विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा 13 जनवरी को जारी किए गए नए दिशा-निर्देशों को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। आयोग का कहना है कि इन नियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेज परिसरों में जातिगत भेदभाव को रोकना है, लेकिन सामान्य वर्ग से जुड़े कई छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों ने इन प्रावधानों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
दिशा-निर्देशों की पहली नज़र में मंशा समानता और समावेशन की दिखाई देती है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इसके कुछ प्रावधान व्यावहारिक स्तर पर असंतुलन और एकतरफा कार्रवाई को बढ़ावा दे सकते हैं।
क्या है UGC Guidelines?
♦️ अगर OBC या SC/ST का विद्यार्थी किसी सामान्य वर्ग के विद्यार्थी पर आरोप लगाया तो वह दोषी माना ही जाएगा, भले वह आरोप फर्जी हो |
♦️ झूठी शिकायत करने पर उन विद्यार्थियों पर कोई भी सज़ा का प्रावधान नहीं होगा |
♦️ कॉलेज और यूनिवर्सिटी पर UGC और फंडिंग का दबाव बढ़ेगा |
♦️ सामान्य वर्ग = दोषी, जब तक निर्दोष साबित न हो |
♦️ अगर आवश्यक समझा जाएगा तो पुलिस बुलाकर सवर्ण बच्चों को तुरंत जेल का प्रावधान होगा |
निगरानी स्क्वाड को लेकर विवाद
यूजीसी दस्तावेज़ के पाँचवें बिंदु में यह प्रावधान किया गया है कि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के खिलाफ होने वाले कथित भेदभाव पर निगरानी रखने के लिए संस्थानों में एक विशेष स्क्वाड गठित किया जाएगा।
सामान्य वर्ग के छात्रों का कहना है कि यह व्यवस्था आगे चलकर निगरानी, दबाव और उत्पीड़न का माध्यम बन सकती है। उनका आरोप है कि इससे कुछ समुदायों को पहले से ही संदिग्ध मानकर देखा जाएगा, जिससे शैक्षणिक माहौल प्रभावित हो सकता है।
‘अवसर केंद्र’ और ‘समानता समिति’ पर आपत्ति
दस्तावेज़ में वंचित एवं शोषित वर्गों के छात्रों के लिए ‘अवसर केंद्र’ (Opportunity Centre) स्थापित करने तथा एक ‘समानता समिति’ (Equity Committee) के गठन का भी प्रावधान है। यह समिति SC, ST, OBC और दिव्यांग छात्रों से जुड़ी शिकायतों की जांच करेगी।
विरोध करने वालों का कहना है कि इस समिति में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधियों को शामिल नहीं किया गया है। ऐसे में यदि किसी सामान्य वर्ग के छात्र के खिलाफ शिकायत दर्ज होती है, तो उसकी बात निष्पक्ष रूप से रखने के लिए मंच उपलब्ध नहीं होगा।
भेदभाव की स्पष्ट परिभाषा नहीं होने पर सवाल
आलोचकों का यह भी कहना है कि दिशा-निर्देशों में “भेदभाव” की कोई स्पष्ट और कानूनी परिभाषा नहीं दी गई है। इससे आशंका जताई जा रही है कि व्यक्तिगत मतभेद, वैचारिक असहमति या सामान्य बातचीत को भी भेदभाव की श्रेणी में रखकर शिकायत दर्ज की जा सकती है।
संभावित दुष्परिणाम गिनाए गए
- शिकायतकर्ता की पहचान गोपनीय रखने से फर्जी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों की आशंका।
- शैक्षणिक परिसरों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर पड़ने का डर।
- कानूनी कार्रवाई के भय से छात्रों के बीच संवाद और बहस का माहौल कमजोर होने की संभावना।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी तेज
कुछ सामाजिक संगठनों ने इन दिशा-निर्देशों को राजनीति से प्रेरित बताते हुए आरोप लगाया है कि सरकार नए सामाजिक समीकरण साधने के प्रयास में एक वर्ग को अलग-थलग महसूस करा रही है। वहीं, सरकार समर्थक पक्ष का कहना है कि यह नियम केवल समान अवसर और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हैं, न कि किसी समुदाय के खिलाफ।
फिलहाल यूजीसी के इन दिशा-निर्देशों पर देशभर के शैक्षणिक संस्थानों, छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों की निगाहें टिकी हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि इन नियमों में संशोधन होता है या सरकार और आयोग इन्हें मौजूदा स्वरूप में ही लागू करते हैं।