतर

भारत में सड़क, रेलवे, एयरपोर्ट और शहरी विकास योजनाएं बनती जरूर हैं, लेकिन भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण मंजूरी, राजनीतिक विरोध और कानूनी अड़चनों के कारण परियोजनाएं वर्षों तक अधूरी रहती हैं।

चीन में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास राष्ट्रीय प्राथमिकता है। वहां एक बार योजना बनी तो उसे तय समय में पूरा किया जाता है। हाई-स्पीड रेल नेटवर्क, मल्टी-लेन एक्सप्रेसवे और आधुनिक शहर इसका उदाहरण हैं।


5. जनसंख्या प्रबंधन और शहरी अनुशासन

भारत में तेजी से बढ़ती आबादी और अव्यवस्थित शहरीकरण बड़ी समस्या है। झुग्गियां, ट्रैफिक जाम, गंदगी और संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।

चीन ने वर्षों पहले जनसंख्या नियंत्रण और नियोजित शहरीकरण पर काम किया। शहरों को योजनाबद्ध तरीके से विकसित किया गया, जिससे बुनियादी सुविधाओं पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ा।


6. शिक्षा और नागरिक जिम्मेदारी

भारत में शिक्षा प्रणाली ज्ञान देने पर तो जोर देती है, लेकिन नागरिक कर्तव्यों, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। नतीजा यह है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना या नियम तोड़ना सामान्य बात बन जाती है।

चीन में शिक्षा के साथ-साथ अनुशासन और राष्ट्रहित की भावना बचपन से सिखाई जाती है। नागरिकों में यह भावना होती है कि सिस्टम का पालन करना उनका कर्तव्य है।

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7. राजनीति और प्रशासन का संबंध

भारत में प्रशासन अक्सर राजनीतिक दबाव में काम करता है। ट्रांसफर-पोस्टिंग, जांच और कार्रवाई कई बार राजनीतिक समीकरणों से प्रभावित होती है।

चीन में प्रशासन सीधे केंद्र सरकार के अधीन होता है और प्रदर्शन के आधार पर अधिकारियों का मूल्यांकन किया जाता है। नतीजतन, काम न करने वाले अधिकारी लंबे समय तक सिस्टम में नहीं टिक पाते।


8. मीडिया, विरोध और सिस्टम की स्थिरता

भारत में मीडिया और विरोध लोकतंत्र की ताकत हैं, लेकिन कई बार अनावश्यक विरोध और राजनीतिक हंगामे विकास कार्यों को प्रभावित करते हैं।

चीन में विरोध की सीमाएं तय हैं। इससे सरकार को योजनाएं लागू करने में स्थिरता मिलती है, हालांकि इसकी कीमत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में चुकानी पड़ती है।


निष्कर्ष: समस्या व्यवस्था की नहीं, इच्छाशक्ति की है

यह कहना गलत होगा कि भारत में समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। संसाधन, प्रतिभा और तकनीक—सब कुछ मौजूद है। फर्क सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक अनुशासन और नागरिक जिम्मेदारी का है।

चीन का मॉडल पूरी तरह भारत में लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि भारत की आत्मा लोकतंत्र में बसती है। लेकिन कानून का सख्त पालन, भ्रष्टाचार पर त्वरित कार्रवाई, योजनाओं का समयबद्ध क्रियान्वयन और नागरिक अनुशासन—ये सब सीख भारत भी अपना सकता है।

जब तक सिस्टम को चलाने वाले और सिस्टम में रहने वाले दोनों अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक सवाल बना रहेगा—जो समस्याएं भारत में हैं, वे चीन में क्यों नहीं हैं?

Author

  • sanjay

    लेखक दो दशक से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रिंट मीडिया से की और अब डिजिटल पत्रकारिता में भी सक्रिय हैं। राजनीति, क्राइम, स्वास्थ्य और समाजसेवा से जुड़ीं खबरों पर विशेष फोकस रखते हैं।

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