देश की राजनीति इस समय किसी शतरंज की बिसात से कम नहीं दिखती, जहां हर चाल बेहद सोच-समझकर चली जा रही है। एक ओर 2029 के लोकसभा चुनाव की रणनीति पर काम चल रहा है, तो दूसरी ओर 2027 की राजनीतिक ज़मीन पहले से ही गर्म होती नजर आ रही है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या देश को अगला प्रधानमंत्री पहले ही तय कर लिया गया है, या फिर किसी उभरते और लोकप्रिय चेहरे को जानबूझकर आगे बढ़ने से रोका जा रहा है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि केंद्रीय सत्ता का केंद्र एक बार फिर गुजरात में बनाए रखने की कोशिशें तेज हैं और इसी क्रम में अमित शाह को प्रधानमंत्री पद के संभावित चेहरे के रूप में आगे लाने की रणनीति तैयार की जा रही है। लेकिन इसी बीच उत्तर प्रदेश से एक ऐसा चेहरा उभरकर सामने आया है, जिसे देश का बड़ा तबका भविष्य का प्रधानमंत्री मानने लगा है—उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ।
योगी आदित्यनाथ अब केवल एक राज्य के मुख्यमंत्री भर नहीं रह गए हैं। उनकी लोकप्रियता राज्य की सीमाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित होती जा रही है। जनसमर्थन, सोशल मीडिया की सक्रियता और ज़मीनी प्रतिक्रिया यह संकेत दे रही है कि यदि मौका मिला, तो देश की बागडोर उनके हाथों में जा सकती है। और यहीं से राजनीतिक असहजता शुरू होती है।
इसी असहजता के दौर में यूजीसी इक्विटी बिल को लेकर बहस तेज होती है। सतह पर यह बहस सामाजिक संतुलन और वर्गों के अधिकारों से जुड़ी दिखती है, लेकिन गहराई से देखें तो तस्वीर कुछ और ही इशारा करती है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असली टकराव किसी जाति या वर्ग से नहीं, बल्कि उस नेतृत्व से है, जिसकी स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं और योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक कद हर दिन और ऊंचा होता दिख रहा है।
आशंका यह भी जताई जा रही है कि यदि योगी आदित्यनाथ देश के प्रधानमंत्री बने, तो उनकी प्राथमिकताओं में उत्तर प्रदेश प्रमुख रहेगा। इससे सत्ता और संसाधनों के मौजूदा संतुलन में बदलाव आ सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि सीधे तौर पर रास्ता रोकना संभव न हो, तो क्या परोक्ष दबाव, नीतिगत फैसलों और मौन के ज़रिये बाधाएं खड़ी की जा सकती हैं?
योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी ताकत—उनकी साफ छवि—यहीं उनकी सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। न भ्रष्टाचार का आरोप, न किसी बड़े विवाद का दाग। ऐसे में प्रत्यक्ष हमला मुश्किल हो जाता है और परिस्थितियां इस तरह बनाई जाती हैं, जहां नेता को संगठनात्मक अनुशासन और सत्ता संतुलन के नाम पर चुप रहना पड़े।
इसी पृष्ठभूमि में प्रयागराज की हालिया घटना सामने आती है। माघ मेला, भारी भीड़ और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी का रथ रोके जाने का निर्णय प्रशासनिक दृष्टि से उचित बताया गया। लेकिन इसके बाद जिस तरह का माहौल बनाया गया, उसने कई सवाल खड़े कर दिए। अचानक ऐसे चेहरे समर्थन में सामने आने लगे, जो आमतौर पर धार्मिक मुद्दों पर मौन रहते हैं। वहीं, भाजपा के कई वरिष्ठ नेता चुप्पी साधे रहे।
इसी दौरान उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का बयान आता है कि जो हुआ, वह गलत था और इसकी जांच होगी। यह बयान महज प्रशासनिक टिप्पणी नहीं, बल्कि राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इसके बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी द्वारा केशव प्रसाद मौर्य को बेहतर मुख्यमंत्री बताए जाने से राजनीतिक तस्वीर और स्पष्ट होती दिखी।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ये घटनाएं अलग-अलग नहीं, बल्कि एक क्रमबद्ध रणनीति का हिस्सा हो सकती हैं। बयान, मौन और समर्थन—सब कुछ एक तयशुदा स्क्रिप्ट के तहत आगे बढ़ता प्रतीत होता है, ताकि असली टकराव सीधे सामने न आए। प्रयागराज की घटना अब केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं रह जाती, बल्कि सत्ता के भीतर चल रही खींचतान का प्रतीक बन जाती है।
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या ये सभी घटनाएं संयोग मात्र हैं, या फिर उस शतरंज की बिसात का हिस्सा, जहां अगली चाल देश की राजनीति की दिशा तय करने वाली है।